The Token System – Chapter 694
भवानी के वकील ने कुछ कहना चाहा। जज ने उनकी तरफ़ देखे बिना कहा, "अगली सुनवाई कल सुबह दस बजे। दोनों पक्ष अपने काग़ज़ों की नकल रखें। कोर्ट उठी।"
हॉल खाली होने लगा। मैं बाहर निकला तो सीढ़ियों के नीचे भवानी खड़ा था। उसकी आँखों में वो थकान अब ग़ुस्से में बदल चुकी थी। उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे सीढ़ी के पीछे खींच लिया।
"तू जीत गया," उसने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी। "पर जीत का मज़ा तीन दिन का है, मन्नू। तीन दिन। उसके बाद तेरे पास क्या बचेगा? ये काग़ज़? ये तिजोरी? ये बूढ़ी औरतें? तू सोचता है इनसे हवेली चलेगी?"
मैंने अपना हाथ छुड़ाया। मुस्कुराया। "तीन दिन में मैं तेरी पूरी हवेली का हिसाब खोल दूँगा, भवानी सिंह। और उसके बाद तू जो बचेगा, वो भी अदालत का होगा।"
वो हँसा। पर उसकी हँसी में वो बात नहीं थी जो पहले हुआ करती थी। वो मुड़ा और सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। उसके पीछे एक आदमी चल रहा था — साठ के आसपास, सफ़ेद कुर्ता, सिर पर टोपी, हाथ में लाठी। जब वो मेरे पास से गुज़रा, उसने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया। फिर लाठी को हवा में घुमाया और बिना रुके चलता गया।
मैं उसकी तरफ़ देखता रह गया। कुछ पहचाना-सा लगा, पर नाम नहीं जुड़ा।
शेखर बाबू पीछे से आए और मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"वो आदमी," उन्होंने कहा, "भवानी के साथ अंदर आया था। सीढ़ियों के पास खड़ा था। पर किसी ने उसे नहीं पहचाना — न मुल्ज़िम के वकील ने, न कोर्ट के मुहर्रिर ने। मैंने पूछा तो बोला — 'मैं उनका पुराना नौकर हूँ।' पर भवानी के पुराने नौकरों में उसका नाम मुझे याद नहीं।"
"क्या नाम बताया?"
"कुछ नहीं बताया," शेखर बाबू ने कहा। "बस हँसकर चला गया।"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। वो सीढ़ियों के नीचे खड़ा था, रसीद की नकल हाथ में, और उसकी नज़र उस आदमी की पीठ पर थी।
"मन्नू," बंसी ने कहा, "उसकी लाठी देखी?"
"क्या?"
"उसके हैंडल पर वही निशान था। वो जो हमारे टोकन पर है — दो लकीरें और बिंदु।"
बंसी ने रसीद मेरी तरफ़ बढ़ाई। "और मेरी रसीद पर जो घर का छोटा निशान है — तीली और दरवाज़ा — वो भी उसकी लाठी पर था। मैंने दोनों एक साथ देखे।"
मैंने टोकन जेब में महसूस किया। ये ठंडा था।
हरीश चंद्र पास आए। उन्होंने अपना बैग कंधे पर टिकाया और धीरे से बोले, "मन्नू, एक बात है। तीसरा ताला अभी नहीं खुला। उसे खोलने वाले का नाम अभी सामने नहीं आया। और अगर मैं सही समझ रहा हूँ, तो वही अगली सुनवाई का सबसे बड़ा सवाल है।"
"किशोरी ने चाबी दी थी," मैंने कहा। "वो चाबी किसी के हाथ की थी।"
"किशोरी ने ये नहीं कहा कि चाबी उसने ख़ुद बनाई। उसने कहा — 'मेरे पास थी।' और उसने ये भी कहा कि हिसाब का असली रखवाला वो है जो उस रात कुएँ पर दूर खड़ा था।"
"तो वो कौन है?"
हरीश चंद्र ने कंधे उठाए। "कल पता चलेगा।"
मैं मुड़ा। भवानी सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था — नहीं, वो नहीं उतर रहा था। वो ऊपर ही रुक गया था, रेलिंग पर हाथ टिकाए। उसकी आवाज़ नीचे आई, हॉल के खालीपन में गूँजती हुई।
"मन्नू," वो चिल्लाया। "अभी जाने से पहले एक बात सुन ले।"
मैंने ऊपर देखा। वो मेरे चेहरे पर नज़र गड़ाए था।
"जिसने तीसरा ताला खोला," उसने कहा, "उसे तू अच्छे से जानता है।"
वो मुड़ा और अंदर चला गया। दरवाज़ा उसके पीछे बंद हुआ।
मैं सीढ़ियों के नीचे खड़ा रह गया। बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। शेखर बाबू ने भी। हरीश चंद्र ने बैग उतारा और वहीं रुक गए।
"जानता हूँ?" मैंने कहा। "मैं किसी को नहीं जानता जो—"
"सोच," बंसी ने कहा। "सोच, मन्नू। तीसरा ताला किसके पास था? किशोरी की चाबी किसे बनानी पड़ी? कौन था जो तेरे पापा के साथ था, जो तेरे घर आता-जाता था, जिसे तू बचपन से जानता है?"
