The Token System – Chapter 698
“सरोज, तूने मुझे पहचाना, पर तेरे पति ने मुझे हवेली से बाहर धकेला था।”
॥
रघुवीर की आवाज़ अदालत के पत्थरों पर गिरी और सब लोग चुप हो गए।
“तेरे पति ने मुझे धकेला नहीं,” माँ ने कहा। उनका गिलास पहले ही टूट चुका था, अब हाथ खाली थे, और आवाज़ में वो कंपन नहीं था जो सुबह था। “तेरे पापा ने ख़ुद तुझे बाहर भेजा था। क्योंकि तेरे बाप ने उनसे कहा था — रघुवीर को हवेली से दूर रखना।”
रघुवीर का मुँह खुला रह गया।
“क्या?”
“बैठ,” हरीश चंद्र ने कहा। “अब तेरी बारी है सुनने की।”
रघुवीर बेंच पर बैठा। लाठी उसके घुटनों के बीच खड़ी रही। उसने चिट्ठी खोली, देखा, फिर मेरी तरफ़ बढ़ाई।
“पढ़। तेरे दादा के हाथ की लिखाई है।”
मैंने चिट्ठी ली। काग़ज़ पीला था, किनारे चूमे हुए, स्याही भूरी।
“मेरे पापा भगवान सिंह हवेली के असली हक़दार थे,” रघुवीर ने कहा। “हरि सिंह उनका मुंशी था। ज़मीन के काग़ज़ उसके हाथ से गुज़रते थे। एक दिन उसने काग़ज़ बदल दिए। जब पापा को पता चला, तब तक हरि सिंह ने हवेली के तीन हिस्से अपने नाम कर लिए थे।”
“और भगवान सिंह?” मैंने पूछा।
“पापा ने विरोध किया। तो हरि सिंह ने शहर में बात उड़ा दी — भगवान सिंह ने हवेली के पैसे खाए हैं, गरीबों का हक़ मारा है। लोगों ने सुन लिया। पापा को शहर छोड़ना पड़ा। बसवा चले गए। मैं तब नौ साल का था।”
बंसी मेरे पास आकर बैठा। उसने धीरे से कहा, “ये आदमी अदालत में भवानी के साथ आया था। अब हमारे सामने कहानी सुना रहा है।”
रघुवीर ने सुना। वो मुस्कुराया, फिर हँसा। “बंसी, मैं भवानी के साथ इसलिए आया था ताकि वो मुझे पहचान न सके।”
“क्यों?” बंसी ने पूछा।
“क्योंकि भवानी के पास तिजोरी की दूसरी चाबी है। अगर उसे पता चलता कि मैं भगवान सिंह का बेटा हूँ, तो वो ताला बदल देता। मैं उसके साथ चलता रहा, उसकी बातें सुनता रहा, और चुप।”
“फिर तूने टोकन की बात कब जानी?” मैंने पूछा।
“जब किशोरी ने मुझे लाठी थमाई।” रघुवीर ने लाठी उठाई और हैंडल घुमाया। “ये चिट्ठी उसने मुझे तब दी जब मैं पंद्रह साल का था। कहा — जब हवेली का हिसाब खुले, तब ये खोलना।”
माँ ने कहा, “ये चिट्ठी तो पापा ने आठ साल पहले जला दी थी।”
रघुवीर ने माँ की तरफ़ देखा। “जो जली थी, वो नकल थी। किशोरी ने तेरे पति को नकल दी थी। असली उसने लाठी में छिपा दी थी।”
“क्यों छिपाई?”
“क्योंकि तेरे पति को भवानी खोज रहा था। अगर चिट्ठी उनके पास मिलती, तो वो जल जाती।”
मैंने चिट्ठी पढ़नी शुरू की। लिखा था —
“भगवान सिंह की लिखी। हवेली का आधा हिस्सा मेरा है। बाकी आधा किशोरी का। हरि सिंह ने सब छीना। हवेली की उत्तर वाली दीवार से पीछे की तरफ़ जाना, नीचे की तीसरी ईंट के पीछे रजिस्टर है। उसमें असली हिस्से लिखे हैं। जो ये रजिस्टर खोलेगा, वो किसी का नहीं होगा — सच का होगा।”
“तूने ये रजिस्टर क्यों नहीं निकाला?” मैंने पूछा। “तेरे पास चिट्ठी थी।”
रघुवीर ने लाठी टेक दी।
“मैं तब छोटा था। फिर बाप बीमार पड़े। फिर बसवा में हमें चुपचाप रहना पड़ा। हरि सिंह का आदमी हमारे पीछे था। जब मैं जवान हुआ, तब तक हवेली पर भवानी बैठ चुका था और पापा काग़ज़ों पर हस्ताक्षर कर चुके थे।”
“हस्ताक्षर?” बंसी ने सिर उठाया।
“हाँ। जब पापा बीमार थे, भवानी ने उनसे अंगूठा लगवाया। कहा — हवेली की मरम्मत करानी है। पापा ने अंगूठा लगा दिया। और वो काग़ज़ बन गया हवेली का बैनामा।”
मैंने माँ की तरफ़ देखा। माँ की नज़र ज़मीन पर थी।
“मन्नू,” माँ ने कहा। “यही बात है। मैंने तुझे क्यों नहीं बताया — क्योंकि तेरे पापा ने कहा था, जब तक मन्नू ख़ुद हिसाब न खोले, उसे कुछ मत बताना।”
“और अब?” मैंने कहा।
“अब तू ख़ुद खोल चुका है।”
हरीश चंद्र ने काग़ज़ उठाया। “देखो, चिट्ठी लिखने की तारीख़ दस साल पुरानी है। पर इसमें लिखा है रजिस्टर उत्तर वाली दीवार की तीसरी ईंट के पीछे। आज जो दीवार खुली, उसमें क्या मिला? एक पीतल की डिबिया, एक फटा काग़ज़। रजिस्टर नहीं।”
“तो रजिस्टर कहाँ है?” मैंने पूछा।
भवानी पीछे से बोला। “मेरे गोदाम में।”
सब उसकी तरफ़ मुड़े।
“क्या बोला?” जज ने कहा।
“मेरे गोदाम में,” भवानी ने दोहराया। “मेरे दादा ने रजिस्टर उसी रात निकाल लिया था। उत्तर वाली दीवार से। उन्होंने नहीं जाना कि किशोरी ने चिट्ठी में ये बात लिख दी है।”
“तो तू अब तक चुप क्यों था?”
