The Token System – Chapter 702
"मतलब ये डिबिया भवानी के दफ़्तार से निकली है, उसके घर से नहीं।"
हरीश चंद्र ने कुर्सी पर पीछे टेक लगाई। "तो भवानी ने ख़ुद ये डिबिया दफ़्तार की तिजोरी में रखी थी। न घर में।"
"क्यों?" रघुवीर ने पूछा।
"क्योंकि घर में उसकी बीवी है। बच्चे हैं। दफ़्तार में सिर्फ़ वो और उसका ताला है।"
शेखर बाबू ने अचानक कहा, "मुझे एक बात याद आ रही है।" वो उठ खड़े हुए। "जब मैंने तिजोरी लगवाई थी, भवानी ने तीसरा ताला अपने हाथ से लगाया था। मैंने पूछा — साहब, इसकी चाबी कहाँ रखेंगे? वो हँसा और बोला — दो चाबियाँ बनवाऊँगा। एक मेरे पास, एक उसके पास।"
"उसके पास?" हरीश चंद्र ने पूछा। "कौन?"
"मैंने भी पूछा था। वो बोला — जो मरने के बाद भी मेरा हिसाब रखेगा।"
सन्नाटा। फिर मैंने धीरे से कहा, "सुखदेव।"
"पर सुखदेव तो मर गया," रघुवीर ने कहा।
"मरा है या मरवाया गया," हरीश चंद्र ने कहा। "यही तो असली सवाल है।"
उन्होंने पन्ना उठाया जिस पर वो लाइन लिखी थी — मोम-छाप के नीचे जो है, वो हिसाब नहीं है, वो हिसाब करने वाला है।
"ये लाइन सुखदेव की है," हरीश चंद्र ने कहा। "और अगर ये लाइन सच है, तो डिबिया में जो है वो काग़ज़ नहीं, कोई चीज़ है। कोई ऐसी चीज़ जो भवानी के हर हिसाब को खोल देगी।"
मैंने डिबिया उठाई। मोम की छाप सूखी थी, पर किनारे से थोड़ी उखड़ी हुई। जैसे किसी ने खोलने की कोशिश की हो और फिर रह गया हो।
"इसे हम खोलेंगे नहीं," मैंने कहा। "अदालत में खुलेगी।"
रघुवीर ने मेरी तरफ़ देखा। "अदालत में? जज के सामने?"
"हाँ। जिस दिन बही खुलेगी, उसी दिन ये डिबिया भी खुलेगी। तभी भवानी का हिसाब पूरा होगा।"
शेखर बाबू फिर बैठ गए। उनकी आँखें अब भी लाल थीं, पर आवाज़ साफ़ थी।
"तो अब रास्ता सिर्फ़ एक है," वो बोले। "रात को गफ़ूर से मिलना है, दफ़्तार में घुसना है, और तिजोरी खोलनी है।"
"तीन ताले," हरीश चंद्र ने कहा। "पहला और दूसरा नंबरों से। तीसरा चाबी से। चार-छह-नौ-तीन।"
शेखर बाबू का हाथ फिर काँपा। "हाँ। चार-छह-नौ-तीन।"
हे भगवान्, मैंने सोचा। इतने साल से मेरे बाप काग़ज़ों के लिए अदालतों में मर रहे थे, और सच एक तिजोरी में आराम से बैठा था। तीन ताले। तीन नंबर। और एक दफ़्तार की सफ़ाई।
बंसी ने ट्रे उठाई। "पहले चाय पी लो सब। और मन्नू, तू मेरी दुकान से एक टॉर्च ले जाना। पुरानी है, पर रोशनी अच्छी देती है। गफ़ूर अंधेरे में काँपता है। टॉर्च देखकर थोड़ा हिम्मत करेगा।"
"तू क्यों नहीं चलता?" मैंने पूछा।
"मेरी दुकान कौन देखेगा?" बंसी मुस्कुराया। "मैं यहीं रहूँगा, और अगर सुबह तक तू न आया, तो तेरी माँ को मैं ख़ुद ख़बर दूँगा।"
"बंसी।"
"मज़ाक नहीं कर रहा। तेरे बाप की कसम, मज़ाक नहीं कर रहा।"
रात ग्यारह बजे हम तीन निकले — मैं, रघुवीर और शेखर बाबू। गफ़ूर मोहल्ले के नुक्कड़ पर मिला। बूढ़ा था, कमर झुकी थी, पर आँखें चौकन्नी। टॉर्च देखकर उसने एक पल मेरी तरफ़ देखा।
"भवानी का दामाद?" उसने रघुवीर को पहचानकर कहा।
"नहीं। भवानी का हिसाब।" रघुवीर ने कहा।
गफ़ूर ने होंठ कसकर सोचा। फिर अपना झोला उठाया। "चल। दो घंटे की बात है। बाद में मैं इस शहर में नहीं रहूँगा।"
दफ़्तार की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मेरी टॉर्च का हाथ काँप रहा था। दालान के आख़िर में वो कमरा था। गफ़ूर ने चाबी और तिजोरी की तरफ इशारा किया। "दो मिनट। मैं बाहर रहूँगा।"
शेखर बाबू आगे बढ़े। पहला नंबर घुमाया — चार। दूसरा — छह। फिर नौ। फिर तीन। दो ताले खुले। तीसरा ताला। रघुवीर ने चाबी मेरी तरफ़ बढ़ाई। मैंने लगाई। चाबी घूमी।
