The Token System – Chapter 704
घर पहुँचकर मैंने बंसी को देखा। वो अपना पैर सहला रहा था। “तू ठीक है?” मैंने पूछा।
“ठीक हूँ,” वो बोला। “पर एक बात बता। भवानी ने उस डिबिया को ऐसे देखा जैसे वो उसकी जान हो। क्यों?”
मेरे पास जवाब नहीं था। मैंने दरवाज़ा खोला तो माँ चूल्हे पर बैठी थी। उसने हमें देखा और बिना कुछ पूछे चाय का गिलास बढ़ा दिया।
“माँ,” मैंने कहा, “तूने कभी सुना है — किसी का टोकन किसी और के हाथ में हो?”
माँ के हाथ चूल्हे पर रुक गए। उसने मुझे देखा, फिर बंसी को, फिर फिर मुझे।
“सुन तो रखा है,” वो बोली। “जब टोकन वाला मर जाए और हिसाब अधूरा रहे, तो टोकन उस हाथ में चला जाता है जो सबसे ज़्यादा हिसाब करता हो। पर उस हाथ को मालूम नहीं होता कि वो किसका हिसाब चला रहा है।”
“भवानी को मालूम है?” मैंने पूछा।
माँ ने चूल्हे की आँच धीमी की। “भवानी को ये मालूम है कि उसके पास टोकन है। पर ये मालूम नहीं कि वो किसका है।”
कमरे में रोशनी धीरे-धीरे फैल रही थी। मैंने टोकन जेब से निकाला और मेज़ पर रखा। सोलह लकीरें सुबह की रोशनी में यूँ दिखीं जैसे कोई सीढ़ी ऊपर जा रही हो।
“तो अब क्या?” बंसी ने पूछा।
मैंने चाय का गिलास उठाया। “अब भवानी को ये बताना है कि उसका टोकन किसका है। और वो कल तहसील में ख़ुद बता देगा — चाहे उसे कितना भी बुरा लगे।”
बंसी मुस्कुराया। “और अगर नहीं बताया?”
मैंने टोकन उठाया और मेज़ पर वापस रखा। “तो फिर हम उसकी जेब से अदालत के सामने निकलवा लेंगे।”
तहसील पहुँचते-पहुँचते दोपहर हो गई थी। बरामदे में कुर्सियाँ लगी थीं और भवानी पहले से बैठा था — सफ़ेद कुर्ता, पीली पगड़ी, आँखों पर काला चश्मा। मेरे आते ही उसने चश्मा उतारा और ऐसे मुस्कुराया जैसे कोई पुराना वकील हो।
“आओ मन्नू। बैठो।”
मैं नहीं बैठा। “काग़ज़ तो मैं लाया नहीं,” मैंने कहा। “पहले एक बात पूछनी है।”
भवानी ने अपनी जेब से रूमाल निकाला और चश्मा पोंछने लगा। “पूछो।”
“तुम्हारे टोकन पर कितनी लकीरें हैं?”
उसके हाथ रुक गए। शेखर बाबू पीछे खड़े थे। बंसी दरवाज़े के पास।
भवानी ने रूमाल जेब में रखा। “तुम्हें ये किसने बताया?”
“किसी ने नहीं। मैंने देखा। तुम्हारा टोकन मेरे टोकन जैसा है। बस उसमें अंक नहीं हैं — एक खुरदुरा निशान है। मेरे टोकन में जितनी लकीरें बढ़ती हैं, तुम्हारे टोकन में भी कुछ बढ़ता है। है ना?”
भवानी उठ खड़ा हुआ। वो मेरे बहुत पास आ गया, इतने पास कि मुझे उसकी साँस की गरमी माथे पर लगी।
“तुम अंदर गए थे,” उसने धीमे से कहा। “रात में। मेरे दफ़्तर में।”
मैं डिगा नहीं। “हाँ गया था। और जो मिला, वो करीब-कराब पहेली का आख़िरी टुकड़ा था। बस एक टुकड़ा अभी भी ग़ायब है — वो तुम हो। तुम अब तक किसका हिसाब चला रहे हो, भवानी?”
वो मेरी तरफ़ देखता रहा। उसके होंठ हिले, फिर रुक गए। ये पहली बार था जब मैंने उसे कोई जवाब तलाशते देखा।
तभी दरवाज़े के बाहर गाड़ी रुकी और तेज़ कदमों की आवाज़ आई। एक आदमी अंदर आया — लंबा, दुबला, पीली आँखें। उसने भवानी के कान में कुछ कहा। भवानी का चेहरा सख़्त हो गया।
“जज साहब पहुँच गए,” उसने कहा और मेरी तरफ़ मुड़ा। “जाकर अपनी जगह बैठो मन्नू। अभी तो खेल शुरू हुआ है।”
अदालत में भीड़ ज़्यादा नहीं थी। पर जो बैठे थे, उनकी आँखें हम पर टिकी थीं। रघुवीर एक कोने में खड़े थे। शेखर बाबू ने अपना पुलिंदा मेज़ पर रखा और जज की तरफ़ देखा।
जज ने शेखर बाबू की तरफ़ देखा। “तुम जो काग़ज़ दे रहे हो, उसमें भगवान सिंह और हरि सिंह के हस्ताक्षर कैसे आए?”
