The Token System – Chapter 684
जगन्नाथ लाल ने अपना बैग बंद किया। “अब तू बता, मैंने जो बताया, उसके बदले में मुझे क्या मिलेगा?”
“तू ख़ुद बोल,” मैंने कहा।
“अदालत में मैं गवाही दूँगा। भवानी के ख़िलाफ़। पर मेरी शर्त है — मेरे बेटे की नौकरी वापस लगवानी पड़ेगी, जो हरि सिंह ने निकाल दी थी।”
शेखर बाबू ने कहा, “नौकरी की बात अदालत के बाद। पहले तू ये बता — तेरे पास भवानी के ख़िलाफ़ कुछ और है?”
जगन्नाथ लाल मुस्कुराया। इस बार मुस्कुराहट में कुछ था। “तीज। वो शब्द मुझे भी पता है।”
मैं सीधा हो गया।
“भवानी ने एक बार नशे में बोला था — ‘भास्कर बाबू के तीन लालच, तीन आदमी, तीन ताले। और चौथा काग़ज़ मेरे सीने में।’” जगन्नाथ लाल ने अपनी जेब से एक छोटी सी कुंजी निकाली। “ये कुंजी मुझे बसंती की चिट्ठी के साथ मिली थी। मुझे नहीं पता ये किस ताले की है, पर शक है कि ये भवानी के सीने वाली बात से जुड़ी है।”
बंसी ने कुंजी लेकर देखी। “ये छोटी है। सिंदूक की चाबी जैसी।”
“हाँ,” शेखर बाबू ने कहा। “हवेली में एक छोटा सिंदूक था, भास्कर बाबू की माँ का। जो हरि सिंह के कमरे में रखा है।”
दस मिनट बाद हम चारों जगन्नाथ लाल के साथ गली के नुक्कड़ की चाय की दुकान पर बैठे थे। चाय ठंडी हो रही थी। किसी ने नहीं पी।
“एक बात साफ़ कर लेते हैं,” मैंने कहा। “कल अदालत में जो होगा, वो सिर्फ़ काग़ज़ों से नहीं होगा। भवानी की गवाह झूठ बोलेगी। मुझे उसके सामने सच लाना है।”
“कैसे?” बंसी ने पूछा। “बसंती तो कहेगी ही नहीं?”
“कहेगी,” मैंने कहा। “अगर उसके सामने कोई ऐसा हो जो उसे याद दिलाए कि उसने मेरी माँ से क्या वादा किया था।”
शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। “मन्नू, अदालत में भावनाओं की जगह नहीं होती।”
“तो भावना नहीं, कोई चीज़ ऐसी ले जाएँगे जो बोले।” मैंने जगन्नाथ लाल की तरफ़ देखा। “तू बसंती का पता बता। आज रात मुझे उससे मिलना है।”
“मन्नू,” बंसी ने कहा, “भवानी के आदमी तेरा इंतज़ार कर रहे होंगे।”
“मैं अकेला नहीं जाऊँगा,” मैंने कहा।
जगन्नाथ लाल ने चाय पर फूँक मारी और कहा, “बसंती शहर के बाहर बसवा रोड पर उस पुरानी चक्की के पास रहती है। दो कमरे हैं। पीली दीवार है। अंदर से कुंडी लगी रहती है। मैं तुझे रास्ता दिखा दूँगा। पर अंदर जाना तेरा काम है।”
रात नौ बजे हम दो गाड़ियों में निकले। मैं, बंसी और जगन्नाथ लाल पहली गाड़ी में। शेखर बाबू दूसरी में, पीछे-पीछे। रास्ते में जगन्नाथ लाल ने कहा, “एक बात और। भवानी ने कल सुबह के लिए शहर के तीन वकील बुलाए हैं। ये उसका रोज़ का काम नहीं है। ये उसका इंतज़ार है। उसे पता है कि हारने का मतलब उसका सब कुछ जाना है।”
“तो हमें भी तीन दलीलें तैयार रखनी होंगी,” मैंने कहा। “काग़ज़, गवाह, और वो चाबी।”
चक्की के पास पहुँचे तो पीली दीवार वाला घर अंधेरे में बैठा था। खिड़की में हल्की पीली रोशनी थी। बंसी ने गाड़ी रोकी। मैं उतरा और दरवाज़ा खटखटाया।
अंदर से आवाज़ आई। “कौन?”
“मन्नू। किशनचंद का बेटा।”
अंदर सन्नाटा। फिर कुंडी खुलने की आवाज़। दरवाज़ा खुला। एक मध्यम उम्र की औरत सामने खड़ी थी — माथे पर एक चोट, होंठ फटे हुए। बसंती। वो पहले से ज़्यादा पतली लग रही थी। दो साल में चेहरा बुझ गया था।
उसने मुझे देखा और उसकी आँखें भर आईं। “तू आ गया।”
“अंदर चलें?” मैंने कहा।
अंदर जाने पर देखा — चारपाई पर एक बच्चा सो रहा था। बसंती ने चादर ऊपर खींच दी। “मेरा बेटा। दो साल का। हरि सिंह ने नौकरी से निकाला, तब से यहीं पड़ी हूँ।”
“तूने भवानी का काग़ज़ क्यों लिया?” मैंने सीधा पूछा।
बसंती की आँखों से आँसू बहने लगे। “मन्नू, मेरे पास कोई रास्ता नहीं था। भवानी ने कहा कि अगर मैंने उसकी बात नहीं मानी, तो वो मेरे बच्चे को भी नहीं छोड़ेगी। मैं डर गई।”
“और मेरी माँ?” मैंने पूछा। “तूने उससे क्या वादा किया था — याद है?”
