The Token System – Chapter 696
“माँ।”
उन्होंने सिर उठाया। उनके हाथ काँप रहे थे। रीना पास ही खड़ी थी, आँखें लाल।
“बैठ,” माँ ने कहा। “बंसी, तू भी।”
मैं बैठ गया। माँ ने कॉपी पर हाथ रखा।
“मैंने इसे रात भर पढ़ा है,” उन्होंने कहा। “हरीश चंद्र ने नकल मेरे हाथ में दी थी, ये कहकर — तेरी बेटी के लिए। पर मैंने इसे पहले पढ़ा।”
“और क्या पढ़ा?”
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। “तेरे दादा का नाम। उस पन्ने पर, जहाँ लिखा है कि हरि सिंह ने दूसरा टोकन बनवाया। तेरे दादा गवाह थे।”
रीना ने पानी का गिलास मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने नहीं लिया।
“तो दादा ने टोकन क्यों छुपाया?”
माँ ने कॉपी बंद कर दी। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़।
“क्योंकि भवानी के दादा उसे बेचना चाहते थे। हरि सिंह को उस बिक्री का पैसा चाहिए था। हवेली का हिस्सा, काग़ज़, सब। उसने तेरे दादा को कहा — टोकन मेरे हवाले कर, तेरा हिस्सा दुगना कर दूँगा।”
“और दादा ने मना कर दिया।”
“दादा ने कहा — ये टोकन मेरा नहीं, हिसाब का है। हिसाब बेचा नहीं जाता।” माँ ने मेरी तरफ़ देखा। “उसी रात उन्होंने इसे दीवार में रखा।”
बंसी ने आगे झुककर पूछा, “और उस रात हवेली में कौन-कौन था?”
माँ चुप हो गईं। उन्होंने कॉपी को गोद से हटाया, और अपनी साड़ी का कोना ठीक किया — जैसे शब्द तलाश रही हों।
“तेरे दादा,” उन्होंने कहा। “और हरि सिंह का एक आदमी। और…” उनका गला रुक गया। “एक और आदमी था। जो दरवाज़े के बाहर खड़ा था। उसने कुछ नहीं कहा, बस देखता रहा।”
“कौन था वो?”
“मुझे उसका नाम नहीं पता। पर जब वो गया, तो तेरे दादा ने मुझसे कहा था — सरोज, ये आदमी हमारा नहीं, हमारे साथ है। इसे कभी मत भूलना।”
दरवाज़े पर दस्तक हुई। तीन बार, धीरे। रात के इस वक़्त कोई भी आता है तो या तो भवानी का आदमी होता है या ख़बर। मैंने टोकन जेब में दबाया और दरवाज़ा खोला।
सामने वही साठ साल का आदमी खड़ा था। सफ़ेद कुर्ता, सिर पर टोपी, हाथ में वही लाठी। उसके चेहरे पर वही हल्की मुस्कान थी जो अदालत के बाहर भवानी के साथ थी।
“मनोहर,” उसने कहा। आवाज़ भारी थी, जैसे किसी पुराने कुएँ से आ रही हो। “मैं तेरा इंतज़ार कर रहा था।”
“आप कौन हैं?”
“मेरा नाम रघुवीर है।” उसने लाठी ज़मीन पर टिकाई। लकड़ी की ठक् की आवाज़ घर के अंदर तक गई। “और ये हवेली मेरे बाप की है।”
पीछे से माँ का गिलास छूट गया। काँच टूटा, पानी फ़र्श पर फैल गया। माँ चौकी से उठकर खड़ी हो गईं, उनका चेहरा सफ़ेद।
“तू…” माँ की आवाज़ फटी। “तू वही है। जो पंद्रह साल पहले हवेली के दरवाज़े पर रोया था।”
रघुवीर ने माँ की तरफ़ देखा और उसकी आँखें भर आईं। “सरोज। तूने मुझे पहचाना।”
“तू ज़िंदा है,” माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मैंने बहुत पहले सुना था — डर और राहत, दोनों एक साथ।
रघुवीर अंदर आया। उसने अपनी लाठी वहीं दीवार के सहारे खड़ी की, और उसकी नोक खोलने लगा। लाठी के हैंडल में एक धागा घूमा, और अंदर से एक पुरानी, मुड़ी हुई चिट्ठी निकली। काग़ज़ पीला पड़ चुका था, किनारे चीरे हुए।
“ये मेरे बाप की लिखाई है,” रघुवीर ने कहा। “और इसमें वो नाम है जो तेरे दादा ने उस रात देखा था।”
“कौन?” मैंने पूछा। “कौन था वो आदमी?”
रघुवीर ने चिट्ठी मेरी तरफ़ बढ़ाई, पर मेरे हाथ तक आने से पहले रुक गया। उसने मेरी माँ को देखा।
“सरोज,” उसने कहा। “तेरे पति ने मुझे हवेली से बाहर धकेला था। पर उससे पहले मैंने उन्हें एक बात कही थी — और वो बात आज तक किसी को नहीं पता।”
माँ ने उसकी तरफ़ देखा, आँखें सिकोड़कर। “कौन सी बात?”
