The Token System – Chapter 706
“वही है,” औरत चिल्लाई। “वही सफ़ेद कोट वाला!”
सुमन ने सिक्योरिटी को बुलाने के लिए इंटरकॉम उठाया। वो आदमी तेज़ी से गलियारे में चला गया।
मैंने टोकन फिर निकाला — वो अब भी गरम था। आवाज़ आई — एक नाम, और एक कमरा। अस्पताल की दूसरी मंज़िल, पुराना रिकॉर्ड कमरा। मेरी जेब। जान।
मैंने उस औरत की तरफ़ देखा। “तुम्हारा नाम क्या है?”
“कमला।”
“और बच्चे का?”
“छोटू।”
मैं रुक गया। छोटू — वही नाम जो नींव के काग़ज़ में था? नहीं, मैंने सोचा, ये दूसरा छोटू है। शहर में न जाने कितने छोटू हैं।
“डॉक्टर साहिबा,” मैंने सुमन से कहा, “इस बच्चे को भवानी के होम से बचाओ।”
सुमन ने मेरी आँखों में देखा। “तू खुद को संभाल पहले।”
“मैं ठीक हूँ,” मैंने कहा। और मैं सच कह रहा था — सिर में दर्द था, खून बह रहा था, पर मेरे अंदर कुछ नया जाग रहा था।
मैंने कमला से कहा, “तुम्हारे पति कहाँ हैं?”
उसने सिर नीचे किया। “काम पर गए हैं। राज मिस्त्री हैं। उन्हें नहीं पता कि हम यहाँ हैं।”
“तो फ़ोन करो,” मैंने कहा। “उन्हें बताओ कि बच्चा ठीक है। और उनसे कहना — कल सुबह दस बजे अदालत में आएं।”
“अदालत में?” उसने डर से पूछा।
“उन्हें सिर्फ़ एक बात कहनी है,” मैंने कहा। “कि भवानी के होम ने उन्हें पैसे देकर बच्चे को ले जाने से मना किया था।”
कमला की आँखों में आँसू आए। “हम ऐसा नहीं कर सकते। वो आदमी बहुत बड़ा है।”
“बड़ा है,” मैंने कहा, “पर बड़ा होने से सच नहीं छुपता।”
सुमन ने बच्चे की नब्ज़ देखी और मेरी तरफ़ देखकर कहा, “तुझे सिलाई लगेगी।”
“पहले फ़ाइल,” मैंने जेब से पीली फ़ाइल निकाली। “ये शकुंतला देवी की है। पिछले महीने मरी है। भवानी के होम में। देर से इलाज से।”
सुमन ने फ़ाइल पढ़ी। उनका चेहरा सख़्त हो गया। “मुझे ये फ़ाइल अस्पताल के मुख्य अधिकारी को दिखानी होगी।”
“पहले कॉपी,” मैंने कहा।
“कॉपी मेरे पास है,” सुमन ने कहा। “तू फ़ाइल अपने पास रख।”
मैंने सिर हिलाया और फिर धीरे से कहा, “एक बात पूछूँ?”
“पूछ।”
“तुमने मुझे सुबह फ़ोन किया। कहा — कोई औरत थी। कौन थी?”
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। “मुझे नाम नहीं बताया। पर उसने कहा कि वो भवानी के होम में काम करती थी। और उसने एक और बात कही।”
“क्या?”
“कहा — छोटू का दादा नहीं मरा था। उसे मारा गया था। और वो आज भी किसी काग़ज़ में ज़िंदा है।”
मेरे हाथ से फ़ाइल फिसलने लगी। मैंने उसे पकड़ा। “किस काग़ज़ में?”
“यही तो पता नहीं,” सुमन ने कहा। “वो औरत डर रही थी। कहकर रख दिया।”
मैंने टोकन को जेब में रखा। वो अब ठंडा था।
तभी बाहर गलियारे से किसी के भागने की आवाज़ आई — तेज़, हड़बड़ाई। सुमन दरवाज़े की तरफ़ भागीं। मैं उनके पीछे गया। गलियारे में एक औरत भाग रही थी — काला थैला, भारी शरीर। वही औरत जो पिछले हफ़्ते अस्पताल के पिछले फाटक से भागी थी।
“रुको!” सुमन चिल्लाईं।
औरत ने मुड़कर देखा — एक पल के लिए — और फिर सीढ़ियों की तरफ़ भागी। उसका थैला फ़र्श पर गिरा, फिर भी वो भागती रही।
सुमन ने थैला उठाया। उसमें कुछ काग़ज़ थे और एक छोटा पीतल का डिब्बा — जिस पर कोना-चिह्न। वो चिह्न मेरे टोकन वाला ही था।
मैंने डिब्बा खोला। अंदर एक पर्ची थी — “जो अंदर है, वो बच्चा नहीं है। वो हिसाब है।”
और उसके नीचे एक नाम — “किशोरी।”
मेरी आँखें रुक गईं।
“ये नाम तो…” सुमन ने कहा।
“मैं जानता हूँ,” मैंने कहा। “ये वही किशोरी है जो अदालत में तीसरी चाबी लाया था।”
मैंने पर्ची पलटी। पीछे यूनानी में कुछ लिखा था — नहीं, यूनानी नहीं। ये तो मेरी ही लिखाई थी, पर मैंने कभी ये लिखा ही नहीं।
“मन्नू,” सुमन ने धीरे से कहा, “तेरा सिर फट रहा है।”
मैंने हाथ लगाया। खून अब भी बह रहा था। पर मुझे दर्द महसूस नहीं हो रहा था — जैसे अंदर कुछ और चल रहा हो।
“सुमन,” मैंने कहा, “ये औरत भवानी के होम की पुरानी नर्स थी। लक्ष्मी। जिसका नाम रजिस्टर में बंद दर्ज है।”
“कैसे जाना?”
