The Token System – Chapter 678
फिर उसने मेरी तरफ़ देखा — और सिर हिलाया।
मैंने सिर हिलाया। बंसी ने गाड़ी की रफ़्तार बढ़ाई।
बीस मिनट बाद हम भवानी के होम की पिछली गली में थे। गिरधारी देवी की बहन की काम करने वाली औरत गेट पर खड़ी थी — जैसे इंतज़ार कर रही हो।
वो मेरे पास आई।
"तुम मन्नू हो?" उसने पूछा।
"हाँ।"
"बुआ ने कहा था तुम आओगे।" उसने पीछे देखा, फिर धीरे कहा। "अंदर भवानी के दो आदमी हैं। बाहर नीम के नीचे चार। मैंने उन्हें चाय में कुछ डालकर सुला दिया। पर ज़्यादा देर नहीं है।"
"गिरधारी देवी कहाँ हैं?"
"अंदर, पहली मंज़िल पर।" उसने मेरी कलाई पकड़ी। "और सुनो। भवानी ने आज शाम मीटिंग बुलाई है। दलालों की। नाम है — 'हिसाब की बैठक'। उसमें तुम्हारा नाम भी लिया जाएगा।"
"कब?"
"आठ बजे।"
मैंने घड़ी देखी — सात बज चुके थे।
"तो अब हमारे पास एक घंटा है," मैंने कहा।
हरीश चंद्र ने काग़ज़ संभाला।
"एक घंटा," उन्होंने कहा। "चलो।"
मैं अंदर बढ़ा। पीछे से औरत ने फिर मेरा हाथ पकड़ा।
"एक बात," उसने कहा। "बुआ ने ये भी कहा था — अगर तुम अंदर जाओ, तो सीधे उनके कमरे में मत जाना। पहले उस कमरे में जाना जिसमें भवानी का बेटा बंद था। वहाँ एक दराज़ है। उसमें एक पुरानी तस्वीर है। वो तस्वीर किसी और को मत दे देना।"
"किसकी तस्वीर?"
"नहीं पता," उसने कहा। "पर बुआ ने कहा — वो तस्वीर वो चीज़ है जो भवानी ने कभी किसी को नहीं दिखाई।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
"और अब?" उसने कहा।
"पहले तस्वीर," मैंने कहा। "फिर बुआ।"
हम पिछले दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। रात की हवा में एक हल्की सी गरमाहट थी। मेरे टोकन की जेब फिर गरम हुई।
॥
पिछले दरवाज़े की तरफ़ बढ़ते वक़्त ही बंसी ने मेरा कंधा पकड़ लिया।
“एक बात पहले,” उसने कहा। “तस्वीर देखकर अगर हाथ काँपे, तो काग़ज़ नहीं देना।”
“काग़ज़ देना क्यों है?” मैंने कहा। “लेना है।”
“तेरी जेब में अब कितने काग़ज़ हैं, गिन ले।” उसने उँगली उठाई। “चारों चाबियाँ, तीन टोकन, गिरधारी देवी की तस्वीर, जमुना देवी का पीला काग़ज़, पापा की डायरी वाली पर्ची। और अब भवानी की तस्वीर भी। ये सब एक आदमी की जेब में अच्छा नहीं लगता।”
“तो तू रख ले,” मैंने कहा।
“मैं नहीं रखूँगा,” बंसी ने कहा। “मेरी जेब से चीज़ें अपने आप गिरती हैं। बंसी के ससुर वाली चाबी भी मुझे अपनी जेब में नहीं मिली थी — टंकी के नीचे पड़ी मिली थी।”
वह औरत पीछे खड़ी सुन रही थी। उसने धीरे से कहा, “जल्दी। पहली मंज़िल पर आदमी सो रहे हैं, पर नींद पर हिसाब मत बाँधो।”
हम अंदर घुसे। पिछला दरवाज़ा रसोई से जुड़ा था। रसोई में तेल की गरम ख़ुशबू थी और चूल्हे पर एक बड़ी तसली ढकी पड़ी थी। औरत ने रास्ता दिखाया — पीछे की संकरी सीढ़ी, जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था।
“ये सीढ़ी तो बाहर से नहीं दिखती,” हरीश चंद्र ने कहा।
“यही तो इस होम का सबसे बड़ा सच है,” औरत बोली। “बाहर से तीन सीढ़ियाँ, अंदर से पाँच। मरीज़ों को चक्कर आता है, पर कर्मचारी जानते हैं।”
पहली मंज़िल पर एक गलियारा था। दो दरवाज़ों के बीच में बनी थी वो दराज़ — दीवार में धँसी हुई, रंग वही, जैसे कोई उसे देख ही न सके।
“दराज़ खुली है,” औरत ने फुसफुसाया। “बुआ ने पहले ही कह दिया था। भवानी को शक न हो, इसलिए मैंने खुद खोली थी और सामान वैसे ही रख दिया।”
दराज़ में कपड़े थे, एक टूटी घड़ी, और सबसे अंदर — कपड़े में लिपटी एक तस्वीर। मैंने कपड़ा खोला।
तस्वीर पुरानी थी, किनारे से जली हुई। उसमें तीन आदमी खड़े थे। एक — दादा, मुहर हाथ में। दूसरा — जवान, कोई तीस-पैंतीस का। तीसरा — बीच में, सबसे लंबा, और उसका चेहरा किसी ने खुरच दिया था, नाखून या किसी नुकीली चीज़ से।
“ये बीच वाला कौन है?” बंसी ने पूछा।
मैंने तस्वीर को उलटा किया। पीछे लिखा था — “जो बीच में खड़ा है, वो कोई नहीं है। वो हरि सिंह की सूरत है।”
“हरि सिंह?” बंसी ने कहा। “भवानी का दादा?”