मेरा दिमाग़ चला। माँ का चेहरा, गिरधारी देवी, रामदीन, श्यामू, बसंती — कोई भी नहीं जुड़ा।
"मन्नू," शेखर बाबू ने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ अलग था। "मुझे याद है — जब मैं पहली बार तेरे घर आया था, एक आदमी दरवाज़े पर खड़ा था। तूने कहा था — 'ये हमारे पुराने पड़ोसी हैं।' उसने अपना नाम नहीं बताया था।"
मैंने आँखें बंद कीं। उस दिन की बारिश, दरवाज़े पर खड़ा एक साया, हाथ में कुछ पकड़े हुए। क्या?
"वो कौन था?" बंसी ने पूछा।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा, और ये सच था। "पर वो कुछ जानता है। और भवानी जानता है कि मैं उसे जानता हूँ।"
मैंने टोकन जेब से निकाला। वो ठंडा था — बिलकुल ठंडा। पर उस पर कोई नया शब्द नहीं उभरा। सिर्फ़ पुरानी लकीरें, और उनके नीचे वो "छह बजे — हवेली"।
मैंने टोकन वापस रखा।
"चलो," मैंने कहा। "पहले सुखिया से मिलते हैं। अगर वो कल अदालत में आई हैं, तो वो कुछ और भी बताएँगी। और फिर छह बजे हवेली।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "अकेले?"
"अकेले," मैंने कहा। "पर मैं जानता हूँ कि तू पीछे खड़ा रहेगा।"
वो हँसा। पहली बार आज उसकी हँसी चाय के खोखे वाली थी।
हरीश चंद्र ने अपना बैग उठाया और जाते-जाते रुककर बोले, "मन्नू, भवानी ने जो कहा — उस पर ध्यान दे। वो ऐसे नहीं कहता। जब वो कोई नाम नहीं लेता, तो वो इसलिए नहीं कहता कि उसे नहीं पता। वो इसलिए नहीं कहता कि उसे अंदर तक डर है।"
"किससे?"
"उस आदमी से," हरीश चंद्र ने कहा। "जो तीसरे ताले की चाबी बनवाता है।"
वो चले गए। मैं आँगन में खड़ा रह गया। धूप अब ढल रही थी। और मेरे पीछे, दीवार के सहारे, वो लाठी वाला आदमी अब नहीं था — पर उसकी परछाईं अभी भी दीवार पर थी, जैसे उसने अपनी शक्ल वहीं छोड़ दी हो।
मैंने दीवार पर टिकी उस परछाईं को देखा। धूप ढल रही थी, पर परछाईं वहीं थी — स्थिर, काली, लाठी जैसी सीधी। मैंने एक कदम बढ़ाया। परछाईं हिली नहीं। मैंने हाथ बढ़ाया — और मेरी उँगलियाँ दीवार की गर्म ईंटों से टकराईं।
बंसी मेरे पीछे आया। "क्या देख रहा है?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "चल।"
हम गली से बाहर निकले। पीछे मुड़कर देखा तो दीवार पर कुछ नहीं था। सिर्फ़ पीली पड़ती दोपहर और उस पर चढ़ती हुई धूल।
सुखिया का घर बाज़ार के पीछे वाली गली में था। छोटा सा आँगन, एक पुराना हैँडपंप, और सामने सूखती मिर्चों की डोरियाँ टँगी थीं। दरवाज़ा खुला था। हम अंदर गए तो सुखिया चूल्हे के पास बैठी थी। उसके हाथ राख में थे, पर आँखें साफ़ थीं।
"आ गए," उसने कहा, जैसे इंतज़ार ही कर रही थी। "बैठो।"
मैं नहीं बैठा। "तुमने अदालत में कहा था कि तुम वो रसीद लेकर भागी थीं। पर तुमने ये नहीं बताया कि तुमने रसीद किससे ली थी।"
सुखिया ने चूल्हे की आग में एक टहनी डाली। "मैंने ली नहीं थी। मुझे दी गई थी।"
"किसने?"
"एक आदमी ने। साठ-पैंसठ साल का, सफ़ेद बाल, हाथ में लाठी। उसने मुझे रसीद थमाई और कहा — 'ये तेरे बाप की है। इसे संभाल के रखना। जिस दिन हवेली का ताला खुलेगा, उस दिन ये काम आएगी।'"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "वही आदमी। जो अदालत में भवानी के साथ था।"
"तुमने उसका नाम पूछा?" मैंने कहा।
"पूछा तो था।" सुखिया ने आग से आँखें हटाईं। "वो हँसा और बोला — 'नाम से क्या होता है? जब वक़्त आएगा, नाम ख़ुद बोल देगा।'"
मेरे हाथ अपने आप मुट्ठी में बंध गए। "वो तुम्हें कब मिला?"
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