बसंती ने मुँह फेर लिया।
“कह, बसंती। मैं तुझे सुन रहा हूँ।”
“मैंने कहा था कि तेरे पापा भगवान जैसे थे। और उनके साथ जो हुआ, उसके लिए मैं कभी झूठ नहीं बोलूँगी।” उसने मुझे देखा। “पर सच बोलने की कीमत मैं अकेली नहीं भर रही।”
“सच बोलने की कीमत मैं अपने पापा की इज़्ज़त से चुका रहा हूँ,” मैंने कहा। “तेरा बेटा सो रहा है, बसंती। मेरा पापा भी कभी सोता था, तभी उसका पूरा बदन जला दिया गया। तू जो कहेगी, उससे तय होगा कि जब तेरा बेटा बड़ा होगा और उससे कोई पूछेगा कि तेरा बाप कौन था, तब वो सिर उठाकर जवाब दे पाएगा या झुककर।”
बसंती चारपाई के पास गई। अपने बेटे के सिर पर हाथ फेरा। फिर मेरी तरफ़ मुड़ी।
“मैं गवाही दूँगी। पर सच्ची।”
बाहर आकर मैंने शेखर बाबू को इशारा किया। उन्होंने जगन्नाथ लाल की तरफ़ देखा। “तू अब भवानी के पास जाएगा?”
“मैं नहीं जाऊँगा,” जगन्नाथ लाल ने कहा। “आज रात मैं तेरे साथ रहूँगा। भवानी ने मुझे ‘नाकामी की सूरत में’ कुछ कहा था। मुझे लगता है कि वो मुझे अदालत से पहले ही रास्ते से हटाना चाहती है।”
वापस लौटते वक़्त रास्ते में शेखर बाबू ने कहा, “एक बात और। रात दस बजे अदालत का मुंशी घर जाता है। उससे पहले मुझे उसके दफ़्तर से वो काग़ज़ चाहिए जिसमें भवानी के हस्ताक्षर हैं। अगर वो काग़ज़ सुबह अदालत में पहुँच गया, तो भवानी कुछ नहीं कह पाएगी।”
“कहाँ है मुंशी का दफ़्तर?” मैंने पूछा।
“कचहरी के पीछे। छोटा कमरा। मैं जानता हूँ कौन सा खाना है जिसमें वो काग़ज़ रखता है।”
“मैं चलूँगा,” बंसी ने कहा।
“अकेला नहीं,” मैंने कहा। “मैं साथ चलूँगा। जगन्नाथ घर पर रहेगा।”
शेखर बाबू ने सिर हिलाया। “पर सावधान। रात को कचहरी के बाहर पुलिस का पहरा होता है। हमें सामने से नहीं, पीछे के रास्ते से जाना होगा।”
रात दस बजे हम कचहरी के पीछे के रास्ते पर खड़े थे। दीवार ऊँची थी। शेखर बाबू ने एक पत्थर उठाया और खिड़की के चौखट पर दे मारा। अंदर से कुछ गिरने की आवाज़ आई। फिर सन्नाटा।
“अब,” शेखर बाबू ने कहा।
बंसी दीवार पर चढ़ा। मुझे हाथ बढ़ाया। मैं ऊपर खिंचा। शेखर बाबू पीछे रहे — “मैं यहीं पहरा देता हूँ,” उन्होंने कहा।
अंदर का कमरा सीलन भरा था। चार दीवारें, एक लोहे की अलमारी, एक लकड़ी की मेज़। बंसी ने मोबाइल की रोशनी जलाई। उसने अलमारी का तीसरा खाना खींचा। अंदर काग़ज़ों का बंडल था।
“ये रहा,” बंसी ने काग़ज़ निकालते हुए कहा। “भवानी के हस्ताक्षर। और नीचे तारीख — दो साल पहले। इस पर लिखा है कि हवेली का तीन हिस्सों का फ़ैसला उसने ख़ुद हासिल किया, कोई पंचायत नहीं हुई।”
“यानी जबरदस्ती का काग़ज़,” मैंने कहा।
“और देख — नीचे भास्कर बाबू का अंगूठा।” बंसी की आवाज़ धीमी हो गई। “यही तो। ये अंगूठा भास्कर बाबू का नहीं हो सकता। वो पच्चीस साल से बिस्तर पर है, अंगूठा कैसे लगाता। ये जाली है।”
“मतलब भवानी ने भास्कर बाबू के ज़िंदा रहते हुए ही हवेली हड़प ली,” मैंने कहा। “और अब जब भास्कर बाबू को सब पता है, वो डर गई है।”
बाहर आते वक़्त शेखर बाबू ने हमें रोका। “रुको। सामने से कोई आ रहा है।”
हम दीवार से चिपके रहे। एक आदमी लाठी लेकर गुज़रा। शायद चौकीदार। जाते-जाते वो एक गली में मुड़ गया।
हम तीनों भागकर गाड़ी तक पहुँचे। बंसी ने काग़ज़ अपनी जेब में रखा।
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