The Token System – Chapter 674
रोड खाली थी। चार बजे का वक़्त था। सामने बसवा का बोर्ड आया। हम उसी गली में घुसे।
गिरधारी देवी का घर छोटा था पर आँगन में दीपक जल रहे थे। डॉक्टर बाहर बैठा था, सिर झुकाए। हमें देखकर उठ गया।
"अंदर जाओ। पर ज़्यादा मत बोलना।"
मैं अंदर गया। कमरे में बुढ़ापे की गंध थी और दीवार पर तीन तस्वीरें — एक आदमी की, एक औरत की, और बीच में एक काग़ज़। मैंने गौर किया — वो वही रसीद थी जैसी बंसी के डिब्बे में थी। दो।
बिस्तर पर एक औरत लेटी थी। हड्डियाँ झलक रही थीं, आँखें धँसी हुई, पर आँखों में चमक थी।
वो बंसी को देखकर मुस्कुराई।
"तू आ गया," उसने धीरे कहा। "मैं सोच रही थी — मरने से पहले तुझे देखना है या नहीं। फिर सोचा, अगर नहीं देखा, तो बाद में तुझे शर्मिंदा होना पड़ेगा। और मैं तो चली जाऊँगी।"
बंसी की आँखें भर आईं।
"बुआ…"
"रो मत। मरने वाले को रुलाया जाता है, पर रोने से मरना जल्दी नहीं होता।" उसने हाथ बढ़ाया। "बैठ।" और फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तू मन्नू है?"
"हाँ।"
"तेरे पिता का चेहरा लिए हुए है।" वो कुछ देर देखती रही। "मुझे उसी से बोलना है। बंसी, तू दरवाज़े तक जा।"
बंसी मेरी तरफ़ देखकर बाहर चला गया।
गिरधारी देवी ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ बर्फ़ जैसी ठंडी थीं।
"तीसरी चाबी मेरे पास है," उसने कहा। "पर वो तुझे देने से पहले सुन ले।"
"बोलिए।"
"उस दिन तहसील में तेरे पिता मेरे साथ थे। मैं काग़ज़ लेकर गई थी। काग़ज़ देखकर हाकिम का चेहरा बदल गया। पीछे से भवानी का दादा आया और बोला काग़ज़ झूठे हैं। फिर उसने तेरे पिता की तरफ़ देखा और कहा — 'इनके पास से कोई काग़ज़ मिले तो इन्हें नौकरी से निकाल दिया जाएगा।' और तुम्हारे पिता जी, मेरे हाथ से काग़ज़ लेकर अपनी जेब में रख लिए और मुझे इशारे से बोले — बहन, चुप।"
"पर उन्होंने आपसे कहा था काग़ज़ छुपा लो।"
"वो उससे पहले की बात है।" उसने मेरा हाथ और कसकर पकड़ा। "असली काग़ज़ मैंने ज़मीन में गाड़े थे। घर के पीछे, पुराने आम के पेड़ के नीचे, तीन ईंट गिनकर। ये चाबी उसी ताले की है। ज
॥
गिरधारी देवी की उँगलियाँ मेरी हथेली पर ठंडी पड़ी थीं, और बात पूरी होने से पहले ही बंसी ने बाहर से दरवाज़ा खटखटाया।
"मन्नू! बाहर देख।"
मैंने बुआ का हाथ छोड़ा और खिड़की के पास गया। गली के मोड़ पर दो सफ़ेद गाड़ियाँ खड़ी थीं। एक के बोनट पर कोई बैठा था, दूसरी के पास तीन आदमी। सब सफ़ेद कुर्ते में। और सबसे आगे वो लंबा आदमी, जिसे मैंने तहसील में भवानी के साथ खड़ा देखा था।
"घर के चारों तरफ़ घूम रहे हैं," बंसी ने दरवाज़े से कहा। "और अभी एक आदमी हमारी गाड़ी का नंबर पढ़ रहा था।"
रामकथा पीछे से आया। "ये लोग बुआ के घर तक आ गए?"
"तेरे आने से पहले नहीं थे," गिरधारी देवी ने बिस्तर से कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी पर साफ़। "कल शाम से दो आदमी नीम के नीचे बैठे हैं। कहते हैं — मालकिन के लिए दवा लाए हैं। मैंने कहा, दवा अंदर रख दो। तो वो नहीं रखते। बस बैठे रहते हैं।"
हरीश चंद्र ने दरवाज़े की तरफ़ देखा। "ये घेराबंदी है। हमें यहाँ से बाहर नहीं जाने देंगे।"
"जाने की ज़रूरत ही क्या है?" गिरधारी देवी ने कहा। "जो लेने आए हो, वो तो यहीं पड़ा है।"
उसने अपनी चारपाई के नीचे हाथ डाला और एक छोटी मैली पोटली निकाली। कपड़ा खोला। अंदर एक पीतल की चाबी थी। भारी, तीन दाँते, ऊपर का हिस्सा घिसा हुआ। और चाबी से बँधी एक पुरानी चमड़े की डोरी।
"मेरा हिस्सा तेरे दादा ने बचाया था," उसने कहा। "मेरे पास तो सिर्फ़ याद ही बची थी। असली काग़ज़ दादा ने छिपाए, क्योंकि हरि सिंह उन्हें भी मारना चाहता था। पर वो तेरे दादा के हाथ नहीं आ सका।"
"मतलब हरि सिंह के आदमी दादा को…" मैंने पूछा।
"मुझे उस रात का पता था," उसने धीरे कहा। "हरि सिंह ने कहा था — माली को रास्ते से हटाओ। मैंने तेरे दादा को नीम के नीचे बुलाया और कहा — भाग जाओ। वो भागे। पर क्यों भागते? उनके पास कुछ नहीं था। और तब हरि सिंह ने मुझे धमकाया — कहा, अगर तू कुछ बोली, तो तेरा हिस्सा भी मिट जाएगा। इसलिए चुप रही।"
बंसी ने चाबी उठाई। "और काग़ज़ कहाँ गाड़े हैं?"
