The Token System – Chapter 70
"तो?"
"तो कल सुबह अस्पताल में कुछ होगा। वो औरत, वो थैला — यह सिर्फ़ हमारे लिए नहीं लिखा गया। भवानी के आदमी के पास भी ऐसा ही काग़ज़ पहुँचा होगा।"
मैंने सोचा। "फिर तो वो औरत ख़तरे में है।"
"हो सकता है वो औरत ख़ुद सब जानती हो।" बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "सुन, सुबह राजेंद्र डिब्बा खोलने आ रहा है। उससे पहले यह काग़ज़ वाला काम निपटाना है।"
"पर टोकन ने मना किया है।"
"टोकन ने मना किया है," बंसी ने धीरे से कहा, "कि यह काम तेरे हाथ का नहीं। मेरा नहीं कहा।"
मैं रुक गया।
"तू सुबह अस्पताल के पिछले फाटक पर जाएगा। पर वहाँ तू कुछ नहीं करेगा। सिर्फ़ देखेगा। और मैं अंदर रहूँगा — रिकॉर्ड कमरे के पास।"
"यह ठीक है?"
"टोकन तेरा है। उसने तुझे रोका है। मुझे नहीं।"
वह उठा और चला गया। दरवाज़े पर रुककर बोला, "सुबह सात बजे।"
रात बीती, पर नींद नहीं आई। चार बजे उठकर मैं आँगन में बैठ गया। आसमान में तारे थे। माँ भी उठ आईं। उन्होंने चाय बनाई। दोनों चुपचाप पी।
"डर लग रहा है?" उन्होंने पूछा।
"टोकन ने पहली बार मना किया है, माँ।"
"टोकन कभी कुछ मना नहीं करता," वे बोलीं। "वो सिर्फ़ रास्ता दिखाता है। यह तेरे समझने की बात है कि उसका मतलब क्या है।"
"मतलब?"
"जो काम तेरा नहीं, वो तू करेगा तो बिगड़ेगा। पर जो काम तेरे सामने हो रहा है, उसे देखना तेरा काम है।" उन्होंने चाय का कप रखा। "देखना भी कम नहीं होता।"
सात बजे मैं अस्पताल के पिछले फाटक के पास पहुँचा। सुबह की ठंडी हवा चल रही थी। फाटक बंद था। उसके पीछे कचरा पड़ा था और एक पुरानी साइकिल खड़ी थी।
मैं सड़क के उस पार एक चाय की दुकान पर बैठ गया। चाय वाला मुझे जानता था।
"इतनी सुबह?" उसने पूछा।
"काम है।"
उसने चाय दी। मैंने कप पकड़ा और नज़रें फाटक पर टिका दीं।
आठ बजे ठीक दो मिनट पहले एक औरत आई। सिर पर दुपट्टा, हाथ में काला थैला। उम्र पैंतालीस-पचास के बीच। शरीर भारी, चाल तेज़। वह सीधे फाटक के पास गई और दीवार से टिककर खड़ी हो गई, जैसे कोई पहले से यहाँ आता रहा हो।
मैंने चाय का कप रखा। वह अकेली थी। थैला उसने छाती से लगाया हुआ था।
तभी मुझे पीछे से आती एक गाड़ी की आवाज़ सुनाई दी। एक ऑटो रुका। उसमें से दो आदमी उतरे। एक पतला, एक मोटा।
वे औरत की तरफ़ बढ़े। पतले ने कुछ कहा। औरत ने सिर ऊपर उठाया और मुझे चौंकाते हुए उसने थैला उनकी तरफ़ नहीं बढ़ाया, बल्कि उल्टा उन्हें धक्का दिया।
"हट।"
पतला हँसा। "मालकिन ने बुलाया है। थैला दे, वरना —"
"वरना क्या?"
मोटे ने हाथ बढ़ाया। औरत ने थैले से कुछ निकाला — एक काग़ज़ का टुकड़ा। उसे फाड़ डाला और टुकड़े हवा में उड़ा दिए।
दोनों आदमी चौंक गए। वे टुकड़े बीनने के लिए झुके। औरत ने उसी पल का फ़ायदा उठाया और उल्टे पाँव भागी। वह उसी गली में घुस गई जहाँ सुबह गाड़ियाँ आती हैं।
मैं उठ खड़ा हुआ। मेरे पैर अपने आप उसकी तरफ़ बढ़े, पर माँ की बात याद आई — "तू कुछ नहीं करेगा। सिर्फ़ देखेगा।"
पर देखना मुश्किल था। वो औरत भाग रही थी और दो आदमी उसके पीछे।
तभी अंदर से आवाज़ आई।
अस्पताल के पिछले फाटक का ताला खुला और बंसी बाहर निकला।
"रुको," उसने पतले आदमी का हाथ पकड़ा।
पतला झटका देकर बोलाकर बोला, "तू कौन है?"
"रिकॉर्ड कमरे की चाबी बदली गई है। तुम लोगों को पता है कि अब अंदर क्या है?"
