The Token System – Chapter 683
“और हरि सिंह ज़िंदा है,” शेखर बाबू ने कहा।
“ज़िंदा है,” गिरधारी देवी ने कहा। “और बीमार भी नहीं। वो दस साल से छिपा हुआ है, पर ज़िंदा है। जिसने मेरे पति के साथ ये किया, वो भगवान के डर से नहीं डरता।”
मैं उठा। “मुझे उनसे मिलना है।”
“क्यों? वो कुछ बोल नहीं सकते।”
“फिर भी,” मैंने कहा।
कमरा बाहर से छोटा था और अंदर से एक तहखाने जैसा। दीवार पर मिट्टी का तेल जल रहा था। चारपाई पर एक बूढ़ा आदमी लेटा था। बाल सफ़ेद, चेहरा पतला, गाल अंदर धँसे हुए। आँखें खुली थीं, छत की तरफ़।
गिरधारी देवी औरत ने चारपाई के पास की कुर्सी पर बैठकर उसका हाथ अपने हाथ में लिया।
“ये मन्नू है,” उन्होंने कहा। “किशनचंद का बेटा।”
भास्कर की आँखें मेरी तरफ़ घूमीं। उनमें कुछ था — पहचान, फिर कुछ और, जो शब्दों से नहीं कहा जा सकता।
मैंने जेब से पापा की पर्ची निकाली — वही जो माँ ने चूल्हे के पीछे से दी थी, जिस पर पापा की लिखाई थी कि हिसाब उस आदमी के बेटे के पास जाएगा जो हवेली में ईमानदार था। मैंने वो पर्ची भास्कर के हाथ में रख दी।
भास्कर की उँगलियाँ पर्ची पर रुकीं। आँखें पर्ची पर गईं। फिर वो हिलीं, और उनकी उँगली धीरे-धीरे पर्ची के ऊपर, हवा में, कुछ लिखने लगी।
पहला अक्षर — “ती”। फिर “ज”।
“तीज?” मैंने कहा।
गिरधारी देवी ने गर्दन हिलाई। “वो तीन लिखता है। जब भी कुछ ज़रूरी होता है, तीन लिखता है। पिछली बार बोला था — तीन चाबियाँ।”
शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। “तीन हिस्से। तीन ताले। तीन चाबियाँ।”
“पर चौथी चाबी का क्या?” बंसी ने कहा।
गिरधारी देवी ने कहा, “तीसरे की चाबी मेरे पास है। पर चौथी…”
भास्कर की उँगली फिर हिली। इस बार दो अक्षर — “हा” और “री”। हरी। या हरि। उसके बाद उँगली रुक गई, जैसे उसे और ताक़त नहीं।
शेखर बाबू खड़े हो गए। “हरि। तो चौथी चाबी हरि सिंह के पास है।”
“या हरि सिंह के कमरे में है,” मैंने कहा।
गिरधारी देवी ने भास्कर का हाथ धीरे से रख दिया और मेरी तरफ़ मुड़ीं। “तुम जो करने जा रहे हो, मैं जानती हूँ। पर एक बात सुन लो — हरि सिंह को कोई मार नहीं सकता। मैंने पच्चीस साल में एक बात समझी है — वो इंसान ख़त्म नहीं होता, वो ख़ुद को किसी और के जिस्म में बदल लेता है। वो बात करता है, तो किसी और की आवाज़ में। अब मुझे भी वो कभी-कभी हवेली में सुनाई देता है, और मुझे पता है कि वो कभी उस घर से बाहर नहीं गया।”
बाहर निकलते वक़्त रामदीन गाड़ी के पास खड़ा था। वो पहले से हमारा इंतज़ार कर रहा था। उसने कहा, “अदालत कल सुबह दस बजे है।”
“हमें पता है,” मैंने कहा।
“पर एक और बात,” रामदीन ने कहा। “कल रात भवानी ने होम की खिड़की खोलकर सारे काग़ज़ जलाने की कोशिश की। मैंने ख़ुद देखे — दो बोरे जल रहे थे। पर शेखर बाबू ने तीन काग़ज़ बचा लिए।”
मैंने शेखर बाबू की तरफ़ देखा। उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा, “वो हवेली के असली बँटवारे के काग़ज़ हैं। जो जल गए, वो नकल थे। असली काग़ज़ मेरे पास है।”
“कहाँ?”
