The Token System – Chapter 675
"मेरे पास होश कम है," उसने कहा। "पर मैं सुन रही हूँ। पहले भी सुनती थी। तेरे बाप ने मुझे ठीक उसी लहजे में बोला था — 'मालकिन के पास होश कम है।' और उसके बाद मेरी काग़ज़ जला दिए।"
भवानी ने लाठी से फर्श खुरचा।
"माँ," उसका लहजा बदला — कोई अनचाहा नरमी आ गई। "मैं तुझे अपने घर ले आया, इलाज कराया। तूने क्या किया — मेरे ही ख़िलाफ़ बैठी है। वो काग़ज़ दे, फिर जो कहना है कह। मैं केस हटा दूंगा।"
"तेरे पास कोई केस नहीं है हटाने को," हरीश चंद्र ने कहा। "स्थगन आदेश चुका तेरा। हमें जो चाहिए, काग़ज़ हम ख़ुद निकाल लेंगे।"
भवानी ने उसे देखा। "वकील साहब, आप अपने मुवक्किल की कदर करो। तेरे घर का काग़ज़ कहीं और भी हो सकता है।"
हरीश चंद्र शांत था। "मुझे मेरे घर का ठिकाना मालूम है।"
भवानी ने फिर गिरधारी देवी की तरफ़ देखा, और उसकी निगाह बंसी की मुट्ठी पर टिक गई, जिसमें चाबी थी। उसका चेहरा कसा।
"चाबी निकाल," उसने कहा।
"मेरी चाबी है," गिरधारी देवी ने कहा। "जिसे चाहूँ दूँ। ये बंसी है — मेरे भाई का बेटा। इसका हक़ है।"
"इसका हक़?" भवानी हँसा। "ये चाय बेचने वाला मेरे हिसाब का हिस्सेदार है?"
"हाँ," गिरधारी देवी ने कहा। "और आज ये चाबी इसी के हाथ में रहेगी।"
भवानी ने दो कदम आगे बढ़ाया, फिर रुक गया। उसने धीरे से कहा, "माँ, तू जो कर रही है, इसका नतीजा तेरे बेटे को भुगतना पड़ेगा।"
गिरधारी देवी ने उसकी आवाज़ सुनी और मेरी तरफ़ देखा। उसका हाथ काँप उठा।
"यह आवाज़…" उसने धीरे कहा। "यह तो हरि सिंह की आवाज़ है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
"क्या बोल रही है तू?" भवानी ने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार साफ़ टूटी।
गिरधारी देवी ने उसकी तरफ़ देखा, जैसे किसी दूसरे को देख रही हो। "हरि सिंह मरा नहीं," उसने मेरी कलाई पकड़कर कहा। "सुना — उसकी आवाज़। वही लहजा।"
"बुआ," रामकथा ने कहा, "ये भवानी है।"
"मैं जानती हूँ कौन है," उसने आँखें बंद करके कहा। "चार लड़कों को उसने इसी फर्श पर बैठाया था और काग़ज़ छिने थे। उसने हमसे कहा था — 'अगर बोलोगे, तो ये घर नहीं रहेगा।' उसी की आवाज़।"
भवानी ने लाठी नीचे रख दी, जैसे हाथ से सहारा छूट गया हो।
"मेरे पिताजी की आवाज़ है," उसने धीरे कहा। "ये बात अलग है।"
"अलग नहीं है," गिरधारी देवी ने कहा। "तूने मुझे आज तक क्यों नहीं बताया कि तेरे पिताजी ने मुझे बंधक बनाया था?"
"क्योंकि वो मेरे पिताजी थे," भवानी ने कहा, और पहली बार उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं, थकान थी। "और तू मेरी माँ है। मुझे किसी की तरफ़ होना था। मैंने तेरी तरफ़ होना चुना — पर तूने मुझे चुना नहीं। तूने आज तक नहीं बताया कि तेरे पास काग़ज़ हैं।"
"तूने कभी पूछा नहीं," गिरधारी देवी ने कहा। "तू बस आया — 'काग़ज़ दो'।"
भवानी कुछ देर खड़ा रहा। फिर उसने बाहर की तरफ़ देखा और कहा — "एक बात बताओ, उस हिसाब में मेरा नाम है या नहीं?"
