The Token System – Chapter 695
"पापा की मौत के तीसरे दिन। घाट पर। वो वहीं खड़ा था, जैसे मेरा ही इंतज़ार कर रहा हो।"
मेरे पीछे चूल्हे की लौ कड़कड़ाई। सुखिया ने कुछ सोचा, फिर बोली, "मन्नू, एक बात है जो मैंने अदालत में नहीं कही।"
"क्या?"
"उस आदमी ने रसीद देते वक़्त मेरा हाथ पकड़ा था। उसकी हथेली पर ज़ख्म का निशान था — पुराना, गोल, सिक्के जैसा। और उसने मुझसे कहा था — 'जिस दिन भवानी हारेगा, उस दिन मैं ख़ुद आकर रसीद वापस लूँगा। मेरा हक़ मुझे चाहिए।'"
"हक़?" मैंने कहा। "कौन-सा हक़?"
सुखिया ने कंधे उठाए। "वही जो हवेली की दीवार के पीछे बंद है।"
कमरे में सन्नाटा था। बंसी ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से बोला, "ये आदमी पैसा नहीं माँग रहा। ये हिस्सा माँग रहा है।"
"हिस्सा," मैंने दोहराया। और फिर मुझे वो चिट्ठी याद आई — "मेरे हिस्से का पैसा किसी को नहीं मिला, वह दीवार के पीछे बंद है।"
मैंने सुखिया की तरफ़ देखा। "तुम्हारे पापा और जमुना देवी के पति — क्या वो साझीदार थे?"
सुखिया उठी। उसने चूल्हे की आग बुझाई और एक पुरानी लोहे की पेटी खोली। उसमें से एक फटा हुआ काग़ज़ निकाला। इतना पुराना कि मोड़ने पर टूट रहा था।
"ये पापा की जेब में था," उसने कहा। "मौत के दिन। मैंने किसी को नहीं दिखाया।"
मैंने काग़ज़ खोला। ऊपर एक टूटी हुई मुहर थी। नीचे लिखा था — "तीन हिस्से। तीन दोस्त। एक हवेली। हिसाब कभी नहीं बाँटा गया।"
तीन हिस्से। तीन दोस्त।
"तीन दोस्त?" बंसी ने कहा। "पापा, जमुना जी के पति और…?"
"तीसरा," मैंने कहा, "वो आदमी।"
सुखिया ने धीरे से सिर हिलाया। "मैंने ये कभी नहीं सोचा था। पर जब वो घाट पर खड़ा था, मुझे लगा था जैसे वो पापा को ढूँढ रहा है।"
बाहर गली में किसी की साइकिल की घंटी बजी। सुखिया के चेहरे पर खौफ़ आया। उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ धकेला। "ले जाओ। मेरे पास मत रखो।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो आदमी मुझे मिल चुका है एक बार। और उसने कहा था — 'जो चीज़ मेरी है, वो तेरे पास ज़्यादा देर नहीं रहेगी।'"
हम निकले। आसमान में धूल भरी लालिमा फैल रही थी। बंसी ने काग़ज़ अपनी जेब में रखा और बोला, "मन्नू, अब तक हम दो लोगों से टकरा चुके हैं — भवानी और वो। भवानी अदालत में उसे अपने साथ लाया। मतलब दोनों एक ही रास्ते पर हैं।"
"नहीं," मैंने कहा। "भवानी उसे लाया, पर उसे पहचानता नहीं या पहचानना नहीं चाहता। शेखर बाबू ने कहा — किसी ने उसे नहीं पहचाना।"
"तो भवानी उसे क्यों साथ लाया?"
"क्योंकि वो उसके पास था। और भवानी को किसी की ज़रूरत है जो हवेली का हिसाब जानता हो जब वो ख़ुद डूबने लगे।"
हम चलते रहे। बंसी कुछ सोच रहा था। फिर बोला, "मन्नू, याद है हरीश चंद्र ने कहा था — 'वो तेरे घर आता-जाता था, जिसे तू बचपन से जानता है।'"
"हाँ।"
"तो सोच। कौन था जो तेरे घर आता था, तेरे पापा के साथ बैठता था, और जिसे तूने कभी ग़ौर से नहीं देखा?"