बंसी उठा। उसकी आवाज़ बरामदे में ज़ोर से गूँजी। “सरकार, मेरे ससुर हरि सिंह ने ज़िंदगी में एक ही चीज़ पर हस्ताक्षर किए थे — अपने बेटे की शादी में। वो भी तब, जब बीच में एक ठाकुर ने उनसे कहा कि ये काग़ज़ तो बस तेरे लिए है, किसी को दिखेगा नहीं।”
हॉल में खुसफुसाहट फैल गई। भवानी का वकील बीच में खड़ा हुआ। “आपत्ति, जज साहब! ये किसी मरे हुए आदमी के मुँह से बोले जा रहे हैं।”
“आपत्ति मंज़ूर,” जज ने कहा। “गवाह चुप रहे।”
बंसी बैठ गया। मैंने उसकी तरफ़ देखा — उसके होंठ काँप रहे थे, पर आँखें साफ़ थीं।
भवानी का वकील अब मेरी तरफ़ मुड़ा। “मन्नू जी, आपके पास एक टोकन है, है ना? बाज़ार की एक चीज़। आप उसे अदालत में पेश क्यों नहीं करते?”
मेरी जेब में टोकन गरम होने लगा — पहले धीमे, फिर तेज़। मुझे बैठे-बैठे लगा कि कोई छोटा सा तार जल रहा है। मैंने जेब पर हाथ रखा और उठकर खड़ा हो गया।
“पेश करूँगा,” मैंने कहा। “पर एक बात साफ़ कर दूँ। ये टोकन बाज़ार की नहीं, ज़मीन की चीज़ है। जिसने ज़मीन बाँटी, असली काग़ज़ छिपाए, उसी के हाथ में ये आज भी ज़िंदा है। और मेरे टोकन पर सोलह लकीरें हैं। एक-एक लकीर एक-एक नाम है। जिसमें अभी पंद्रह नाम सोए हैं।”
हॉल में सन्नाटा छा गया।
जज ने चश्मे के ऊपर से देखा। “सोलहवाँ कौन है?”
मैंने भवानी की तरफ़ देखा। उसने मुँह फेर लिया।
“सोलहवाँ वो है,” मैंने कहा, “जो अपना हिसाब चलाते-चलाते ख़ुद किसी और का हिसाब बन गया।”
पीछे से भवानी का आदमी उठा, पर जज ने हाथ उठाया। “कल इसी वक़्त। दोनों टोकन अदालत में पेश होंगे। तब तक दोनों किसी को नहीं दिए जाएँगे।”
जब हम बाहर निकले तो दोपहर ढल रही थी। रघुवीर ने मेरा कंधा थपथपाया। “तूने आज भवानी को हिला दिया।”
“हिला तो दिया,” मैंने कहा, “पर उसने मुझे भी हिला दिया। जब मैंने सोलहवाँ नाम कहा, उसने मुँह फेर लिया — डर से नहीं, शर्म से। मैंने ऐसी शर्म उसके चेहरे पर कभी नहीं देखी।”
बंसी मेरे साथ चल रहा था। “अब क्या?”
“अब वो टोकन लाना है,” मैंने कहा, “जो भवानी की जेब में है। और उसे लाने के लिए मैं उसके दफ़्तर नहीं, उसके घर जाना होगा।”
“रात में? उसके आदमी तो सबके सामने तुम्हें जानते हैं।”
“इसीलिए तो ठीक है। सामने वाले को कोई नहीं ढूँढ़ता। ढूँढ़ता है वो जो आँख बचाकर आता है।”
बंसी मुस्कुराया। “तेरी बातों की नींव ढीली है मन्नू।”
“हाँ,” मैंने कहा, “पर अब तक इमारत गिरी नहीं।”
हम शाम को घर लौटे। माँ ने खाना परोसा। मैंने खाते-खाते कहा, “माँ, भवानी के घर के पीछे जो पुराना कुआँ है, वो अभी बंद है?”
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। “उस कुएँ में शेखर बाबू की किताबें गिरी थीं, मालूम है तुझे? पिछली बार इसे निकालने गया था, उन्हीं किताबों में से एक में टोकन निकला था। अब फिर जाना है?”
“नहीं,” मैंने कहा। “अब टोकन कुआँ नहीं, जेब में है। पर उस जेब तक जाने का रास्ता कुएँ से होकर जाता है।”
माँ ने थाली मेरी तरफ़ सरका दी। “तो जा।” फिर उसने बंसी की तरफ़ देखा। “पर इस बार इसे अपने पास रख। अकेला मत भेज।”
रात के दो बजे हम दोनों भवानी के घर के पीछे वाली गली में खड़े थे। बंसी की जेब में ससुर की वो रसीद रखी थी जो शेखर बाबू ने उसे दी थी। मैंने कुएँ के ऊपर लगा लोहे का ढक्कन धीरे से सरकाया।
तभी मेरे पीछे किसी ने खाँसा।
मैं मुड़ा। फाटक की सलाखों से एक चेहरा झाँक रहा था — भवानी के दो आदमियों में से एक, वही जिसने अदालत में जाकर भवानी के कान में कुछ कहा था।
“तो तुम हो,” उसने धीमे से कहा। “जिसकी बातें सुनकर ठाकुर साहब के हाथ काँपते हैं।”
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