The Token System – Chapter 680
“उन तीन दिनों में,” मैंने कहा, “तुझे कुछ मिला?”
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। “तू पूछता है, तो सुन। उस कोठरी में एक पुराना बक्सा था। लोहे का। ज़ंग लगा। मैंने उसे खोला। उसमें काग़ज़ थे।”
“कौन से काग़ज़?” हरीश चंद्र ने कहा। उनकी आवाज़ में वो तेज़ी थी जो किसी वकील के पास तब आती है जब मुक़दमा पलटने लगे।
माँ ने हरीश चंद्र की तरफ़ देखा। “हरि सिंह की बही। उसकी लिखाई।”
“बही?” मैंने कहा। “पूरी बही?”
“पूरी नहीं। आधी जली हुई। पर जितनी बची थी, उसमें एक बात लिखी थी।”
माँ रुकी। उसने अपनी गोद में रखी चादर की तहें सीधी कीं।
“लिखा था — हरि सिंह नहीं मरा है। वो ज़िंदा है।” माँ ने सबकी तरफ़ देखा। “और भवानी हरि सिंह का बेटा नहीं है।”
“तो?” बंसी ने कहा।
“भवानी हरि सिंह का पोता है,” माँ ने कहा। “हरि सिंह का बेटा कोई और था, और वो बेटा अब तक ज़िंदा है।”
कमरे में बैठे हर आदमी की आँखें माँ पर टिक गईं। हरीश चंद्र ने अपना चश्मा उतारा और उसे मेज़ पर रख दिया। बंसी की उँगलियाँ चाय के गिलास पर जम गईं।
“माँ,” मैंने कहा। “वो काग़ज़ कहाँ हैं?”
“नींव की कोठरी में,” माँ ने कहा। “ईंटों के नीचे। बक्सा वहीं है।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “और उस तक पहुँचने का रास्ता सिर्फ़ मुझे पता है।”
“कैसे?”
“जमुना देवी ने मुझे उस रात रास्ता दिखाया था,” माँ ने कहा। “वो कोठरी सीधी नहीं है। उसमें एक और कोना है — छोटा, अंधेरा। उसी कोने में बक्सा है।”
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। तीन बार, ज़ोर से। रीना उठी और दरवाज़ा खोला।
बाहर जगन्नाथ लाल का आदमी खड़ा था — वही जिसने सुबह लिफ़ाफ़ा दिया था। उसके पीछे दो और आदमी थे।
“मनोहर जी,” उसने कहा। “जगन्नाथ लाल जी ने कहा है — कल सुबह ग्यारह बजे बैठक है। उस बैठक में रीना जी का रिश्ता पक्का होगा।”
“पर एक शर्त है,” उसने आगे कहा। “मनोहर जी को भवानी साहब से सार्वजनिक माफ़ी माँगनी होगी। अगर माफ़ी नहीं माँगी, तो रिश्ता टूट जाएगा। और अगर माफ़ी माँग ली, तो सब ठीक।”
रीना ने उसकी तरफ़ देखा। “तू जगन्नाथ लाल का आदमी है या भवानी का?”
“मैं वो हूँ जो बात करने आया है,” उसने कहा। “बात सुन लो। कल ग्यारह बजे।”
वो मुड़ा। पर तभी माँ खड़ी हो गई। वो दरवाज़े तक गई और उसके सामने खड़ी हो गई।
“सुन,” माँ ने कहा। “रिश्ता टूटेगा नहीं।”
आदमी रुका। “क्यों?”
“क्योंकि कल की बैठक में मैं ख़ुद आऊँगी,” माँ ने कहा। “और तब सबको पता चलेगा कि भवानी किसका बेटा है।”
आदमी हँसा। “बुढ़िया, तू क्या जानती है?”
“मैं वो जानती हूँ,” माँ ने कहा, “जो तेरा भवानी साहब भी नहीं जानता। जा, उसे बता दे — सरोज कल आएगी। और वो अपने साथ वो काग़ज़ लाएगी जो उसने तीन दिन हवेली की नींव में रखे थे।”
आदमी के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने पीछे देखा — उसके दो साथी भी हिल गए थे।
“तू…” वो कुछ कहने ही वाला था कि माँ ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
माँ पलटी। उसका चेहरा अब काँप नहीं रहा था। वो सीधी मेरी तरफ़ आई।
“मन्नू,” उसने कहा, “आज रात हमें हवेली जाना है। उस कोठरी से वो बक्सा निकालना है। अगर वो काग़ज़ जगन्नाथ लाल के हाथ लगे, तो सब बेकार हो जाएगा।”
“पर भवानी?”
