The Token System – Chapter 68
भवानी हँसा। "अच्छी कहानी है।"
"कहानी नहीं," माँ की आवाज़ आई।
मैं मुड़ा। माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। उनके पीछे रीना थी।
"माँ, आप यहाँ?"
"अंकित का संदेशा आया था," माँ ने कहा। "कह रहा था, भवानी कुछ करेगा।" वो अंदर आईं। "और भवानी, तेरे दादा की बात मत कर। मेरे ससुर ने ये टोकन इसलिए छुपाया था क्योंकि तेरे दादा ने उन्हें मारने की धमकी दी थी। हरि सिंह की गवाही में ये लिखा है।"
वकील ने काग़ज़ देखा। "ये गवाही असली नहीं लगती।"
"असली है," राजेंद्र ने कहा। "मेरे पास जाँच रिपोर्ट है।"
भवानी ने गाड़ी की चाबी जेब से निकाली।
"मुझे जाने दो, राजेंद्र। मेरे पास वकील है। मैं अदालत में मिलूँगा।"
राजेंद्र ने रास्ता दिया। भवानी दरवाज़े तक गया। फिर रुका। उसने पलटकर मेरी तरफ़ देखा।
"मन्नू, कल रात मैंने सोचा — तू ग़रीब है, तू लालच में आ जाएगा। पर तू नहीं आया।" उसने सिर हिलाया। "इसलिए आज मैंने ये तलाशी खुद करवाई। ताकि टोकन कानूनी तौर पर मेरे हाथ में आ जाए। पर राजेंद्र ने सब बिगाड़ दिया।" उसने राजेंद्र की तरफ़ देखा। "अभी नहीं, पर एक दिन।"
वो चला गया।
डॉक्टर सुमन आगे आईं।
"राजेंद्र, जब तक टोकन तेरे पास हैं, भवानी कुछ नहीं करेगा। पर एक बात — मेरी तबादले की फ़ाइल अभी रुकी नहीं है।"
"मैं जानता हूँ," राजेंद्र ने कहा। "इसीलिए ये लिफ़ाफ़ा कल सुबह तक किसी को नहीं दिखेगा, और न ही किसी की जेब में जाएगा।" उसने सील पर उँगली रखी। "कल सुबह नौ बजे, यहीं। सब आना।"
बाहर निकलते वक़्त अंकित ने मेरा हाथ पकड़ा।
"टोकन नहीं होने पर अब क्या?"
"अब," मैंने कहा, "बही है।"
लालाजी ने लिफ़ाफ़ा निकाला। "ये पाँच हज़ार। भवानी ने भेजे थे। अंकित ने मना कर दिया। मैंने सोचा, तुम्हें दे दूँ।"
"नहीं," मैंने कहा। "ये भवानी के पैसे हैं। इन्हें अदालत में जमा करा दो। हिसाब में लगेंगे।"
लालाजी ने लिफ़ाफ़ा वापस जेब में रखा। फिर बोले, "शादी की बात —"
"शादी होगी," माँ ने कहा। "जब हिसाब बराबर होगा।"
घर लौटे। मैंने बंसी से पूछा, "टोकन के बिना मैं क्या करूँ?"
बंसी हँसा। "भाई, तूने तीन साल में पहली बार ये सवाल पूछा है।" उसने चाय का प्याला आगे बढ़ाया। "टोकन के बिना तू वही कर, जो टोकन के साथ करता था। काग़ज़ ढूँढ, आदमी बचा, हिसाब उलझा। बस इस बार तेरे पास टोकन नहीं है। तेरे पास बही है।"
मैंने बही खोली। पन्ने पलटे। लकीरें, नाम, तारीख़ें, अंगूठे। तीन सौ नाम। हर नाम के आगे एक कहानी।
"इतने सारे," मैंने कहा।
"हर नाम एक आदमी है," माँ ने कहा। "और हर आदमी के पीछे एक परिवार।"
रीना ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"और एक बात," उसने कहा। "लालाजी के भतीजे ने कल रात अपनी माँ से बात की थी। कह रहा था, शादी के बाद वो अपनी पत्नी को भवानी के होम में काम नहीं करने देगा।"
मैं मुस्कुराया।
"देख रही है? हिसाब खुद शुरू हो गया, तेरी शादी से।"
शाम को नर्सिंग होम से फ़ोन आया। डॉक्टर सुमन थीं।
"मन्नू, तुम्हारे टोकन की एक बात बतानी है।"
"अब तो वो राजेंद्र के पास है।"
"जानती हूँ। पर जब वो वहाँ से निकले, तो उस पर लकीर लिखी थी। राजेंद्र ने मुझे दिखाई। लिखा था — 'कल सुबह नौ बजे, दोनों टोकन। एक ही हाथ में नहीं, एक ही मेज़ पर।'"
मैं चुप हो गया।
"मन्नू?"
"हाँ।"
"ये तलाशी में भवानी ने कोई चीज़ छोड़ी थी?"
"नहीं। बस मिठाई का डिब्बा।"
"वो डिब्बा खोलना," सुमन ने कहा। "राजेंद्र ने उसे सील करके रखा है। मैंने उसमें से एक काग़ज़ देखा था — नीला, मुड़ा हुआ। उस पर तुम्हारा नाम लिखा है।"
फ़ोन रखा। मैंने टोकन के बिना पहली बार जेब में हाथ डाला। खाली थी।
बंसी ने देखा। "क्या हुआ?"