पतला रुक गया।
"कुछ नहीं पता?" बंसी ने जेब से एक काग़ज़ निकाला। "यह रसीद आज सुबह हमें मिली है। तुम्हारे मालिक के पिता के दस्तख़त के साथ। तुम्हारे मालिक का पूरा दावा इस एक काग़ज़ पर टिका था। और अब यह हमारे पास है।"
मोटे ने पतले को कोहनी मारी।
"चल यहाँ से।"
"पर थैला —"
"चल।" वे दोनों ऑटो में कूदे और गाड़ी चल पड़ी।
औरत कहीं गली में गुम हो चुकी थी।
मैं दौड़कर बंसी के पास पहुँचा।
"वह औरत कहाँ?"
"मुझे नहीं पता। पर उसने जो काग़ज़ फाड़ा," बंसी ने ज़मीन से एक टुकड़ा उठाया, "उसमें से हमें कुछ मिलेगा।"
वह टुकड़ा छोटा था, फटा हुआ। उस पर सिर्फ़ दो शब्द दिख रहे थे — "भवानी को।"
"मतलब वह औरत भवानी के पास जाने वाली थी?" मैंने पूछा।
"या भवानी को कुछ देने वाली थी।" बंसी ने टुकड़ा जेब में रखा। "और भवानी के आदमियों ने उसे रोका।"
मैंने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई। गली खाली थी। पर औरत कहीं गई तो होगी। मुझे याद आया — उसकी चाल। वह ऐसे भागी जैसे जगह जानती हो।
"वह इस इलाक़े की रहने वाली नहीं है," मैंने कहा। "पर वह जानती है कि कहाँ छिपना है।"
"या फिर," बंसी बोला, "उसे कोई यहाँ से उठाने आ रहा था।"
हम अस्पताल के अंदर गए। शेखर बाबू रिकॉर्ड कमरे के बाहर खड़े थे। उनका चेहरा सफ़ेद पड़ा था।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"अंदर आओ," उन्होंने धीरे कहा।
हम अंदर गए। रिकॉर्ड कमरे की दराज़ें खुली थीं। काग़ज़ात बिखरे पड़े थे। शेखर बाबू ने दराज़ के पीछे की ईंट दिखाई।
"वो ईंट यहाँ से हटी हुई थी?"
"नहीं," बंसी ने कहा। "रात में हमने उसे वैसे ही छोड़ा था जैसे मिला था। किसी ने इसे हटाया है।"
"और रसीद?"
"वह हमारे पास है।"
शेखर बाबू ने राहत की साँस ली।
"पर कुछ और गायब है," उन्होंने कहा। "रजिस्टर। वह जिसमें उस साल के सारे दस्तख़त दर्ज थे।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
"भवानी का काम है।"
"नहीं," शेखर बाबू ने सिर हिलाया। "रजिस्टर दराज़ के पीछे था, ईंट के साथ। जो इसे ले गया, वह जानता था कि कहाँ देखना है।"
"मतलब?"
"मतलब यह कि तुम्हारे और भवानी के बीच कोई तीसरा है।"
बाहर आते ही मेरी जेब में फिर गरमाहट हुई। मैंने निकाला — वही काग़ज़ था जो बंसी ने जेब में रखा था? नहीं, वह मेरी जेब में कब आया?
मैंने खोला। लकीरें पहले जैसी थीं। और उनके नीचे एक नई लकीर धीरे-धीरे उभर रही थी।
मैंने बंसी को दिया। उसने पढ़ा। उसके हाथ काँपे।
"क्या है?"
"भवानी का दादा का कोई नहीं था," बंसी ने धीरे कहा। "यह काग़ज़ हवेली से चुराया गया है। असली काग़ज़ आज भी हवेली में है।"
मैं सन्न रह गया।
बंसी ने काग़ज़ मेरे हाथ में वापस दिया।
"और नीचे लिखा है — 'यह काम तेरे हाथ का नहीं।'"
"फिर से?"
"हाँ। दूसरी बार।"
मैं उसी जगह खड़ा रह गया। भवानी का दादा का कोई नहीं था। जो काग़ज़ हमें मिला, वह चुराया हुआ था। और टोकन मुझे फिर रोक रहा था।
पर इस बार लकीर के नीचे एक और शब्द उभर रहा था — छोटा, हल्का, जैसे किसी ने बड़ी मुश्किल से लिखा हो।
"वह औरत ही असली है।"
॥
सुबह सात बजे मैं अस्पताल के पिछले फाटक पर खड़ा था। फाटक का लोहा ठंडा था, और मेरी जेब में सिर्फ़ पाँच सौ रुपये थे। टोकन राजेंद्र के सीलबंद लिफ़ाफ़े में बंद था, फिर भी उसकी आवाज़ कान में गूँज रही थी — "यह काम तेरे हाथ का नहीं।"
मैंने जेब में पड़ा वह काग़ज़ निकाला जिस पर लकीरें उभरी थीं। "वह औरत ही असली है" — बस यही लिखा था। और नीचे "तेरे हाथ का नहीं"।
तो फिर मैं यहाँ क्यों खड़ा हूँ?
बंसी कल रात कह गया था — "जब टोकन मना करे, तो समझ जा कि काम किसी और के हाथ से होना है। तुझे सिर्फ़ रास्ते पर खड़ा रहना है।"
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