The Token System – Chapter 699
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
“ज़हर,” बंसी ने कहा।
रघुवीर ने कुछ नहीं कहा।
माँ आगे आईं। उन्होंने रघुवीर के हाथ से वो चिट्ठी ली जो वो अभी तक पकड़े था, और उसे सीने से लगा लिया।
“ये चिट्ठी मेरे पास रहेगी,” माँ ने कहा।
“रख ले,” रघुवीर ने कहा। “पर एक बात कहनी है। मैंने अदालत में कहा — हवेली का आधा हिस्सा मेरा है। पर ये मेरा नहीं है।”
“मतलब?”
“मेरे बाप ने मरने से पहले कहा था — मेरा हिस्सा किशोरी को देना। क्योंकि किशोरी ने मेरे बाप को बचाया था।”
माँ रुकीं।
“तो तेरा हिस्सा अब मन्नू का है?”
“नहीं।” रघुवीर ने मेरी तरफ़ देखा। “मेरा हिस्सा अब हवेली के लोगों का है। जो भी हवेली में रहता है, जो भी हवेली का हिसाब रखता है। मैंने बीस साल बाहर रहकर काफ़ी सोच लिया। मुझे हिस्सा नहीं चाहिए। मुझे बस एक चीज़ चाहिए।”
“क्या?”
“अपने बाप का नाम। उसे हवेली के काग़ज़ पर फिर से लिखवाना।”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने धीरे से सिर हिलाया।
“हरीश चंद्र से बात करनी होगी,” मैंने कहा। “वो ही बता पाएगा कि ये कैसे हो सकता है।”
“परसों से पहले अर्ज़ी डालनी होगी,” हरीश चंद्र ने कहा। वो भी बाहर आ चुके थे। “और एक बात — अगर रजिस्टर भवानी के गोदाम में है, तो उसे लाना पड़ेगा।”
“गोदाम का पता?” रघुवीर ने पूछा।
“मेरे पास है,” मैंने कहा। “शेखर बाबू ने कल रात ही बताया। खेत्री के बाहर, पुराने सीमेंट फैक्टरी के पीछे।”
रात हम लोगों ने मिलकर एक फ़ैसला किया। सुबह होते ही गोदाम जाना था। पर रात को ही टोकन पर लकीर उभरी — चौदहवीं।
और शब्द — “देर मत कर।”
मैंने माँ को जगाया। माँ ने मेरी आँखों में देखा और कुछ नहीं पूछा। बस पानी का लोटा भरकर दिया।
“जा,” माँ ने कहा। “बंसी को साथ ले। और हाँ — रघुवीर को भी। वो तेरे पापा का दोस्त है।”
“दोस्त?”
“पापा ने उसे हवेली से बाहर भेजा था, पर दोस्ती नहीं तोड़ी। उस रात रघुवीर गाड़ी में नहीं बैठा था। वो पीछे भाग रहा था, पैदल। पापा ने उसे गाड़ी में बैठाया।”
“माँ, तुझे ये सब पता था?”
“अब पता चल रहा है,” माँ ने कहा। “जब तू बड़ा हो रहा था, तब मैं तेरे पापा से नाराज़ थी। इसलिए कुछ पूछा नहीं। बस हिसाब संभालती रही।”
मैंने बंसी को फ़ोन किया। उसने दो बजे का समय सुना और बोला, “ठीक है। मैं तीन बजे तेरे दरवाज़े पर।”
“दो बजे क्यों नहीं?”
“क्योंकि मुझे चाय पीनी है और तेरे घर की चाय में चीनी कम है।”
मैं हँसा। तीन बजे बंसी आया। रघुवीर पहले से खड़ा था, लाठी हाथ में। उसके चेहरे पर वो घमंड नहीं था जो दोपहर में अदालत में था। बस थकान थी।
“एक बात कहूँ?” उसने कहा।
“कह।”
“तेरे पापा ने मुझे गाड़ी में बैठाया था, उस रात। और कहा था — रघुवीर, अगर मैं न लौटूँ, तो मन्नू को बताना कि हिसाब ख़ून से नहीं, काग़ज़ से बराबर होता है।”
मेरा गला सूख गया।
“तू मुझे कब बताने वाला था?”
“आज बता रहा हूँ।”
बंसी ने गाड़ी स्टार्ट की। खेत्री की सड़क सुनसान थी। रास्ते में एक बार रघुवीर ने पीछे देखा और बोला, कोई आ रहा है। मैंने पीछे देखा — सफ़ेद गाड़ी, दूर, बत्ती बंद।
“भवानी का आदमी?”
“या भवानी ख़ुद।”
गोदाम के गेट पर पहुँचकर बंसी ने गाड़ी रोकी। ताला लगा था। रघुवीर ने लाठी उठाई, पर मैंने रोका।
“रुक। ताले में चाबी है।”
“कहाँ से आई?”
“अदालत से। शेखर बाबू ने दी। कहा — गोदाम का ताला अदालत ने ज़ब्त किया है, पर चाबी मेरे पास है।”
मैंने ताला खोला। गोदाम के अंदर धूल और सीलन थी। बोरे पड़े थे, पुराने टायर, लोहे के ड्रम। रघुवीर ने टॉर्च जलाई।
“तिजोरी कहाँ होगी?”