चलते-चलते मैं रुक गया। सामने एक पुरानी चाय की दुकान थी, उसके पास बेंच पर कोई बैठा था। मैं उसे देखने लगा।
बारिश का दिन। मैं छोटा था। दरवाज़े पर एक आदमी खड़ा था, हाथ में एक छोटी पोटली। वो पापा से कह रहा था — "हिसाब कल करेंगे, आज तो चाय पी लो।" माँ ने चाय बनाई थी। बड़े मग में। और मैं दालान में बैठा उस आदमी के जूते देख रहा था — जिनकी एड़ी घिसी हुई थी, जैसे बहुत चला हो।
"मन्नू?" बंसी ने मेरा कंधा हिलाया।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "पर वो जूते… वो जूते मैंने कहीं और भी देखे हैं।"
घड़ी में साढ़े पाँच बज रहे थे। हवेली जाने का वक़्त आ रहा था। मैंने टोकन जेब से निकाला — वो अब भी ठंडा था, पर उस पर कोई नया शब्द नहीं था।
"चल," मैंने कहा। "छह बजे से पहले हवेली पहुँचते हैं।"
हवेली का पिछला दरवाज़ा खुला था। अंदर अँधेरा था। बंसी ने मोबाइल की रोशनी जलाई। हम अंदर गए। कोई नहीं था। पर ज़मीन पर पैरों के निशान थे — ताज़े।
"कोई आया है," बंसी ने धीरे से कहा।
मैंने पूरा कमरा देखा। अलमारी, पुरानी अलमारी। उसका दरवाज़ा टेढ़ा खुला था। मैं उसके पास गया। अलमारी के ऊपर एक धूल भरी शेल्फ़ थी, और उस शेल्फ़ पर कुछ पुराने काग़ज़ पड़े थे।
"मन्नू," बंसी ने कहा। "यहाँ कुछ लिखा है।"
उसने मोबाइल की रोशनी दीवार पर डाली। दीवार पर कोयले से कुछ लिखा था — एक नाम।
मेरे हाथ से टोकन फिसल गया। वो ज़मीन पर गिरा और एक बार घूमकर रुक गया। मैंने उसे उठाया।
"क्या है?" बंसी ने पूछा। "क्या लिखा है?"
"मैं नहीं जानता," मैंने कहा। "पर ये नाम… ये नाम मैंने पहले सुना है।"
बाहर से किसी के जाने की आहट आई। हम भागे — पिछले दरवाज़े तक। पर गली खाली थी। सिर्फ़ धूल में एक लाठी की नोक के निशान दिख रहे थे, जो दूर तक गए थे और फिर गायब हो गए।
मैं लौटा और दीवार पर लिखा नाम फिर पढ़ा। बंसी के चेहरे पर पसीना था।
"मन्नू," उसने कहा। "ये नाम तो…"
"हाँ," मैंने कहा। "यही तो सवाल है।"
मैं जब बाहर निकला तो सामने अदालत की सड़क थी। वहीं, दूर, भवानी खड़ा था। पर वो मेरी तरफ़ नहीं देख रहा था — वो अपने पीछे खड़े उस साठ साल के आदमी से कुछ कह रहा था। वो आदमी हँस रहा था। और फिर भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। हमारी नज़रें मिलीं। वो मुस्कुराया और चल दिया।
मैं वहीं खड़ा रह गया। बंसी ने कहा, "अब क्या?"
"अब सिर्फ़ एक रास्ता है," मैंने कहा। "उस आदमी से मिलना। और उससे पूछना — कि उसने हवेली पर अपना हक़ क्यों छोड़ा था।"
"और अगर वो न बताए?"
"तो उसकी लाठी के निशान बताएँगे।" मैंने जेब में टोकन दबाया। "पर पहले — ये नाम। ये किसका है, ये मुझे याद करना है।"
हम बाज़ार की तरफ़ बढ़े। रास्ते में शेखर बाबू मिले। वो जल्दी में थे। "मन्नू," उन्होंने कहा। "भवानी जाते वक़्त तेरे पास से गुज़रा। उसने कुछ कहा?"
"कुछ नहीं।"
"तो सुन — जिसने तीसरा ताला खोला, उसे तू अच्छे से जानता है।" शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। "मैं उसे जानता हूँ। और तू भी। तेरे पापा की हरिश्चंद्र वाली डायरी में एक नाम है, जो तीन जगह घूमकर आता है। वो नाम — तेरे ही घर का है।"
मैं रुक गया। टोकन जेब में ठंडा हो गया।
"कौन?" मैंने पूछा।
पर उससे पहले कि वो जवाब दे, मेरी जेब से टोकन निकला और ज़मीन पर गिरा। बंसी ने उसे उठाया और उसे देखकर रह गया।
"मन्नू," उसने कहा, आवाज़ काँप रही थी। "टोकन पर निशान बदल गया है।"
मैंने टोकन उसके हाथ से लिया। छह बजे — हवेली वाली लकीरें मिट गई थीं। उनकी जगह एक नाम उभरा था।
किशोरी।
॥
शेखर बाबू का जवाब मेरे कानों तक नहीं पहुँचा। टोकन पर उभरे नाम ने मेरे अंदर का सारा हिसाब उलट दिया था। किशोरी। वो नाम जो अदालत में गमछे वाले ने अपना बताया था। वो नाम जो मेरे ही घर का निकल रहा था।
“क्या हुआ?” बंसी ने मेरा हाथ पकड़ा। “तू काँप रहा है।”
“घर चल,” मैंने कहा। “अभी।”
रास्ते भर बंसी कुछ पूछता रहा, पर मेरे अंदर सिर्फ़ एक ही आवाज़ घूम रही थी — शेखर बाबू की। तेरे ही घर का है। मैंने घर के सारे चेहरे एक-एक करके याद किए। माँ। रीना। दादा। पापा। सिवाय इसके और कौन था?
घर का दरवाज़ा खुला था। अंदर रोशनी थी, पर चूल्हे की आग बुझी हुई थी। माँ चौकी पर बैठी थीं, और उनकी गोद में एक मोटी कॉपी थी — वही कॉपी जो हरीश चंद्र ने जज को दी थी।
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