“भवानी आज रात कुछ नहीं करेगा,” माँ ने कहा। “बंसी ने जो काग़ज़ दिखाया, वो उसे खा गया है। उसे आज रात अपने बाप के सवाल से फ़ुरसत नहीं।”
मैंने गिरधारी देवी की तरफ़ देखा। वो बैठी थीं, हाथ जोड़े, आँखें बंद। और उनके होंठ धीरे-धीरे हिल रहे थे — कोई पुरानी प्रार्थना, या कोई पुराना हिसाब।
“बुआ?” मैंने कहा।
उन्होंने आँखें खोलीं। “मैं जानती थी,” उन्होंने कहा, “कि एक दिन ये काग़ज़ ख़ुद बाहर आएँगे। पर मुझे नहीं पता था कि उन्हें निकालने वाला मेरा ही नाती होगा।”
“तो चलो,” मैंने कहा। “हवेली चलते हैं।”
बंसी उठा। “मैं गाड़ी निकालता हूँ।”
“मैं साथ चलूँगा,” हरीश चंद्र ने कहा।
रीना खड़ी हुई। “मैं भी।”
“नहीं,” माँ ने कहा। “तू घर पर रह। अगर हम लौटे, तो तेरे लिए ही लौटेंगे।”
रीना एक पल को रुकी, फिर मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया। वो बैठ गई।
गाड़ी में बैठते वक़्त मेरी जेब फिर गरम हुई। मैंने हाथ डालकर टोकन निकाला — पर टोकन नहीं था। मेरी हथेली पर कुछ और था। एक छोटा काग़ज़, जो अभी-अभी जेब में आया था। उस पर सिर्फ़ दो लाइनें थीं, मेरी ही लिखाई में — हालाँकि मैंने कभी नहीं लिखा था।
“हिसाब अब घर के अंदर चलेगा। बाप का हिसाब बेटे से पहले।”
मैंने काग़ज़ बंसी को दिया। उसने पढ़ा, फिर मेरी तरफ़ देखा।
“मन्नू,” उसने कहा, “घर के अंदर कौन है?”
“माँ,” मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फिसल गई। “और रीना।”
मैंने पीछे मुड़कर देखा। हमारा घर अब भी वहीं था — रोशनी जल रही थी, दरवाज़ा बंद। पर खिड़की पर एक परछाई खड़ी थी, जो रीना की नहीं थी। वो परछाई सरोज की भी नहीं थी।
वो किसी और की थी।
॥
गाड़ी के पीछे मुड़कर देखा तो वो परछाई खिड़की पर नहीं थी। दीवार के सहारे सरककर गली की तरफ़ चली गई थी। बंसी ने गाड़ी आगे बढ़ा दी और मैंने सोचा कि शायद वो रीना की ही परछाई थी और मैंने अपनी आँखों को ज़्यादा काम दे दिया था। पर उस वक़्त मन में यह चुभन रह गई थी कि घर के पीछे कोई खड़ा था जो देखना चाहता था कि हम गए या नहीं।
हवेली के गेट पर पहुँचते ही सबसे पहले जो चीज़ दिखी, वो थी काग़ज़ की एक पीली पट्टी, जो गेट के फ्रेम पर चिपकी थी। उस पर चारों तरफ़ गोल गोल मुहर लगी थी और बीच में साफ़ अक्षरों में लिखा था — अदालत का आदेश। नीचे एक लाइन — इस हवेली पर आज किसी भी तरह का काम नहीं होगा। कल सुनवाई के बाद ही कोई ईंट हिलेगी।
रामदीन ने पट्टी पढ़ी और हँसा। “देखा? मैंने कहा था न, हरीश चंद्र बाबू कोई कम नहीं।”
“इसका मतलब मज़दूर आज नहीं आएँगे,” बंसी ने कहा।
“मज़दूर नहीं आएँगे,” रामदीन ने कहा, “पर भवानी का आदमी ज़रूर आएगा। वो काग़ज़ पढ़ेगा नहीं, फाड़ेगा।”
हम अंदर घुसे। बरामदा खाली था। माँ गेट पर ही रुकी और मेरी तरफ़ मुड़कर बोली, “मन्नू, अब तू आगे आ। रास्ता तुझे दिखाना है, मुझे नहीं।”
“मैं? मुझे कहाँ पता है?”
“तू पापा का बेटा है,” माँ ने कहा। “पापा ने जो काग़ज़ दीवार में छिपाया था, उसी तरह कोठरी का रास्ता भी छिपाया है। जा, उत्तर वाली दीवार के नीचे देख।”
हम उत्तर वाली दीवार के पास पहुँचे। दीवार पर वो पुरानी ईंटें अब भी थीं, पर उनके बीच की मिट्टी कहीं-कहीं नई लग रही थी, जैसे किसी ने जल्दी में पोती हो। रामदीन ने हाथ लगाकर देखा और बोला, “ये मिट्टी दो दिन पुरानी है। भवानी का आदमी यहाँ आ चुका है।”
“तो क्या कोठरी खुल गई?” मैंने पूछा।
“नहीं,” माँ ने कहा। “कोठरी का रास्ता इस दीवार में नहीं, इसके नीचे है।”
वो आगे बढ़ी और दीवार के सबसे नीचे की तरफ़ इशारा किया। ज़मीन पर तीन पत्थर के टुकड़े रखे थे, एक-दूसरे से चिपके, जैसे कोई फ़र्श बनाया गया हो। माँ ने सबसे नीचे वाला पत्थर अपने पैर से दबाया। वो हिला, फिर एक तरफ़ खिसक गया और नीचे अंधेरा दिखाई दिया।
“यहाँ से उतरना है,” माँ ने कहा। “सात सीढ़ियाँ हैं। फिर दरवाज़ा है। दरवाज़े पर ताला नहीं, सिर्फ़ एक ईंट है जो उसे अंदर से बंद करती है। उसे धकेल देना।”
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