हरीश चंद्र ने कहा, "हिसाब में नाम तेरे पिताजी का है। काम तेरे नाम का है।"
भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। "तो तू अब अपने बाप का काम कर रहा है, माली के बेटे। मेरी माँ समझती है कि मैं अपने बाप की आवाज़ में बोलता हूँ। तुझे फ़र्क नहीं पड़ता।"
"मुझे फ़र्क नहीं पड़ता," मैंने कहा। "मुझे बस वो काग़ज़ चाहिए जो आपके पिताजी ने जलाए थे।"
"वो जल गए," भवानी ने कहा।
"नहीं जले," गिरधारी देवी ने कहा, और उसकी आँखों में चमक आई। "आम के पेड़ के नीचे, तीन ईंट। चाबी बंसी के पास है, और काग़ज़ वहीं गड़े हैं जहाँ उसने कहा — 'जो खाली काग़ज़ पर अँगूठा लगाएगा, उसके नाम होगा।'"
भवानी ने चारपाई के पास रखी लोहे की पुरानी ट्रे उठाई और पटक दी। गिरधारी देवी चौंकी, फिर साँस लेने की कोशिश करने लगी। रामकथा भागकर पानी लाया।
"बाहर जाओ," मैंने भवानी से कहा। "अभी।"
भवानी बाहर गया, पर दरवाज़े पर एक पल रुका। उसने पीछे मुड़कर कहा, "अगर तू वो काग़ज़ निकालता है, माली के बेटे, तो पहले उसे मेरे हाथ में लाना। और उसकी कीमत सुन लेना।"
"कीमत?" मैंने पूछा।
"मेरी माँ," उसने कमरे के अंदर की तरफ़ हाथ किया। "ये काग़ज़ जब तक ज़मीन में हैं, मैं इसे इलाज के लिए शहर भेज सकता हूँ। निकाल ले, तो सबूत बाहर आ जाएगा — और मैं इसे होम में ले जाऊँगा। तेरे रिकॉर्ड के काग़ज़ पर।"
हरीश चंद्र ने मेरी तरफ़ देखा, पर मैंने कुछ नहीं कहा। भवानी चला गया। सफ़ेद गाड़ियाँ निकल गईं, पर नीम के नीचे बैठे दो आदमी वहीं रहे।
डॉक्टर अंदर आया और नब्ज़ देखने लगा।
"ज्यादा वक़्त नहीं है," उसने बाहर आकर कहा। "और ज़ोर देकर बोलना मना है।"
बंसी ने चाबी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "अब ये?"
"बुआ से पूछते हैं," मैंने कहा।
हरीश चंद्र ने मुझे रोका। "मन्नू, सोच ले। अगर अभी निकाला, तो उसका इलाज आख़िरी रास्ते पर पहुँच सकता है। भवानी अपने वादे जैसा भी हो, इलाज में ऊपर-नीचे कर सकता है। पर अगर काग़ज़ निकालें, तो ये मामला खत्म। हम चाबी लेकर कल सुबह चले जाएँ, तो शायद वो इसे रहने दे।"
"आप मेरी माँ से क्या कह रहे हैं?" बंसी ने कहा।
"मैं यही कह रहा हूँ — एक बूढ़ी औरत की जान, और काग़ज़। दोनों में से एक बचाना है।"
मैंने गिरधारी देवी की तरफ़ देखा। वह अपनी चादर से मेरी तरफ़ देख रही थी। उसके होंठ हिले — धीरे। मैं पास गया।
"काग़ज़ निकाल," उसने मेरे कान के पास कहा। "मेरी जान का हिसाब तू नहीं, कोई और बैठा है। और वो तेरे ही आँगन में बैठा है।"
"कौन?"
"जो पहले आया था," उसने कहा, और उसकी आँखें बंद हो गईं।
बंसी और रामकथा पीछे के बगीचे में गए। दो आदमी बाड़ के बाहर से रोकने की कोशिश करते रहे, पर बंसी ने कुल्हाड़ी उठाई और वो पीछे हट गए। तीन ईंट गिनकर, आम के पेड़ की जड़ों के बीच उन्होंने मिट्टी खोदी। एक पुरानी टिन की डिब्बी मिली — जंग लगी, ताला टूटा हुआ। डिब्बी में लाल कपड़े में लिपटे चार काग़ज़ थे, और एक छोटी पीतल की तश्तरी, जिस पर कोई निशान खुदा था।
बंसी ने डिब्बी मेरे हाथ में दी। "ये तेरे दादा की लिखाई है।"
मैंने काग़ज़ खोले। पहले पन्ने पर साफ़ लिखा था — "हवेली। उत्तर वाली दीवार के नीचे। तीन हिस्से। चौथा यहाँ।" उसके नीचे मेरे दादा का नाम था, गिरधारी देवी का, और एक तीसरा — मिटा हुआ, पर नीचे की लाइन में लिखा था — "जो इस हिसाब को पूरा करेगा, उसके पास चारों चाबियाँ होंगी।"
बंसी ने कहा, "चार चाबियाँ? हमारे पास तीन हैं।"
हरीश चंद्र ने काग़ज़ उठाया। "चौथी कहाँ है?"
गिरधारी देवी ने डिब्बी और चाबी को देखकर कहा — "यही वो काग़ज़ था जिसकी वजह से उसने मुझे घर से निकाला। पर अब एक बात पूछती हूँ। अब तुम जो करने जा रहे हो, वो तुम्हारे बाप ने कहा था या तुम्हारे दादा ने?"
"क्यों?" मैंने पूछा।
"क्योंकि मुझे उस रात हरि सिंह की आवाज़ सुनाई दी थी," उसने धीरे कहा। "और यहाँ कोई ऐसा है जो हरि सिंह की आवाज़ में बोल सकता है।"
बाहर नीम के नीचे बैठे दो आदमियों में से एक गाड़ी की तरफ़ गया और मुँह छिपाकर फोन पर बोला। मैंने उसकी आवाज़ सुनी — बस एक वाक्य — "बाबा, काम हो गया।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
"बाबा?" उसने कहा। "अब ये बाबा कौन है?"
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"बाबा?" बंसी ने फिर कहा, और इस बार उसकी आवाज़ तेज़ थी। "मन्नू, ये बाबा कौन है?"
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