“बसवा के रास्ते में, पुराने पुल के नीचे। मैंने उन्हें पहले ही छिपा दिया था।”
गाड़ी में बैठते वक़्त बंसी ने चुपचाप कहा, “कुछ तो गड़बड़ है। तीन चाबियाँ, तीन ताले, तीन हिस्से। और चौथा काग़ज़। ये हिसाब आसान नहीं है।”
“नहीं है,” मैंने कहा। “पर आज सुबह के बाद हम एक चीज़ से और आगे हैं — भास्कर ज़िंदा है। और अगर वो अदालत में नहीं आ पाया, तो भी हम उसकी आँखों का जवाब जानते हैं।”
रात आठ बजे हम घर पहुँचे। गली के मोड़ पर गाड़ी से उतरते ही मैंने दूर से कुछ देखा — मेरे घर के दरवाज़े के सामने एक आदमी खड़ा था। सफ़ेद कुर्ता, मोटी मूँछें, हाथ में छोटा बैग।
पास जाकर पहचाना — जगन्नाथ लाल।
वो मुस्कुराया। मुस्कुराहट में कोई मिठास नहीं थी।
“मैं माफ़ी माँगने नहीं आया,” उसने कहा। “मैं तुझे बचाने आया हूँ, क्योंकि भवानी ने कल अदालत में तेरे ख़िलाफ़ झूठी गवाही का इंतज़ाम कर लिया है।”
“अंदर चल,” मैंने कहा।
“तेरे घर में नहीं,” जगन्नाथ लाल ने कहा। “गली के नुक्कड़ पर चाय की दुकान है। वहाँ बैठकर बात करते हैं। तेरे घर के अंदर जो भी है, वो मेरी बात सुन लेगा तो तेरा ही नुक़सान है।”
बंसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। “मैं साथ चलता हूँ।”
“तू नहीं,” जगन्नाथ लाल ने कहा। “सिर्फ़ मन्नू।”
शेखर बाबू आगे आए। “जगन्नाथ, मैं तुझे बचपन से जानता हूँ। तेरी आवाज़ में जो काँटा है, वो नया नहीं है। पर आज वो काँटा किसी और के हाथ का लग रहा है। साफ़ बोल — भवानी ने तुझे भेजा है?”
जगन्नाथ लाल ने शेखर बाबू की तरफ़ देखा, फिर ज़मीन पर। “शेखर भैया, आप जानते हैं मेरा हिसाब। मैं दोनों तरफ़ का हूँ, यही मेरी बीमारी है। पर आज सुबह जब भवानी ने अपने काग़ज़ जलाए, तब मैं वहीं था।”
“तो तू जलाने में शामिल था?” बंसी का हाथ मुट्ठी में बंध गया।
“मैं बोरे ढो रहा था। जलाना भवानी का काम था। पर उसने जलाते वक़्त एक बात कही जो मेरे कान में अटक गई। उसने कहा — ‘किशनचंद का बेटा कल अदालत में बोलेगा, तो उसकी ज़ुबान ही कटवा दूँगी।’” जगन्नाथ लाल ने रुमाल से अपना माथा पोंछा। “मैंने पूछा, कैसे। वो हँसी और बोली — ‘गवाह तैयार है। सामने वाला गवाह।’”
“कौन गवाह?” मैंने पूछा।
“यही तो मैं भी पूछता रह गया। वो बोली नहीं। पर मैंने एक नाम सुना, जब वो अपने आदमी से फ़ोन पर बात कर रही थी।” जगन्नाथ लाल ने आवाज़ धीमी की। “बसंती।”
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
“बसंती कौन?” बंसी ने पूछा।
“हवेली की रसोई में काम करती थी,” शेखर बाबू ने कहा। “दो साल पहले हरि सिंह ने उसे निकाल दिया था। मेरी चीज़ें चुराने के इल्ज़ाम में।”
“इल्ज़ाम झूठा था,” मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी ही नहीं लग रही थी। “बसंती ने हरि सिंह को रंगे हाथों देखा था, जब वो हवेली की तिजोरी से कुछ निकाल रहा था। उसे निकालना ज़रूरी था। और उसे निकाला गया — सिर्फ़ इसलिए नहीं कि वो गवाह थी, बल्कि इसलिए भी कि वो मेरी माँ की सहेली थी। बसंती हमारे घर आती थी। वो मुझे बचपन में कंधे पर बिठाकर घुमाती थी।”
“तो भवानी ने वही गवाह चुना,” शेखर बाबू ने कहा। “जो तेरे घर का हर कोना जानती है।”
जगन्नाथ लाल ने अपना बैग खोला और एक चिट्ठी मेरी तरफ़ बढ़ाई। “ये उस काग़ज़ की नकल है जो भवानी ने बसंती को दिया। मुझे ये एक ठेले वाले से मिली, जो भवानी के आदमी का दोस्त है। इसमें लिखा है कि बसंती को क्या बोलना है।”
मैंने चिट्ठी खोली। हाथ काँप रहे थे।
लिखा था — “कहना कि किशनचंद ने हवेली का सामान बेचा था। कहना कि मन्नू ने मुझे डराया था कि अगर मैंने मुँह खोला तो मेरा भी वही हश्र होगा जो उसके पापा का हुआ। कहना कि मैंने मन्नू को रात में हवेली के पीछे किसी को कुछ देते देखा था।”
बंसी ने चिट्ठी पढ़ी और मेरी तरफ़ देखा। “ये तो पूरा खेल है। ये तो तेरे पापा पर भी धब्बा लगाएगी।”
“और मुझ पर चोरी का इल्ज़ाम,” मैंने कहा। “समझ गया। हरि सिंह ने जो किया, उसकी सज़ा मुझे मिलेगी। भवानी यही चाहती है — कि अदालत में सच बोलने वाला कोई न बचे।”
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