“माँ की डायरी में पढ़ा था,” मैंने कहा। “लक्ष्मी का बड़ा बेटा अब भी ज़िंदा है। और वो ही है जो इन काग़ज़ों को लाया।”
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। टोकन अब भी वहीं था। ठंडा, भारी, चुप।
“मुझे अब हरीश चंद्र के पास जाना है,” मैंने कहा। “कल सुनवाई है और ये सब सबूत उनके पास होना चाहिए।”
“पहले अस्पताल,” सुमन ने कहा। “सिर की सिलाई। फिर जो करना है कर।”
मैंने माथा सहलाया। “ठीक है। पर एक शर्त है।”
“क्या?”
“तुम मेरे साथ चलो। और जब मैं अंदर होऊँ, तुम बाहर खड़ी रहना। अगर कोई आए तो खाँसना।”
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा और पहली बार उस दिन वो मुस्कुराईं। “तेरे साथ चलना मतलब हर बार कुछ न कुछ हो।”
“होता है,” मैंने कहा, “तभी तो कहानी चलती है।”
मैं सिलाई कराने गया। डॉक्टर ने पूछा — “कैसे लगी?” मैंने कहा — “गिर गया।” वो हँसा — “इस उम्र में गिरते हो?” मैंने कहा — “इस शहर में गिरना आम है।”
जब मैं बाहर निकला तो सुमन इमरजेंसी के बाहर खड़ी थीं और उनके हाथ में एक और पर्ची थी — मेरी ही लिखाई में।
“ये मुझे कमला ने दी,” उन्होंने कहा। “कह रही थी — बच्चा खेल रहा था और उसके हाथ में ये आ गया।”
मैंने पर्ची पढ़ी। उस पर सिर्फ़ इतना लिखा था — “अस्पताल, आपातकाल, जान बचानी है।”
“ये तो टोकन का संदेश है,” मैंने धीरे से कहा।
“पर ये तेरी लिखाई में है,” सुमन ने कहा। “और तूने इसे लिखा नहीं।”
मैंने पर्ची जेब में रखी और टोकन टटोला। वो अब भी ठंडा था।
“कल सुबह,” मैंने कहा, “अदालत में सब पता चलेगा।”
मैं मुड़ा और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा। पीछे से सुमन की आवाज़ आई — “मन्नू, तेरा सिर…”
“सिर ठीक है,” मैंने कहा। “हिसाब बाकी है।”
और मैं बाहर निकल आया, सुबह की धूप में, जहाँ बंसी की दुकान पर चाय उबल रही थी और मोहल्ले के बच्चे स्कूल जा रहे थे।
॥
अस्पताल की सीढ़ियों पर बंसी की चाय की महक आ रही थी, पर मेरे मुँह में खून का स्वाद था। मैंने सुमन को देखा — वो अभी भी सीढ़ियों की तरफ़ देख रही थीं जहाँ से वो औरत भागी थी।
“खून बहुत है,” सुमन ने कहा और गुलाबी काग़ज़ का पैकेट फाड़ा।
“रुको,” मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। “पहले सुनो।”
“सुनने की हालत में तू नहीं है।”
“अंदर जाना है,” मैंने कहा और इमरजेंसी की तरफ़ मुँह उठाया। तभी अंदर से आवाज़ आई। एक औरत की चीख — तेज़, फटी हुई। फिर एक आदमी की बोलती आवाज़।
मैं भूल गया कि सिर फट रहा है। मैं दौड़ा।
इमरजेंसी के दरवाज़े पर एक बच्ची खड़ी थी, छह-सात साल की, आँचल से मुँह ढके। अंदर बेड पर एक बच्चा था — चार साल का होगा — सर से खून, कपड़े लाल। उसकी माँ बेड के पाये पकड़कर रो रही थी और एक सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी उसका बाज़ू खींच रहा था।
“समझाओ इन्हें,” आदमी ने नर्स से कहा। “गाड़ी नीचे खड़ी है।”
नर्स — नई लगती थी, शालिनी — काग़ज़ पकड़े खड़ी थी और हाथ काँप रहे थे।
“आप कौन हैं?” मैंने कहा।
आदमी मुड़ा। चालीस के ऊपर, चौड़ा, कान के पास सफ़ेद बाल का टुकड़ा। उसकी जेब से एक मुड़ा काग़ज़ निकल रहा था, उस पर हरी मोहर।
“तू कौन है?” उसने कहा।
“यहाँ का एक्स-रे वाला हूँ,” मैंने कहा। “और ये बच्चा यहीं रहेगा।”
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