रघुवीर ने चिट्ठी खोली। उसमें से एक और छोटा काग़ज़ गिरा — किसी पुरानी तस्वीर का कोना। उसने उसे उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
“पहले ये देख,” उसने कहा। “फिर तू ख़ुद समझ जाएगा कि तीसरा ताला किसने खोला था।”
मैंने काग़ज़ पकड़ा। एक पुरानी तस्वीर का कोना था, और उस पर सिर्फ़ दो चीज़ें दिख रही थीं — एक हाथ जिसमें पीतल की चाबी थी, और उसके पीछे धुँधली-सी एक दीवार जिस पर कोयले से एक नाम लिखा था। वही नाम जो हवेली की दीवार पर मिला था।
“ये तस्वीर किसकी है?” मैंने पूछा।
“तेरे दादा की,” रघुवीर ने कहा। “और उनके हाथ में जो चाबी है — वो चौथे दराज़ की है। जो आज तक कोई नहीं खोल पाया।”
माँ ने रघुवीर की तरफ़ देखा और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। “तू पंद्रह साल से कहाँ था? तूने हमें क्यों नहीं बताया?”
रघुवीर ने अपनी लाठी उठाई और उसकी नोक से ज़मीन पर एक गोला बनाया — धूल में। फिर उसने उस गोले के बीच में एक लकीर खींची।
“मैं इस गोले में था,” उसने कहा। “पंद्रह साल से। एक कमरे में, जिसे किसी ने हवेली नहीं कहा। किसी ने बंद अस्पताल कहा।” उसने लाठी उठाकर मेरी तरफ़ देखा। “और मेरा नाम किशोरी है। किशोरी — जो हिसाब का खाता है, हवेली का नहीं।”
मेरे हाथ से टोकन फिसला। इस बार मैंने उसे गिरने नहीं दिया — मैंने उसे अपनी हथेली में कस कर पकड़ा। वो ठंडा नहीं था। वो हल्का गरम था।
“अब समझा?” रघुवीर ने कहा। “जिसे तू किशोरी समझ रहा था, वो तेरा दादा है। और तीसरे ताले की चाबी मेरे पास नहीं है। वो तेरे पास है।”
“क्या मतलब?”
“तेरे दादा ने टोकन दीवार में रखते वक़्त, उसके साथ एक चिट्ठी भी रखी थी। उस चिट्ठी में लिखा था — जो मेरे हिसाब को पूरा करेगा, वही मेरा तीसरा ताला खोलेगा। और वो ताला सिर्फ़ उसी हाथ से खुलेगा जो सच बोलता है।”
मैंने माँ की तरफ़ देखा। माँ ने अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया था।
“तो तीसरा ताला क्या है?” बंसी ने पूछा। “कहाँ है वो?”
रघुवीर ने अपनी लाठी की तरफ़ देखा। “वो ताला जिसे भवानी का दादा ढूँढ रहा था, और नहीं मिला।” उसने गोला मिटा दिया। “वो ताला हवेली में नहीं है। वो तेरे घर में है। और वो चाबी — वो तेरे दादा ने किसी और को दी थी, जो आज तक चुप है।”
माँ ने हाथ नीचे किए। उनकी आँखें लाल थीं, पर आवाज़ अब टूट नहीं रही थी।
“रघुवीर,” उन्होंने कहा। “तेरे बाप ने उस रात क्या देखा था?”
रघुवीर ने मेरी तरफ़ देखा। एक लंबी साँस ली।
“मेरे बाप ने देखा था कि हवेली की दीवार में दो टोकन हैं — एक भवानी के पास, एक तेरे दादा के पास।” उसने चिट्ठी मेरी तरफ़ बढ़ाई। “और तीसरा टोकन किसी और के पास था, जो दीवार के पीछे छिपा बैठा था। वो तीसरा आदमी कभी बाहर नहीं आया। पर उसने अपना चेहरा ज़रूर दिखाया — उस रात।”
“कौन था वो?” मैंने पूछा, आवाज़ फटी हुई।
रघुवीर ने चिट्ठी खोली। उसके आख़िरी हिस्से में एक नाम लिखा था — मेरे दादा की लिखाई में। और उस नाम के नीचे एक लाइन।
“तेरे दादा ने लिखा है,” रघुवीर ने कहा। “जो आज नहीं आया, वो कल आएगा। और जो कल आएगा, वो तीसरा ताला खोलेगा।”
मैंने वो काग़ज़ अपने हाथ में लिया। उस पर नाम साफ़ लिखा था — और वो नाम मेरे घर के किसी ऐसे आदमी का था जिसे मैंने कभी ज़िंदा नहीं देखा। पर माँ ने देखा था। माँ ने उसे पहचाना।
“ये नाम…” माँ ने धीरे से कहा। “ये तो…”
“हाँ,” रघुवीर ने कहा। “तेरे ससुर का नाम। जो मर चुके हैं। पर उनकी चाबी आज भी किसी के पास ज़िंदा है।”
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