The Token System – Chapter 701
फिर वो रघुवीर की तरफ़ मुड़े।
"ये चाबी जो कल तूने दी — ये तीसरे ताले की थी। तीसरा ताला खुल गया, अंदर एक पत्ता मिला जिस पर लिखा था कि चौथा हिस्सा नींव में है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "और नींव आज मिल गई।"
"तो अब अदालत में क्या होगा?"
"अगली सुनवाई में ये बही, ये काग़ज़ और ये नक्शा — तीनों पेश होंगे। पर उससे पहले एक काम है।"
"क्या?"
"भवानी के दफ़्तर की तिजोरी। श्यामू कहता है उसमें असली बँटवारे के काग़ज़ हैं। अगर वो काग़ज़ मिल गए, तो अदालत को यह नहीं ढूँढना पड़ेगा कि हरि सिंह ने कब कौन सा काग़ज़ बदला।"
मैंने कहा, "दफ़्तार में घुसना आसान नहीं।"
"आसान नहीं, नामुमकिन भी नहीं।"
तभी नीचे से आवाज़ आई। दरवाज़े पर कोई खड़ा था। मैंने सीढ़ियों से झाँका। शेखर बाबू थे। चश्मा टेढ़ा, शर्ट की एक बांह काग़ज़ से सनी, हाथ में फालतू काग़ज़ों का बंडल।
"अंदर आ रहा हूँ," उन्होंने कोई जवाब सुने बिना कहा और सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।
ऊपर आकर उन्होंने बंडल मेज़ पर रखा और सीधे मेरी तरफ़ देखा।
"मुझे पता है तुम किस तिजोरी की बात कर रहे हो।"
"कैसे?"
"क्योंकि वो तिजोरी मैंने खरीदी थी।"
हरीश चंद्र की ऐनक उतर गई। "तूने?"
शेखर बाबू ने हाथ जोड़ लिए। "चौदह साल पहले भवानी ने मुझे बुलाया था। कहा — बड़ी तिजोरी चाहिए, दो ताले वाली। मैंने तीसरा ताला भी लगवा दिया, बगल में, क्योंकि उसने कहा था कि कुछ काग़ज़ वो हैं जो ख़ुद भी नहीं देखता।"
"कोड?"
"तीन ताले। पहला और दूसरा नंबरों से। तीसरा चाबी से। नंबर मैंने ही तय किए थे।"
"क्या नंबर?"
शेखर बाबू का हाथ काँपने लगा। "चार-छह-नौ-तीन।"
मैंने पूछा, "तुमने पहले क्यों नहीं बताया?"
शेखर बाबू बैठ गए। कुर्सी पर। हाथ से अपना चश्मा उतारा और आँखों को रगड़ा।
"मेरी बेटी की शादी तय हो रही थी, मन्नू। बारह साल पहले। लड़का अच्छा था, घर अच्छा था। बस काग़ज़ एक था जो मेरे पास नहीं था। मैंने भवानी से कहा। उसने एक हफ़्ते में काग़ज़ करवा दिया — मेरे घर के सामने वाली ज़मीन का। मैंने कभी पूछा नहीं कि कैसे।"
वो रुके। आँखें लाल थीं।
"शादी हो गई। मेरी बेटी आज भी खुश है। पर हर बार जब वो ससुराल से आती है, मैं सिर झुकाकर बाहर चला जाता हूँ। क्योंकि मैं जानता हूँ — उस काग़ज़ के नीचे किसी का घर था।"
हरीश चंद्र ने धीरे से कहा, "शेखर…"
"बस अब नहीं, हरीश भाई।" शेखर बाबू ने ऐनक पहनी और मेरी तरफ़ देखा। "कोड मुझे याद है। पर उस तिजोरी में सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है।"
"और क्या है?"
शेखर बाबू ने मेज़ पर रखे बंडल से एक पन्ना निकाला और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"भवानी की तिजोरी की असली चीज़…" उन्होंने धीरे से कहा। "ये एक बंद मोम-छाप वाली डिबिया है। जो उसमें है, वो भवानी ने आज तक किसी को नहीं दिखाया। मैंने एक बार बाहर से ही देखा था, जब वो खोल रहा था।"
मैंने पन्ना खोला। उस पर बस एक लाइन लिखी थी, मेरी ही लिखाई जैसी —
"मोम-छाप के नीचे जो है, वो हिसाब नहीं है। वो हिसाब करने वाला है।"
रघुवीर ने पन्ना मेरे हाथ से लिया। पढ़ा। दो बार पढ़ा। फिर उलटा किया कि कहीं पीछे कुछ और लिखा हो।
"ये लिखाई…" उसने हरीश चंद्र की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा।
हरीश चंद्र ने ऐनक लगाई। पन्ने को रोशनी में उठाया। बहुत देर देखा।
"ये भवानी की लिखाई नहीं है," उन्होंने कहा।
"फिर किसकी है?" मैंने पूछा।
हरीश चंद्र ने चश्मा उतार दिया और सीधे मेरी तरफ़ देखा। "अदालत के उस बहीदार की। जिसने तेरे बाप के साथ बँटवारे का पहला पन्ना तैयार किया था। सुखदेव।"
मेरे मुँह से आवाज़ निकली, "सुखदेव?"