“नहीं,” हरीश चंद्र ने कहा, तस्वीर को ध्यान से देखते हुए। “भवानी का दादा बुज़ुर्ग था। ये आदमी जवान है।” उन्होंने तस्वीर मेरी तरफ़ घुमाई। “ये हरि सिंह हो नहीं सकता। ये हरि सिंह का कोई और है।”
उसी वक़्त गलियारे के आख़िर से आवाज़ आई। हम सब दीवार से चिपक गए। कोई गुनगुना रहा था — कोई पुरानी, धीमी धुन। आवाज़ क़रीब आई, फिर कमरे में घुस गई। एक आदमी था, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में गिलास। उसने दरवाज़े पर से अंदर झाँका, गिलास पिया, और लौट गया।
औरत ने साँस रोकी हुई थी।
“ये नहीं सोया,” उसने फुसफुसाया। “इसने चाय नहीं पी। कुछ पता है इसे।”
“कितना वक़्त है?” मैंने पूछा।
“दस मिनट। बीस से ज़्यादा नहीं।”
“तो गिरधारी देवी को अब ले चलो,” हरीश चंद्र ने कहा। “तस्वीर मन्नू के पास रहेगी। रास्ते में बात करेंगे।”
“नहीं,” मैंने कहा। “तस्वीर पहले।” मैंने वो जली तस्वीर उलटी करके फिर देखी — और इस बार नीचे एक और लाइन दिखी, बहुत छोटी, फीकी पेंसिल में — “सुखिया के पोते को दिखाना।”
“सुखिया?” मैंने ज़ोर से कहा। “सुखिया कौन है?”
औरत ने मेरी तरफ़ देखा और उसका चेहरा बदल गया।
“सुखिया,” उसने धीरे कहा, “बुआ के बड़े भाई का नाम था। पर वो तो… वो तो कभी शहर नहीं आया।”
“पर यहाँ लिखा है — सुखिया के पोते को दिखाना।”
औरत पीछे हट गई। उसकी आँखों में वो डर आ गया, जो मैंने कई चेहरों पर देखा था — ऐसा डर जो बताता है कि कहानी की एक और परत अभी बाक़ी है।
“बुआ से पूछो,” उसने कहा। “मुझे नहीं पता।”
हम गिरधारी देवी के कमरे की तरफ़ बढ़े। गलियारे के आख़िर में एक कमरा था, जिसके दरवाज़े पर बाहर से कुंडी नहीं थी — पर अंदर से भारी कुछ लगा था। औरत ने दरवाज़ा खटखटाया — तीन बार, फिर एक बार।
अंदर से आवाज़ आई। “कौन?”
“मैं हूँ, बुआ। मन्नू आया है।”
दरवाज़ा खुला। गिरधारी देवी बिस्तर पर बैठी थीं, पीली चादर ओढ़े। उनके चेहरे पर वो थकान थी जो सिर्फ़ उन लोगों के चेहरे पर होती है जो बरसों से इंतज़ार कर रहे हों।
“आ गया,” उन्होंने कहा। “मुझे लगा था, तू शाम तक नहीं आएगा।”
“बुआ,” मैंने कहा और उनके पास बैठ गया। “एक बात पूछनी है।”
“पूछ।”
मैंने तस्वीर उनके आगे रखी। “इस पर लिखा है — सुखिया के पोते को दिखाना। सुखिया कौन है, बुआ?”
गिरधारी देवी ने तस्वीर को देखा — और उनका हाथ काँप गया। उन्होंने तस्वीर को उठाया, आँखों के पास ले गईं, और फिर वो कुछ हुआ जो मैंने कभी नहीं सोचा था — वो रो पड़ीं। बिना आवाज़ के, बस आँसू।
“सुखिया,” उन्होंने धीरे कहा, “मेरा भाई था। छोटा। मुझसे चार साल छोटा। वो जब सोलह साल का था, तब हवेली के कुएँ में गिर गया।”
“मर गया?”
“मर गया,” उन्होंने कहा। “पर जब मैंने ताबूत खोला, तो उसमें पत्थर थे। मैंने किसी को नहीं बताया। मैं तब चौदह साल की थी, और डर गई थी। मुझे लगा — जिस घर में बच्चे के ताबूत में पत्थर डाले जाते हैं, वहाँ कोई ज़िंदा नहीं बचेगा।”
कमरे में देर तक कोई नहीं बोला। बंसी ने दीवार की तरफ़ देखा। हरीश चंद्र ने अपना चश्मा उतारा और उसे रूमाल से पोंछने लगे।
“तो सुखिया ज़िंदा हो सकता है?” मैंने पूछा।
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