The Token System – Chapter 679
“मुझे नहीं पता,” गिरधारी देवी ने कहा। “पर इस तस्वीर पर ये लिखने वाला जानता था। और ये लिखने वाला… ये लिखने वाला तेरे दादा का हाथ है।” उन्होंने तस्वीर की तरफ़ देखा। “मैंने उसकी लिखाई चालीस साल से नहीं देखी। अब देखी, तो पहचान गई।”
“मतलब दादा जानते थे कि सुखिया ज़िंदा है?”
“या दादा ने उसे ज़िंदा छोड़ा था,” बंसी ने कहा। उसकी आवाज़ सुनकर मुझे लगा कि वो कुछ और जानता है।
“क्या बोल रहा है तू?” मैंने कहा।
बंसी ने अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाला — वही फटा हुआ, जो उसके ससुर के लोहे के डिब्बे से मिला था।
“इस पर मैंने पहले कुछ नहीं कहा,” उसने कहा, “क्योंकि समझ नहीं आया था। रसीद पर हिस्सेदार का नाम मिटाया था। पर नाम के नीचे एक कोना बचा था — उलटा कोना-चिह्न। और उसके नीचे दो अक्षर — ‘सु’।”
मैंने काग़ज़ देखा। सच में — मिटे हुए नाम के नीचे, उलटे कोना-चिह्न वाली एक छोटी लकीर और उसके नीचे ‘सु’।
“तो हवेली के हिस्सेदारों में सुखिया का भी नाम था?” हरीश चंद्र ने कहा। “और किसी ने उसे मिटाया।”
“उस वक़्त हवेली के काग़ज़ात संभालने वाला कोई और था,” गिरधारी देवी ने कहा। “मैं तब बच्ची थी। पर मुझे याद है, एक रात हमारे घर आए थे — तीन आदमी। और सुबह तक सुखिया गायब था।”
“और अब?” मैंने कहा। “अब वो कहाँ होगा?”
“यही तो सवाल है,” बंसी ने कहा। “और इस सवाल का जवाब किसी के पास है। शायद उस आदमी के पास जो आज रात भवानी की बैठक में बैठेगा।”
तभी नीचे से आवाज़ आई। कोई गाड़ी का दरवाज़ा खोल रहा था, फिर बंद कर रहा था — दो बार। औरत खिड़की के पास गई और परदे के बीच से झाँका।
“दो गाड़ियाँ और आई हैं,” उसने कहा। “भवानी के आदमी जाग रहे हैं।”
“तो अब निकलना होगा,” हरीश चंद्र ने कहा। “बुआ, आपको अभी चलना होगा।”
गिरधारी देवी खड़ी हुईं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और ठंडी आवाज़ में कहा, “मेरी एक शर्त है।”
“कहिए।”
“मुझे भवानी के सामने नहीं ले जाना,” उन्होंने कहा। “पहले थाना। फिर तहसील। भवानी के सामने मैं तब खड़ी होऊँगी, जब काग़ज़ मेरे हाथ में होंगे।”
“मंज़ूर,” मैंने कहा।
हम नीचे उतरे। सीढ़ी के पास वही सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी फिर मिला — पर इस बार उसके हाथ में गिलास नहीं, एक छड़ी थी।
“कहाँ जा रहे हो?” उसने कहा।
मैंने अपनी जेब से वो काग़ज़ निकाला जो राजेंद्र ने दिया था — थाने की मुहर लगी पर्ची।
“ये देख,” मैंने कहा। “अगर हमें रोका, तो सुबह तक यहाँ जो कुछ है, सब थाने में होगा। और तेरा नाम भी सबसे पहले।”
उसने पर्ची देखी। फिर उसने गिरधारी देवी की तरफ़ देखा।
“बुआ,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में एक और आदमी था। “आप जा रही हैं?”
गिरधारी देवी ने उसकी तरफ़ देखा। “तू कौन है?”
“मैं वो हूँ जिसे भूल गए,” उसने कहा। “मैंने सुखिया को ज़िंदा देखा है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। पर ये सन्नाटा तीन सेकंड से ज़्यादा नहीं रहा — क्योंकि तभी बाहर से एक आवाज़ आई, भवानी की आवाज़, जो गाड़ी से उतर रहा था।
“मन्नू!” भवानी की आवाज़ गलियारे में गूँजी। “मन्नू, तू अंदर है न? निकल बाहर। बात करनी है।”
हरीश चंद्र ने मेरा कंधा पकड़ा। “पीछे से,” उन्होंने कहा।
“नहीं,” मैंने कहा। “गिरधारी देवी को पहले निकालना है।”
“तो निकाल,” बंसी ने कहा। “मैं रोकता हूँ भवानी को।”
“तू कैसे रोकेगा?”
बंसी ने अपनी जेब से एक लिफ़ाफ़ा निकाला — वही जो बंसी के ससुर की रसीद के साथ मिला था।
“इस पर लिखा है — ‘भवानी को दिखाना, जब वो ग़ुस्से में हो’,” उसने कहा। “पता नहीं अंदर क्या है। पर आज के लिए यही काफ़ी है।”
वह बाहर चला गया। मैंने औरत की तरफ़ देखा।
“पिछला रास्ता?”