"भवानी का दफ़्तार चलाने वाला। बीस साल पहले मर गया।" हरीश चंद्र ने पन्ना मेज़ पर रख दिया। "सब कहते हैं उसकी मौत दिल का दौरा थी। पर जो आदमी भवानी के सारे हिसाब रखता है, वो अचानक नहीं मरता।"
शेखर बाबू ने बंडल खोला। उसमें पुराने काग़ज़ थे — कुछ फटे, कुछ पीले, कुछ पर मोम की बूँदें सूखी हुई।
"ये सब उसी दफ़्तार से निकले काग़ज़ों की कॉपी हैं," उन्होंने कहा। "जब भवानी ने दफ़्तार बदला था, तो पुराना सामान बाहर फिंकवाया था। मैंने उसमें से जो बचा, उठा लिया। सोचा कभी काम आएगा।"
हरीश चंद्र ने काग़ज़ उलटने शुरू किए। अचानक उनका हाथ रुक गया।
"मन्नू, ये देख।"
एक पन्ना था जिस पर मेरे बाप का नाम था। हरि सिंह। और उसके नीचे सुखदेव का दस्तख़त। पर हस्ताक्षर की स्याही कुछ अलग थी — जैसे बाद में किसी और ने उस पर से अपनी कलम चलाई हो।
"ये दस्तख़त जाली है," हरीश चंद्र ने कहा। "देख, नीचे सुखदेव के नाम की स्याही हल्की है, ऊपर से कोई और लिखकर गया है।"
रघुवीर ने कुर्सी पीछे खिसकाई। "मतलब बँटवारे का पहला काग़ज़ ख़ुद जाली था?"
"लगता तो है। और यही वो चीज़ है जो अदालत अब तक नहीं समझ पाई। सब लड़ रहे हैं उस काग़ज़ के ऊपर जो शुरू से झूठा है।"
मैंने पूछा, "तो असली काग़ज़ कहाँ है?"
शेखर बाबू ने अपना बंडल समेटा। "उसी तिजोरी में। जहाँ से सुखदेव की लिखाई वाला पन्ना आया है।"
बंसी ने दरवाज़े से सिर डाला। "चाय बन गई है। सब ठंडी हो रही है।"
"बंसी, अंदर आ," हरीश चंद्र ने कहा। "तू भी सुन ले।"
बंसी अंदर आया। हाथ में ट्रे थी। चार गिलास। पाँचवाँ उसने अपने लिए जेब से निकाला — छोटा सा, चाय से भरा हुआ।
"मैं पहले से सुन रहा था," उसने गिलास बाँटते हुए कहा। "सीढ़ी पर बैठा था।"
"तुझे कब से आदत है सीढ़ी पर बैठने की?" मैंने पूछा।
"जब से तेरे जैसे लोग ऊपर बैठकर बड़ी-बड़ी बातें करने लगे।"
शेखर बाबू ने चाय का एक घूँट लिया और फिर कहा, "दफ़्तार में घुसने का एक ही रास्ता है। रात को, सफ़ाई कर्मचारियों के साथ। भवानी के दफ़्तार की सफ़ाई नौ बजे शाम को होती है। दो आदमी आते हैं। एक बूढ़ा है, लंगड़ाता है — गफ़ूर। दूसरा उसका भांजा।"
"तू ये सब कैसे जानता है?" रघुवीर ने पूछा।
शेखर बाबू ने चाय रख दी। "क्योंकि गफ़ूर मेरे ही मोहल्ले में रहता है। और उसका भांजा — मेरी बेटी के ससुराल में काम करता है।"
"तो तू हमें उसके पास ले चल," हरीश चंद्र ने कहा।
"गफ़ूर डरेगा। भवानी का नाम सुनकर उसके हाथ काँपने लगते हैं।"
"डरेगा नहीं," मैंने कहा। "जब उसे पता चलेगा कि भवानी का हिसाब ही बंद होने वाला है, तो वो ख़ुद रास्ता दिखाएगा।"
बंसी ने चाय खत्म की और गिलास मेज़ पर रखा। "मैं गफ़ूर को जानता हूँ। दुकान पर कभी-कभी आता है, बीड़ी लेने। उसका एक काम है — वो भवानी के दफ़्तार में हर काग़ज़ की गंध पहचानता है।"
"गंध?"
"हाँ। उसने एक बार मुझसे कहा था — बेटा, उस दफ़्तार में तीन तरह की काग़ज़ गंध करती हैं। एक नई स्याही की, एक पुरानी स्याही की, और एक वो जिन पर मोम गिरा हो। मोम वाली गंध वो सबसे ज़्यादा पहचानता है। कहता है, मोम में किसी की आत्मा बंद होती है।"
शेखर बाबू ने डिबिया मेज़ पर रखी। "ये डिबिया भी मोम से बंद है।"
बंसी ने डिबिया उठाई। हल्की थी। उसने कान के पास लाया और हिलाया।
"अंदर कुछ है। भारी नहीं। काग़ज़ जैसा भी नहीं लगता।" उसने एक पल रुककर कहा। "और हाँ — इस डिबिया की गंध गफ़ूर की दुकान वाली गंध से मिलती है।"
"क्या मतलब?" मैंने पूछा।
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