तिजोरी का दरवाज़ा खुला। अंदर काग़ज़ों के बंडल थे। और बीच में, एक छोटी सी लकड़ी की डिबिया — ठीक वैसी जैसी शेखर बाबू ने मेज़ पर रखी थी।
शेखर बाबू ने धीरे से कहा, "उस तिजोरी में सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है। एक और चीज़ भी रखी है जो भवानी ने कभी किसी को नहीं दिखाई।"
रघुवीर ने डिबिया उठाई। हल्की। काग़ज़ नहीं। मोम-छाप पर उसका अँगूठा पड़ा।
"अंदर क्या है?" मैंने पूछा।
शेखर बाबू ने टॉर्च की रोशनी में मेरी तरफ़ देखा। चश्मा उतार दिया था, आँखों में वो पुराना डर वापस आ गया था।
"जिस दिन खुलेगी," उन्होंने कहा, "उस दिन पता चलेगा कि भवानी सिर्फ़ ज़मीन का हिसाब नहीं रखता था। वो आदमियों का भी हिसाब रखता था।"
॥
दफ़्तार की पिछली खिड़की का शटर बाहर से बंद नहीं था। गफ़ूर ने कहा था — “शाम को सफ़ाई के बाद मैं इसे ऊपर छोड़ आता हूँ, क्योंकि अंदर से हवा नहीं आती।” उसी खुली जगह से शेखर बाबू पहले चढ़े, फिर रघुवीर, और आख़िर में मैं।
अंदर घुसते ही मेरे मुँह में धूल भर गई। कमरे में काग़ज़ों की गंध थी और उसके ऊपर कोई तेल जैसी बदबू, जो पुरानी अलमारियों से आती है। मेरी टॉर्च की पीली रोशनी दीवार पर पड़ी तो शेखर बाबू ने मेरा हाथ नीचे दबा दिया।
“रोशनी नीचे रख। खिड़की से बाहर दिखेगी।”
हमने टॉर्च को काग़ज़ों के बंडलों से ढक दिया। इतनी रोशनी थी कि दीवार पर सिर्फ़ परछाइयाँ नाच रही थीं। कमरे के आख़िर में लोहे की वही तिजोरी खड़ी थी, जिसका नक्शा श्यामू ने हमें दिया था।
शेखर बाबू तिजोरी के सामने बैठ गए, जैसे कोई बूढ़ा पुजारी मंदिर के ताले पर हाथ रखता है। उन्होंने गले से कुछ निगला, फिर पहला नंबर घुमाया — चार। दूसरा — छह। उँगली फिसली, उन्होंने फिर से घुमाया। नौ। फिर तीन।
दो ताले खुले। चटक की आवाज़ कमरे में गूँजी। तीसरे ताले पर उन्होंने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया। रघुवीर ने पीतल की चाबी मेरी हथेली पर रखी। चाबी भारी थी, जैसे हाथ में छोटा हथौड़ा लिया हो।
मैंने चाबी लगाई और घुमाया। तीसरा ताला खुला। शेखर बाबू ने दरवाज़ा खींचा तो अंदर से रोशनी की जगह अंधेरा लुढ़ककर बाहर आया।
काग़ज़ों के पुलिंदे थे। पीले धागे से बँधे। नीचे कुछ लोहे के बक्से, ऊपर लिफ़ाफ़ों के बंडल, और सबसे बीच में — लाल कपड़े में लिपटी एक गोल चीज़, जैसे कोई बच्चा चाँदी का चम्मच कपड़े में लपेटकर रखता है।
शेखर बाबू ने सबसे पहले धागे वाला पुलिंदा उठाया। खोलते ही अंदर से एक मोटा काग़ज़ निकला, जिस पर चारों तरफ़ मोहरें लगी थीं।
“ये वो हैं,” शेखर बाबू की आवाज़ फट गई। “जो भवानी ने जलाए, वो इनकी नकल थी। ये असली हैं।”
रघुवीर ने काग़ज़ अपनी तरफ़ खींचा। मैंने टॉर्च उसके हाथ पर की। काग़ज़ पर नीचे की तरफ़ तीन हस्ताक्षर थे — एक बड़ा, मोटा, हरि सिंह का। उसके नीचे छोटी साफ़ लिखाई — मेरे दादा की। और तीसरा, देहाती अक्षरों में — बंसी के ससुर का।
“तीनों,” मैंने कहा। “भगवान सिंह के साथ।”
रघुवीर की उँगली काग़ज़ पर चल रही थी। “ऊपर देख। मेरे पिता का नाम पहले है। और नीचे लिखा है — हर हिस्से की कमाई का एक हिस्सा उसी तरह बाँटा जाएगा जैसे भगवान सिंह ने बाँटा था।”
“मतलब?” मैंने पूछा।
शेखर बाबू ने चश्मा पोंछा। “मतलब, हवेली जिसके भी पास रहे, उसकी कमाई का हिस्सा गरीबों के इलाज में जाएगा। यही शर्त थी। और भवानी के बाप ने उसे पहले दिन से तोड़ा।”
मैंने दूसरा पुलिंदा खोला। उसमें दस्तख़तों की एक सूची थी — कौन किस ज़मीन पर, किस तारीख़ को, किसकी मौजूदगी में बैठा। सूची में आख़िरी नाम कटा हुआ था, पर नीचे एक लाइन बची थी — “चौथा हिस्सा नींव की तरफ़।”
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