"भवानी ने मिठाई के डिब्बे में कुछ छोड़ा है। मेरे नाम का।"
बंसी का चेहरा गंभीर हो गया।
"तो कल सुबह नौ बजे," उसने कहा, "हवेली में।"
"नहीं," मैंने कहा। "पहले राजेंद्र के पास। डिब्बा खुलेगा।"
रात में मैंने बही के पन्ने गिने। तीन सौ नाम। तीन सौ परिवार। मैंने माँ से पूछा, "इनमें से कोई बचा है?"
"कुछ बचे हैं। कुछ नहीं।" उन्होंने चाय का कप मेज़ पर रखा। "पर तेरे पास जो बही है, वो सिर्फ़ नाम नहीं है। वो सबूत है। कल अदालत में ये सब जाएगा। भवानी का हिसाब खुलेगा।"
"और टोकन?"
"टोकन राजेंद्र के पास है। अदालत तय करेगी।"
रीना ने दरवाज़े से कहा, "पर टोकन का काम तो अभी भी है। लिखा है — 'दोनों टोकन, एक ही मेज़ पर'।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"कल सुबह," मैंने कहा, "दोनों टोकन एक मेज़ पर होंगे। फिर चाहे वो मेज़ राजेंद्र की हो या अदालत की।"
बंसी ने खिड़की से बाहर देखा। "और भवानी?"
"भवानी कल सुबह आएगा," मैंने कहा। "क्योंकि उसने डिब्बा छोड़ा है। और उसे पता है कि हम उसे खोलेंगे।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "तो कल का दिन आसान नहीं होगा।"
"आसान दिन तो कभी नहीं था," मैंने कहा।
॥
बंसी की दुकान पर चारों कुर्सियाँ भर गईं और एक बेंच बाहर से खींचनी पड़ी। लालाजी बैठते ही हँसने लगे, इतनी ज़ोर से कि उनके कंधे हिल रहे थे।
"तीन बोरी काग़ज़," उन्होंने कहा, "तीन सौ नाम, और वकील साहब का मुँह ऐसा। मैंने आज तक ऐसा नहीं देखा।"
"खुश होने की बात है?" बंसी ने चाय रखते हुए पूछा।
"क्यों नहीं? मेरा घर बच गया। अंकित का केस। मेरी ज़मीन।"
अंकित कोने में बैठा था। उसके हाथ में चाय थी, पर वह उसे छू भी नहीं रहा था। दुबला चेहरा और भी सफ़ेद लग रहा था।
"पापा," उसने कहा, "आप खुश हो रहे हो, और मुझे रात भर नींद नहीं आई।"
लालाजी हँसी रोककर उसकी तरफ़ मुड़े।
"क्यों?"
"क्योंकि भवानी के दफ़्तर से कोई आया नहीं। कोई फ़ोन नहीं। कोई धमकी नहीं।" अंकित ने चाय हटा दी। "इतना बड़ा आदमी हारकर चुप बैठ जाए? वह चुप नहीं है। वह गिन रहा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। लड़का सही बोल रहा था, और यह बात मुझे भी खटक रही थी। भवानी ने हवेली में दोनों टोकन मेज़ पर रखे, वकील को अदालत का हुक्म देकर भेजा, और जब राजेंद्र ने सील कर दी तो बिना एक शब्द बोले निकल गया। उस आदमी के लिए यह सबसे डरावनी बात थी — चुप हो जाना।
शेखर बाबू दुकान के तख़्ते पर अपना बैग रखकर बैठे थे। उनका चश्मा आज ख़ुद ही धुँधला लग रहा था।
"अंकित ठीक कह रहा है," उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा। "आज सुबह मैं अस्पताल गया। रिकॉर्ड कमरे का ताला बदला हुआ था। नया ताला। मेरी चाबी नहीं लगी।"
बंसी ने चाय की केतली नीचे रख दी।
"किसने बदला?"
"अभी पता नहीं। पर यही नहीं —" शेखर ने रूमाल से पसीना पोंछा, "बाड़मेर का तबादला आदेश कल सुबह डाक से आ रहा है। मैंने मुख्य दफ़्तर में आदमी से पूछ लिया। डॉक्टर सुमन के नाम पर की तरह की बात पक्की हो गई।"
मैंने चाय का प्याला रखा।
"पर सुमन ने चिट्ठी लिखी है। अख़बार वाली।"
"चिट्ठी डाक में लगी है, और तबादला आदेश भी," शेखर ने कहा। "कौन पहले पहुँचेगा, इसका खेल है।"
लालाजी की हँसी पूरी तरह उतर गई। उन्होंने अपनी मूँछ पर हाथ फेरा।
"तो क्या एक दिन में सब पलट सकता है?"
"भवानी एक दिन में क्या, एक घंटे में सब पलट सकता है," बंसी ने कहा। "पर आज नहीं। आज हमारे पास बही है, तीन सौ नाम हैं, और हरि सिंह की गवाही है। कल की बात कल देखेंगे।"
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