"पीछे आम का पुराना पेड़ है। बगीचे के कोने में। उसके नीचे से तीन ईंट गिनकर।" उसने कमरे की तरफ़ देखा। "पर पहले मुझे तेरे दादा का नाम जानने दे।"
"सुखदेव," मैंने कहा। "माली सुखदेव।"
"नहीं, बाबा का नहीं। तेरे पिता का असली बात — जो उन्होंने उस रात कही थी।"
रामकथा और बंसी दोनों ठिठके।
"आपको क्या पता?" मैंने पूछा।
"मैं वहीं थी," उसने कहा। "खिड़की पर। तेरे पिता को भवानी के दादा ने उस रात बुलाया था। तेरे पिता गाड़ी से उतरे और बोले — 'अगर मेरे बेटे को कुछ हो, तो हिसाब उसी के नाम होगा, जो खाली काग़ज़ पर अँगूठा लगाएगा।' और फिर वो गए।"
"हिसाब उसी के नाम?" बंसी ने कहा। "ये तो शर्त है।"
"शर्त तेरे ही हाथ में आई थी," उसने कहा। "जब तेरे ससुर का नाम मिटाया गया था और तेरे नाम रसीद के पीछे कुछ नहीं लिखा गया।"
हरीश चंद्र ने कहा, "उसका मतलब — उस रात अपनों में कोई बैठा है, जो आज भी हिसाब लिए खड़ा है।"
गिरधारी देवी ने अपनी चादर खींची। "जो भी खड़ा हो, मुझे अब जल्दी है।"
सामने गली में गाड़ी का हॉर्न बजा। लंबा आदमी आँगन की तरफ़ बढ़ा और दरवाज़े पर आकर बोला — "बुआ जी, ठाकुर साहब का सलाम। अंदर आ रहे हैं।"
रामकथा दरवाज़े पर खड़ा था, पर बंसी ने उसे पीछे खींच लिया और खुद दरवाज़ा पकड़ लिया।
"बाहर बोलो," बंसी ने कहा। "अंदर बीमार है।"
"ठाकुर साहब का हुक्म है।"
"ठाकुर साहब का हुक्म यहाँ नहीं चलता। मालकिन सो रही हैं।"
गाड़ी का दरवाज़ा फट से खुला और भवानी सिंह उतरा। पूरा सफ़ेद। गले में सोने की चेन और हाथ में लाठी। चेहरा उतरा हुआ। दो आदमी पीछे रुक गए।
"इधर आओ," उसने बंसी की तरफ़ बढ़ते हुए कहा। "मैं अपनी माँ से मिलने आया हूँ।"
बंसी ने मुँह नहीं बदला।
"ये माँ का घर है," भवानी ने कहा। "ये बुआ-बुआ मत करो। जब से बूढ़ी हुई है, मुझसे मिलने यहाँ आने से डरने लगी है।"
मैं पीछे से आकर दरवाज़े के चौखट पर खड़ा हो गया।
"क्या बात है?" भवानी ने मुझे देखकर कहा। "घर में ताले लगा के बैठे हो? मुझे मालूम है तुमने जगन्नाथ साहब के यहाँ चाय पी है। मैंने कहा था न — जो मेरे दर पर आना हो, चौखट साफ़ करके आना।"
"अंदर कोई बीमार है," मैंने कहा।
"मेरी माँ बीमार नहीं, मरने वाली है।" उसने लाठी की नोक से दरवाज़ा खटखटाया। "और मरने वाली के पास बेटे का हक़ बनता है। चल हट।"
बंसी ने खिड़की से पीछे आकर गिरधारी देवी की तरफ़ देखा। वह बिस्तर पर उठ बैठी थी।
"इसे बाहर न बुलाओ," उसने कहा। "अंदर आने दे। मुझे कुछ सुनना है।"
रामकथा ने दरवाज़ा खोला और भवानी अंदर आया। कमरे में वह धीमी रोशनी में खड़ा, अपने ही कपड़ों की चमक में कुछ अलग लग रहा था।
"माँ," उसने कहा। "लोग कह रहे हैं तूने कोई काग़ज़ छिपाए हैं। कुछ माली के बेटे को दे दिए हैं।"
"तेरे बाप ने मुझे तेरे पास भेजा था?" गिरधारी देवी ने पूछा।
भवानी ठिठका।
"तेरे बाप?" उसने कहा। "तू मेरी माँ है। तेरे पास होश कम है।"
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