“रसोई के पीछे एक कच्चा फाटक है,” उसने कहा। “कूड़े के डिब्बों के पीछे से।”
“तो चलो,” मैंने कहा।
हम गिरधारी देवी को लेकर पीछे की तरफ़ बढ़े। गलियारे के आख़िर में एक छोटा दरवाज़ा था, जो रसोई से जुड़ा था। पर जैसे ही मैंने दरवाज़ा खोला, बाहर एक आदमी खड़ा मिला — वो नहीं जो सोया था। एक और, जिसने अपनी कमर पर हाथ रखा हुआ था।
“यहाँ से नहीं,” उसने कहा।
तभी पीछे से आवाज़ आई — भवानी की नहीं, बंसी की, ज़ोर से। “भवानी! ये लिफ़ाफ़ा तेरे बाप का है, या तेरा?” और फिर भवानी की आवाज़, कुछ ऐसी जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी — दबी हुई, धीमी, जैसे किसी ने उसका गला पकड़ लिया हो।
बाहर खड़े आदमी ने पीछे मुड़कर देखा। उसी पल में मैंने गिरधारी देवी को आगे किया, और औरत ने उसका हाथ पकड़कर उसे कूड़े के डिब्बों के पीछे से निकाल दिया।
“तू भी निकल,” औरत ने मुझसे कहा। “मैं आती हूँ।”
“बंसी?”
“वो अपनी खबर रखेगा।”
मैं और हरीश चंद्र कूड़े के डिब्बों के पीछे से निकले। पिछली गली में गाड़ी खड़ी थी। गिरधारी देवी पहले से बैठी थीं। हरीश चंद्र भी बैठ गए। मैं गाड़ी के पास खड़ा रहा।
दो मिनट बाद बंसी आया — हाँफता हुआ, पर हँसता हुआ।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
“लिफ़ाफ़े में एक काग़ज़ था,” उसने कहा। “‘भवानी, तेरे बाप ने कहा था — कभी किसी से न पूछना कि तू किसका बेटा है।’”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। “और भवानी ने क्या कहा?”
“कुछ नहीं,” बंसी ने कहा। “वो बैठ गया। गाड़ी की सीट पर। बस बैठ गया।”
हम गाड़ी में बैठे। बंसी ने गाड़ी चलाई। पीछे मुड़कर देखा — भवानी अपनी गाड़ी के पास खड़ा था, हाथ में वो काग़ज़, और उसका चेहरा वैसा था जैसे किसी ने उसका नाम मिटा दिया हो।
रास्ते में हरीश चंद्र ने कहा, “अब थाना?”
“नहीं,” गिरधारी देवी ने कहा। “पहले मन्नू का घर। मुझे उसकी माँ से मिलना है।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“बुआ,” मैंने कहा, “माँ को अभी नहीं पता कि आप कौन हैं।”
“मुझे पता है,” उन्होंने कहा। “और आज रात उसे भी पता चल जाएगा।”
घर पहुँचे तो रात के नौ बज रहे थे। रीना दरवाज़े पर खड़ी थी, और माँ चूल्हे के पास बैठी थी। माँ ने दरवाज़ा खुलते ही मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरे पीछे खड़ी औरत को देखा — और उसके हाथ से चाय का गिलास छूट गया।
गिलास फ़र्श पर गिरा और टूट गया। माँ ने उसे उठाने की कोशिश नहीं की। वो बस खड़ी रही।
“माँ,” गिरधारी देवी ने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी। “सरोज।”
माँ ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया। फिर वो धीरे-धीरे गिरधारी देवी के पास गई और उनके पैरों पर बैठ गई।
“तू ज़िंदा है,” माँ ने कहा। “तू ज़िंदा है, माँ।”
रीना ने मेरी तरफ़ देखा। “मन्नू, ये क्या है?”
“ये तेरी नानी हैं,” मैंने कहा। “माँ की माँ।”
रीना कुछ नहीं बोली। वो दीवार से टिक गई और फिर धीरे-धीरे बैठ गई।
दस मिनट तक कोई कुछ नहीं बोला। फिर माँ उठी, पानी लाई, और सबको बैठाया। और फिर उसने पहली बार अपनी पूरी कहानी सुनाई।
“जिस दिन तेरे पापा गए,” माँ ने कहा, “उस रात जमुना देवी मेरे पास आई थीं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और कहा — ‘तेरे पति नहीं लौटेंगे। तू अब घर में मत रुक।’”
“मैं समझी नहीं। मैंने कहा — क्यों?”
“उन्होंने कहा — भवानी के आदमी तुझे भी उठा लेंगे।”
माँ ने चाय का घूँट लिया।
“उस रात जमुना देवी मुझे हवेली ले गईं। नींव वाली कोठरी में। वो कोठरी जिसके बारे में कोई नहीं जानता था। मैं वहाँ तीन दिन रही।”
“तीन दिन?” रीना ने कहा। “तूने हमें कभी नहीं बताया।”
“क्या बताती?” माँ ने कहा। “तू उस वक़्त आठ साल की थी। और मन्नू दस का। मैंने सोचा — बच्चों को क्यों डराऊँ।”
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