“पीछे,” मैंने कहा। “शेखर बाबू ने बताया — पीछे की दीवार के पास।”
हम पीछे गए। दीवार के पास एक मोटी लोहे की तिजोरी थी, ज़ंग लगी, दो ताले। उसके ऊपर एक लकड़ी का बक्सा रखा था।
मैंने बक्सा खोला। अंदर रजिस्टर — काली जिल्द, मोटा, धूल से ढका। साथ में एक छोटा लिफ़ाफ़ा।
“रजिस्टर मिल गया,” मैंने कहा।
तभी पीछे से आवाज़ आई।
“बहुत बढ़िया।”
हम तीनों मुड़े। भवानी दरवाज़े पर खड़ा था। उसके पीछे चार आदमी थे।
“भवानी,” रघुवीर ने कहा। “तू अब भी वही है।”
“मैं वही हूँ,” भवानी ने कहा। “पर तुम तीनों ने रात में मेरा गोदाम क्यों खोला, ये मुझे अभी बताओ।”
“अदालत का हुक्म,” मैंने कहा। “ये रजिस्टर अदालत का कब्ज़ा है।”
“अदालत का हुक्म मेरे गोदाम पर नहीं चलता।”
“चलेगा,” बंसी ने कहा, और बाहर सीटी बजाई।
दो सिपाही अंदर आए। भवानी के आदमी पीछे हटे।
“राजेंद्र ने भेजा है,” बंसी ने कहा। “अदालत के हुक्म के तहत ज़ब्ती। भवानी, तू अब चुपचाप जा। वरना तेरे चारों आदमी भी हिरासत में जाएँगे।”
भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में गुस्सा नहीं था। कुछ और था — जो मैंने पहले कभी उसके चेहरे पर नहीं देखा था।
“मन्नू,” वो बोला। “तूने मेरे बाप को हरा दिया।”
“तेरे बाप ने ख़ुद को हराया है,” मैंने कहा। “मैंने सिर्फ़ हिसाब खोला है।”
भवानी चला गया। उसके आदमी भी गए। मैंने रजिस्टर उठाया। पहला पन्ना खोला। शीर्षक था — “हिस्से।”
नीचे तीन नाम — भगवान सिंह, किशोरी, और एक नाम जो मिटाया हुआ था। उसके नीचे सिर्फ़ लकीर बची थी।
“ये तीसरा नाम,” रघुवीर ने कहा। “ये हरि सिंह का है। उसने ख़ुद अपना नाम मिटाया, ताकि कोई न पूछे।”
“पर इसके नीचे लिखा है,” बंसी ने उँगली रखी — “चौथा हिस्सा — जिसका नाम नहीं। वो नींव में।”
“नींव में,” मैंने दोहराया।
“और नीव तेरे घर के पीछे वाले कमरे में है,” रघुवीर ने कहा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“क्या बोला?”
“तेरे घर के पीछे वाला कमरा — जिसकी सीढ़ी दीवार में है। वही हवेली की पुरानी नींव है।”
मेरे हाथ से रजिस्टर फिसलने लगा। बंसी ने पकड़ा।
“मतलब तीसरा ताला मेरे ही घर में था?”
रघुवीर ने लाठी टेक दी।
“हाँ। और तेरे दादा ने इसे इसीलिए चुना — क्योंकि वहाँ कोई नहीं ढूँढता।”
मैंने गाड़ी में बैठते हुए टोकन जेब में हाथ डाला। ठंडा था। मैंने निकाला। कोई शब्द नहीं। बस चौदहवीं लकीर के नीचे एक और उभर रही थी। पंद्रहवीं।
बंसी ने पूछा, “क्या?”
“पंद्रहवीं।”
“मतलब?”
“मतलब काम बाकी है।”
गाड़ी घर की तरफ़ मुड़ी। रास्ते में रघुवीर ने कहा, “एक बात और। मेरे बाप की चिट्ठी में लिखा था — नींव वाला हिस्सा उस आदमी का है जो हवेली में ईमानदार रहा।”
“कौन?”
“वो मरे हुए हैं शायद। पर नाम लिखा है। तेरे दादा ने लिखा था — ‘सुखिया बद्री उमराव के घर में’। ”
“अब ये सुखिया कौन है?”
“पता नहीं। पर किशोरी का छोटा भाई था, ऐसा मेरे पापा कहते थे। और हवेली के काग़ज़ से उसका नाम मिटाया गया।”
बंसी ने गाड़ी रोक दी। “रुक।”
“क्या?”
“सुखिया। मेरे ससुर की रसीद पर भी ‘सु’ अक्षर था। मुझे लगता है वो नाम मेरे घर से ही गायब किया गया।”
“पर किसने?”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “मैं कह चुका हूँ — मेरे चाचा पर शक है।”
मैंने सामने देखा। घर की गली आ रही थी। दरवाज़े पर माँ खड़ी थीं। उनके हाथ में एक दीया था。
गाड़ी रुकी। मैंने रजिस्टर सीने से लगाया और नीचे उतरा। माँ ने दीया ऊपर उठाया।
“मिल गया?”
“मिल गया।”
“तो अंदर चल। तेरे पापा का कमरा अब भी बंद है। आज उसे खोलेंगे।”
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