The Token System – Chapter 682
“और अब?”
“अब डर ख़त्म हो गया,” उन्होंने कहा। “क्योंकि अब मेरे पास कोई और रास्ता नहीं है। भवानी ने मेरी बेटी का रिश्ता तोड़वा दिया था। अब वो मेरे घर पर भी हाथ डालने की बात कर रहा है। अब मैं चुप नहीं रहूँगा।”
तभी ऊपर गली में गाड़ियों की आवाज़ आई। हम सब बाहर निकले। हवेली के गेट पर दो सफ़ेद गाड़ियाँ रुकी थीं और उनमें से पुलिस के कुछ आदमी उतरे। साथ में वो लंबा आदमी था जो शेखर बाबू को ले जाने आया था, पर इस बार वो हथकड़ी नहीं, एक मुड़ा काग़ज़ लेकर आ रहा था।
“शेखर बाबू,” उसने कहा, “ठाकुर साहब का संदेश है — जो काग़ज़ तुमने रात में छिपाया था, वो आज शाम तक लौटा दो। बदले में तुम्हारी नौकरी बची रहेगी।”
शेखर बाबू ने उसका काग़ज़ नहीं लिया। उन्होंने अपनी जेब से वो आधा पन्ना निकाला और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
“ये लो, मन्नू,” उन्होंने कहा। “अब तुम्हारा हिसाब, तुम्हारा फ़ैसला।”
मैंने पन्ना लिया। लंबा आदमी मेरी तरफ़ बढ़ा, पर उसके पीछे खड़े एक पुलिस वाले ने उसका कंधा पकड़ लिया।
“अभी नहीं,” उसने कहा। “अदालत का आदेश है। कल सुनवाई तक कुछ नहीं।”
लंबा आदमी रुका। उसने मेरी तरफ़ देखा। “मनोहर, तू ख़ुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रहा है।”
“जो काग़ज़ में लिखा है, वो सच है,” मैंने कहा। “और सच कभी कुल्हाड़ी नहीं होता।”
वो चला गया।
हम सब बरामदे में बैठ गए। माँ ने आधी बही निकाली और मैंने आधा पन्ना उसके सामने रखा। दोनों को जोड़कर देखा तो फटी लकीरें मिल गईं। अक्षर साफ़ पढ़े जा सकते थे।
“हवेली का असली हिस्सा चार लोगों का था,” माँ ने ज़ोर से पढ़ा। “हरि सिंह, सुखिया, रामदीन मिस्त्री, और चौथा — कौशल्या।”
“कौशल्या?” मैंने पूछा।
“मेरी माँ,” गिरधारी देवी ने धीमी आवाज़ में कहा। “मेरी माँ का नाम कौशल्या था। और जो चौथे हिस्से का काग़ज़ है, वो मेरी माँ के नाम है।”
“तो चौथे हिस्से की हक़दार तुम हो,” रामदीन ने कहा।
“नहीं,” गिरधारी देवी ने कहा। “चौथे हिस्से की हक़दार मेरी बेटी है। सरोज।”
माँ ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने उसे उलटा किया। पीछे की तरफ़ एक लाइन और थी, जो साफ़ नहीं पढ़ी जा रही थी — बस चार अक्षर दिख रहे थे, जो स्याही में मिट गए थे।
“ये क्या है?” मैंने शेखर बाबू से पूछा।
उन्होंने देखा और सिर हिलाया। “यही तो मैं सालों से सोच रहा हूँ। यह लाइन किसी ने अलग स्याही में लिखी है। और यही लाइन बता रही है कि चौथे हिस्से के बाद क्या होगा।”
“पर पढ़ी नहीं जा रही,” बंसी ने कहा।
“क्योंकि यह लाइन बाहर से नहीं पढ़ी जा सकती,” शेखर बाबू ने कहा। “यह लाइन सिर्फ़ उस आदमी को दिखती है जिसके पास इसका जोड़ा हो।”
“कौन सा जोड़ा?”
शेखर बाबू ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। “तेरा टोकन।”
मैंने टोकन निकाला। मेरी हथेली पर वो ठंडा था, पर जैसे ही मैंने उसे पन्ने के पास लाया, वो गरम होने लगा। पन्ने पर वो चार अक्षर एक-एक करके उभरने लगे। पहला अक्षर — “भ”, फिर “ा”, फिर “ई”, फिर “।”
माँ ने आवाज़ में कहा, “भाई।”
“भाई?” मैंने कहा।
शेखर बाबू ने पन्ना अपने हाथ में लिया और उलटा किया। “नहीं,” उन्होंने कहा। “यह ‘भाई’ नहीं है। यह ‘भाई’ नहीं, यह किसी का नाम है।”
“किसका?”
