The Token System – Chapter 69
दुकान का पर्दा हटा और रीना अंदर आई। माँ भी उसके पीछे थीं। रीना स्कूल से सीधे आई थी, कंधे पर बैग और हाथ में कॉपियों का बंडल।
"सुना," उसने बैग कुर्सी पर रखा, "शादी आगे बढ़ाने की बात चल रही है?"
लालाजी की तरफ़ देखकर वह रुकी।
"लालाजी, आप मेरे पिता जैसे हैं। पर एक बात साफ़ कर दूँ। शादी की तारीख़ आगे नहीं बढ़ेगी। तय वक़्त पर होगी।"
मैं खड़ा हो गया।
"रीना —"
"नहीं, भाई।" उसने हाथ उठाया। "तू तीन साल से मेरी शादी के लिए टोकन के पीछे भाग रहा है। अब मैं एक बात साफ़ कह देती हूँ — तू मेरी शादी के लिए जेल जाएगा, तो वह शादी नहीं, शोक होगा।"
दुकान में चुप्पी छा गई। बंसी ने चूल्हे की आग धीमी कर दी।
"तो शादी होगी," रीना ने कहा, "और मेरे पास अपनी कमाई है। दो साल की नौकरी है। मैंने दस हज़ार रखे हैं।"
माँ ने उसका हाथ पकड़ा, पर कुछ नहीं बोलीं।
लालाजी ने दोनों हाथ जोड़े।
"बेटी, मैं कुछ नहीं कह रहा। पर भवानी की धमकी सच्ची है। मेरी ज़मीन का काग़ज़ जब अदालत में जाएगा, तब —"
"तब क्या होगा?" रीना ने कहा। "आप हमारे साथ खड़े हैं, लालाजी। हम आपके साथ हैं। चोर को डरने की ज़रूरत है, हमें नहीं।"
अंकित ने पहली बार हाथ उठाया।
"दीदी सही कह रही हैं। पापा, आप मुझे हरदम डरते हुए देखते हो। पर मैं थक गया हूँ डरते-डरते।"
लालाजी की आँखें भर आईं। उन्होंने मुँह फेर लिया।
शेखर ने खाँसकर माहौल हल्का किया।
"एक बात और है। रिकॉर्ड कमरे से जो चाबी गई, वो सिर्फ़ ताला खोलने की नहीं। उस दराज़ में हवेली की चाबी थी।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"वो तो मिल गई थी।"
"मिल गई थी एक चाबी।" शेखर ने बैग खोला। "अस्पताल की असली रिकॉर्ड चाबी — वो दराज़ में नहीं, रिकॉर्ड कमरे की दीवार के पीछे एक हुक पर टँगी थी। मैंने लगा दी कल रात। पर आज सुबह वो हुक खाली था।"
बंसी ने करछुल ज़ोर से रखी।
"मतलब भवानी के आदमी अंदर घुसे रात को।"
"और क्या ले गए, क्या छोड़ा, मुझे नहीं पता।" शेखर ने चश्मा उतारकर साफ़ किया। "काग़ज़ जो असली थे, वो हमारे पास हैं। अब मैं सोच रहा हूँ — भवानी रिकॉर्ड कमरे में क्यों गया? वो कौन सा काग़ज़ था जो उसे रात को भी नींद नहीं लेने दे रहा?"
लालाजी ने जेब से रूमाल निकाला।
"मैं बताऊँ?" उन्होंने धीरे से कहा। "रसीदें। जो आपके दादा के नाम लिखी थीं। मैंने सुना था एक बार — हवेली के काम का हिसाब जो हरि सिंह ने हड़पा, उस में एक रसीद ऐसी थी जिस पर खुद भवानी के पिता का दस्तख़त था। वो रसीद अस्पताल के पुराने रिकॉर्ड में गई थी — किसी काम के सिलसिले में।"
शेखर की आँखें फैल गईं।
"और वो रसीद मेरे पास कभी नहीं आई।"
"या फिर आई, और तुमने देखी नहीं," बंसी ने कहा। उसने लालाजी की तरफ़ देखा। "क्या तुम रसीद का साल बता सकते हो?"
"मुझे नहीं पता। पर मेरे पिता कहते थे — उस पर साल लिखा था, जिस साल हवेली का बँटवारा हुआ था।"
शेखर उठ खड़े हुए।
"मैं अभी अस्पताल चलता हूँ। रखे-रखाए रिकॉर्ड की ढेरों खंगालनी हैं। अगर वो रसीद मिल गई," उनकी आवाज़ काँपी, "तो भवानी का दादा का दस्तख़त साबित होगा। भवानी का पूरा वंश एक काग़ज़ पर बैठा है।"
लालाजी भी उठे।
"मैं साथ चलता हूँ। अंकित, तू घर जा।"
"नहीं," अंकित ने कहा। "मैं भी चलूँगा। मुझे वो रसीद देखनी है।"
वे तीनों निकल गए। दुकान पर मैं, बंसी, माँ और रीना बचे।
रीना ने मेरा हाथ पकड़ा।
"भाई, एक बात कहूँ?"