“क्योंकि रजिस्टर का पता मुझे कल रात पता चला।”
रघुवीर खड़ा हो गया। “झूठ। तूने रजिस्टर रात में निकाला? अदालत का आदेश था — ईंट नहीं हिलेगी।”
“गोदाम मेरा है। मेरे गोदाम में कब आदेश लगा?”
जज ने हथौड़ा मारा। “बहस बंद। रघुवीर, तूने अभी कहा — तेरे पास तीसरे ताले की चाबी है। दिखा।”
रघुवीर ने लाठी का हैंडल पलटा। नीचे एक छोटी पीतल की चाबी निकली, तीन दाँतों वाली, घिसी हुई, जीभ जैसी लटकी।
“ये चाबी मेरे बाप ने मरने से पहले मेरे हाथ में दी थी। कहा था — ये हवेली के उस ताले की है जिसे कोई नहीं खोल पाया। तीसरा ताला।”
जज ने लपककर चाबी ली। “शेखर बाबू, ये चाबी अभी तिजोरी पर आज़माओ। अदालत के सामने।”
शेखर बाबू आगे आए। तिजोरी के तीसरे ताले में चाबी डाली। दाँते फ़िट हुए। घुमाई। ताला खुला।
अंदर से एक चमड़े की थैली निकली। शेखर बाबू ने खोली। उसमें थे — चार पुराने तांबे के सिक्के, एक लकड़ी का पत्ता जिस पर फीकी स्याही में कुछ लिखा था, और एक सिली हुई छोटी पुड़िया।
जज ने पत्ता उठाया। पढ़ा। फिर सिर उठाया।
“यहाँ लिखा है — ‘तीन हिस्से। तीन दोस्त। एक हवेली। जो चौथा हिस्सा छुपा है, वो नींव में है।’ ”
“नींव में?” मैंने कहा।
“हाँ। और उसके नीचे दो लाइनें — ‘जो इसे पढ़े, वो अपना हिसाब ख़ुद बराबर करे। कोई किसी का मालिक नहीं।’ ”
माँ ने कुर्सी पकड़ ली। “ये तो मेरे ससुर की लिखाई है।”
भवानी ने आगे कदम बढ़ाया। “जज साहब, ये सब मेरे दादा का इंतज़ाम था। मेरा इससे कोई वास्ता नहीं।”
रघुवीर हँसा।
“भवानी, तेरे दादा का इंतज़ाम था तो तू उनका पोता है। हिसाब तेरे नाम चला।”
“चुप।”
जज ने हथौड़ा मारा। “दोनों चुप। अब मैं सिर्फ़ एक बात कहूँगा। ये अदालत सिर्फ़ काग़ज़ नहीं देखती। ये हिसाब देखती है। और ये चाबी और ये पत्ता बताते हैं कि हवेली का हिसाब अभी पूरा नहीं हुआ। सुनवाई परसों सुबह दस बजे। तब तक हवेली, तिजोरी, चाबी और ये सब अदालत के कब्ज़े में।”
“और रघुवीर?” हरीश चंद्र ने पूछा।
“रघुवीर पेशी पर पूरा सच लाए। मन्नू, तू भी। भवानी, तू भी। अब जाओ।”
मैं बाहर निकला। रघुवीर मेरे पीछे आया। बंसी ने उसका रास्ता रोका।
“एक बात पूछनी है।”
“पूछ।”
“तूने अभी बताया कि तेरे पापा ने तुझे चिट्ठी दी थी। तो तेरे पापा कब मरे?”
“पंद्रह साल पहले।”
“कैसे?”
रघुवीर रुका। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर बंसी की तरफ़।
“हरि सिंह के आदमी ने बसवा में हमें खोज निकाला। रात थी। पापा ने मुझे पीछे के कुएँ से निकाला। फिर बीमार पड़ गए। तीन महीने बिस्तर पर रहे। और एक सुबह मर गए।”
“बीमारी क्या थी?”
“डॉक्टर ने कहा — पेट की बीमारी। पर जब मैंने उनका पानी का गिलास देखा, उसमें नीचे सफ़ेद पाउडर बैठा था।”
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