“भाई — जो भवानी के पास है, वो नाम भाई नहीं है,” शेखर बाबू ने कहा। “वो तो हिसाब है। असली नाम तो यह है — भास्कर। और भास्कर वो चौथा हिस्सेदार है जिसका नाम तहसील के रजिस्टर से मिटाया गया था।”
गिरधारी देवी खड़ी हो गईं। “भास्कर? मेरे पति का नाम भास्कर था। पर मुझे बताया गया था कि वो सुखिया है।”
“सुखिया तेरे पति का नाम नहीं था,” शेखर बाबू ने कहा। “सुखिया तेरे पति का बड़ा भाई था। और भास्कर — भास्कर वो आदमी है जो आज भी बसवा की हवेली में बंद है। क्योंकि असली हवेली की चाबी उसके पास है।”
सब चुप हो गए। माँ ने मेरी तरफ़ देखा और सिर्फ़ इतना कहा, “मन्नू, अब तेरा काम शुरू होता है।”
मैंने टोकन जेब में रखा। वो ठंडा हो चुका था। पर मेरी हथेली पर जो गरमाहट रह गई थी, वो टोकन की नहीं थी। वो उस नाम की थी जो आज पहली बार मेरे सामने पूरा आया था — भास्कर।
शेखर बाबू उठे। “कल सुनवाई है। अब तक मुझे यह नहीं पता था कि हिसाब में भास्कर का नाम कैसे जोड़ना है। अब पता है।”
“और अगर भास्कर सच में बसवा में है?” बंसी ने पूछा।
“तो कल सुनवाई में वो सबसे बड़ा गवाह होगा,” शेखर बाबू ने कहा। “पर उस तक पहुँचने से पहले, हमें यह तय करना होगा कि उसकी जान किसके हाथ में है।”
माँ ने आधी बही अपनी साड़ी में छिपाई और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी। “चलो,” उसने कहा, “आज रात बसवा जाना है।”
बाहर निकलते वक़्त मैंने पीछे मुड़कर देखा। हवेली की उत्तर वाली दीवार पर, जहाँ ईंटें खुली थीं, एक हल्की चमक दिख रही थी। मैंने आँखें मलीं। चमक गायब हो गई थी।
हम गाड़ी की तरफ़ बढ़े। गली के मोड़ पर एक बूढ़ा आदमी खड़ा था, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में लाठी, और लाठी के ऊपर वही कोना-चिह्न, जो मेरे टोकन पर है। वो हमें देख रहा था, और जैसे ही हम गाड़ी में बैठे, वो मुड़कर चला गया। गाड़ी आगे बढ़ी।
बंसी ने मेरी तरफ़ देखकर पूछा, “वो कौन था?”
“मुझे नहीं पता,” मैंने कहा। “पर वो कुछ जानता है।”
॥
गाड़ी के पहिए घूमने से पहले ही बंसी ने मेरी तरफ़ देखा और बोला, “वो लाठी वाला बूढ़ा। मैंने उसका चेहरा पहले कहीं देखा है।”
“कहाँ?”
“मुझे नहीं पता। पर वो कुछ जानता है।”
शेखर बाबू ने पीछे बैठे-बैठे कहा, “बातें बाद में। पहले बसवा। सूरज ढलने से पहले हमें गिरधारी देवी से सीधा सवाल पूछना है।”
रास्ता लंबा था पर हमने गाड़ी नहीं रोकी। बंसी बीच में एक बार चाय के लिए रुका, पर शेखर बाबू ने कहा, “पीछे कोई आ रहा हो तो रुकने का वक़्त नहीं।” हम बसवा की पगडंडी पर उतरे जब आसमान नारंगी हो रहा था।
गिरधारी देवी की झोपड़ी के आँगन में पीली मिट्टी का चूल्हा जल रहा था। वो बैठी थीं, सामने तुलसी का पौधा, और हाथ में माला। हमें देखकर माला रख दी।
“अंदर चलो,” उन्होंने कहा। “बाहर भवानी के आदमी की आँख हो सकती है।”
अंदर अंधेरा था। एक लालटेन जल रही थी। गिरधारी देवी ने हमें बैठने का इशारा किया और ख़ुद चारपाई के कोने पर बैठ गईं।
मैंने सीधा पूछा, “तुम्हारे पति भास्कर ज़िंदा हैं?”
वो चुप रहीं।
“मैं पूछ रहा हूँ,” मैंने कहा। “क्योंकि अगर वो ज़िंदा हैं, तो कल की सुनवाई में सब कुछ बदल जाएगा।”
गिरधारी देवी का हाथ माला पर रुक गया। फिर उनकी आँखों से एक आँसू गिरा और वो रो पड़ीं। बंसी ने पानी का लोटा बढ़ाया। उन्होंने पिया, गला साफ़ किया।
“ज़िंदा है,” उन्होंने कहा। “पर ज़िंदा कहें तो झूठ होगा। पच्चीस साल से बिस्तर पर है। बोल नहीं सकता। हाथ नहीं हिला सकता। पाँच साल पहले आँखें भी धुँधली हो गईं। बस आँखों से जवाब देता है।”
“कहाँ है?”
“पीछे के कमरे में।”
शेखर बाबू ने आगे झुककर पूछा, “कैसे हुआ?”
गिरधारी देवी ने लालटेन की तरफ़ देखा। “उस रात हवेली में हरि सिंह ने उसके दूध में कुछ डाल दिया। मैंने खुद पिया था वो दूध — बासी था, फेंक दिया। भास्कर ने पिया। सुबह वो उठा ही नहीं। हरि सिंह ने डॉक्टर बुलाया, पर डॉक्टर उसका ही था। काग़ज़ पर लिखवा दिया कि भास्कर को लकवा मार गया, हवेली उसके भाई के नाम हो गई, और भास्कर मेरे साथ बसवा भेज दिया गया।”
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