"बोल।"
"तू जो काग़ज़ों के पीछे भागता है, वो ठीक है। पर आज तू मेरे साथ बाज़ार चल। मुझे कुछ काम है।"
मैं हँस पड़ा।
"मैं बाज़ार?"
"हाँ। शादी के लिए।"
हम बाज़ार गए। रीना ने कपड़े की दुकान से एक साड़ी उठाई, देखी, रख दी। दूसरी उठाई, फिर रख दी। मैं उसके पीछे खड़ा सोच रहा था कि यह औरत आज क्या कर रही है।
तीसरी दुकान पर उसने डिब्बे से एक सस्ती सी, सादी साड़ी निकाली।
"यही ठीक है।"
दुकानदार ने कीमत बताई — नौ सौ। रीना ने जेब से नोट निकाले और गिनकर थमा दिए।
"रीना," मैंने कहा, "इतनी सादी?"
उसने साड़ी लपेटते हुए कहा, "जिस दिन शादी होगी, उस दिन मेरे भाई की जेब में चोरी का पैसा नहीं होगा। यही मेरी सबसे बड़ी ज़ेवर है।"
मैं कुछ नहीं बोल पाया।
शाम को घर लौटे। माँ चूल्हे पर रोटी बना रही थीं। रीना साड़ी को शीशे के सामने पकड़कर देख रही थी।
तभी जेब में हल्की गरमाहट हुई। मैंने हाथ डाला। टोकन नहीं था — वह तो राजेंद्र के पास था। पर जेब में एक काग़ज़ था। छोटा, मुड़ा हुआ। उस पर एक लकीर।
मैंने खोला। लकीर थी — "कल, सुबह आठ बजे, अस्पताल का पिछला फाटक। एक औरत, एक थैला।"
मैं खिड़की के पास गया। रीना ने देखा।
"क्या है?"
"कुछ नहीं।"
"भाई।"
मैंने काग़ज़ उसे दिखा दिया। वह पढ़कर रुकी।
"यह टोकन की लकीर है? पर टोकन तो राजेंद्र के पास —"
"हाँ।"
"तो यह काग़ज़ कहाँ से आया?"
मैंने जेब टटोली। खाली थी, सिवा उस काग़ज़ के जो अभी उसमें आया था।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा।
माँ ने तवा उतार दिया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर उस काग़ज़ की तरफ़।
"जब टोकन दो हाथ में आते हैं," वे बोलीं, "तो हिसाब किसी एक हाथ में नहीं रहता। दोनों तरफ़ चलता है।"
"मतलब भवानी के पास भी ऐसा काग़ज़ आया है?"
"या उसके आदमी के पास।" माँ ने रोटी पर घी लगाया। "पर एक बात सोच — कल सुबह आठ बजे। राजेंद्र नौ बजे डिब्बा खोलेगा। यह लकीर उससे एक घंटा पहले की है।"
रात में मैं सो नहीं पाया। दस बजे बंसी का फ़ोन आया।
"शेखर को रसीद मिल गई।"
मैं बिस्तर से उठ बैठा।
"कहाँ?"
"रिकॉर्ड कमरे की पीछे वाली दराज़ में, ईंट के पीछे। लालाजी की बात सच निकली।"
"उस पर क्या लिखा है?"
"उस पर हरि सिंह का दस्तख़त नहीं," बंसी ने धीरे कहा। "उस पर भवानी के पिता का दस्तख़त है — कि हवेली के आधे काग़ज़ उन्होंने लिए, और बाकी कन्हैया माली के नाम छोड़े।"
"यह —"
"यह वही काग़ज़ है जो भवानी को रात भर जगाए हुए था। और अब यह हमारे पास है।"
मैंने फ़ोन रखा। काग़ज़ फिर जेब में हल्का गरम हुआ। मैंने निकाला। लकीर वही थी। पर उसके नीचे एक और लकीर धीरे-धीरे उभर रही थी, जैसे किसी ने अभी लिखा हो।
मैंने पढ़ा।
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"यह काम तेरे हाथ का नहीं।"
पहली बार। तीन साल में पहली बार। टोकन ने किसी काम को मना किया था।
खिड़की से बाहर देखा। गली में लालटेन जल रही थी, और उस लालटेन के नीचे कोई खड़ा था। बंसी।
वह दुकान की तरफ़ तेज़ क़दमों से आ रहा था।
बंसी दरवाज़े पर आकर खड़ा हो गया। उसकी साँस फूली हुई थी।
"तू जाग रहा है?" उसने पूछा।
"काग़ज़ आया।"
मैंने वह काग़ज़ उसे दिया। उसने पढ़ा। उसका चेहरा वैसे ही रहा, पर उसने काग़ज़ मेरे हाथ से लेकर जेब में डाल लिया।
"यह काग़ज़ मेरे पास रहेगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि तेरे पास कोई टोकन नहीं है और फिर भी काग़ज़ आ रहा है। इसका मतलब कुछ तो गड़बड़ है।"
उसने अंदर आकर चारपाई पर बैठते हुए कहा, "और एक बात। रसीद मिलने के बाद शेखर बाबू ने अस्पताल के रिकॉर्ड कमरे की चाबी बदलवा दी है। पर भवानी के आदमी को इसकी ख़बर हो गई। पता नहीं कैसे, पर हो गई।"
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