The Token System – Chapter 673
मैं माँ की तरफ़ देखा। माँ की आँखें बंद थीं, जैसे वो ये सब पहले से जानती हों।
"तो पिता जानते थे?" मैंने पूछा। "काग़ज़ थे? हवेली में धोखा हुआ? और उन्होंने कुछ नहीं किया?"
"उन्होंने बचाया।" रामकथा ने कहा। "अगर वो काग़ज़ वहीं रहते, तो आज तुम्हारे पास कुछ नहीं होता। पर उस दिन के बाद तुम्हारे पिता ने भवानी के दादा की आँखों में आँखें नहीं डालीं। वो डर गए।" उसने रुक कर कहा, "और उस डर में उन्होंने सब कुछ दफ़न कर दिया। तुम्हें भी नहीं बताया। यही उनका गुनाह है।"
मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया। ज़र्द, फटा, ऊपर से धागे से बंधा हुआ। सील टूटी हुई थी। अंदर चार काग़ज़ — एक बंद मुकदमे की याचिका, एक नक़्शे की कॉपी, और एक चिट्ठी, जिस पर मेरे पिता की लिखाई थी।
मैंने चिट्ठी खोली। छोटे अक्षरों में लिखा था — "मैंने जो किया, वो डर में किया। मेरे बेटे से कहना, जब वो आदमी बने, तो ये काग़ज़ निकाले। लेकिन भवानी के दादा के सामने नहीं। उनके पीछे जो खड़ा है, उसके सामने।" और नीचे एक नाम था — "जगन्नाथ लाल।"
मेरे हाथ काँपने लगे। जगन्नाथ लाल। रीना के रिश्ते वाला जगन्नाथ लाल। जो मेरे पिता के मुंशी के दिनों का भी जानने वाला था।
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने वो चिट्ठी पढ़ी और उसका जबड़ा कस गया।
"तेरे पिता ने आख़िरी वक़्त में नाम लिखा," बंसी ने कहा। "अब मैं समझा — तेरे पिता डरते थे भवानी से नहीं। डरते थे उस आदमी से जो भवानी के पीछे बैठा है। और वो आज रीना के रिश्ते की शर्तें रख रहा है।"
"माँ," मैं उनकी तरफ़ मुड़ा। "पिता जानते थे? ये सब?"
माँ ने बैठकर मेरा हाथ पकड़ा।
"वो तेरे बड़े होने पर बोलने वाले थे," उन्होंने कहा। "पर वो बीमार पड़ गए। और फिर…" उन्होंने गला साफ़ किया। "मुझे भी डर लगता था। जगन्नाथ लाल की हवा में सांप जैसी खुशबू है — कोई नहीं जानता वो आता कहाँ से है।"
मैं खड़ा हो गया। काग़ज़ सब एक जगह रखकर लिफ़ाफ़े में ठूँस दिए।
"रामकथा जी," मैंने कहा। "चलिए।"
बंसी भी उठ गया।
"तू चलेगा?" माँ ने पूछा।
"माँ, तीसरी चाबी वहाँ है।" मैंने दरवाज़े में ही कहा। "और अब ये भी पता चला कि गिरधारी देवी के पास सिर्फ़ चाबी नहीं — तीस साल का सच है। अगर वो मर गई, तो वो सच लेकर मरेगी, और मैं कभी भवानी तक नहीं पहुँचूँगा।"
रामकथा उठा और बाहर निकल गया। मैंने बंसी को देखा।
"काग़ज़ कहाँ रखे?"
"कमर से बाँध ले।" बंसी ने कमर की तरफ़ इशारा किया। "बसवा पैंतालीस किलोमीटर है। मेरी गाड़ी में जाएँगे। और सुन — रास्ते में फ़ोन मत करना। रास्ता जानने वाले किसी के पास गाड़ी है।"
हम बाहर निकले। आधी रात थी। बंसी ने गाड़ी खड़ी की और हम तीन — रामकथा, बंसी और मैं — बैठ गए। माँ दरवाज़े पर खड़ी रहीं जब तक गाड़ी मुड़ी नहीं। मैंने उन्हें देखा — चांदनी में चादर में लिपटी, वो किसी पुराने तस्वीर जैसी लग रही थीं।
गाड़ी चल पड़ी। सड़क सुनसान थी। कुछ दूर चलकर बंसी बोला —
"तेरे पिता ने जो चिट्ठी में लिखा, वो मैं भूल नहीं रहा। 'जब तेरा बेटा आदमी बने।' मन्नू, वो तुझे तारीख दे रहे थे। अब यही सही दिन है।"
"मेरे पिता की चिट्ठी है," मैंने कहा। "पर अब ये सिर्फ़ उनका गुनाह नहीं है। अब ये जगन्नाथ लाल का खेल है।"
रामकथा ने पीछे से कहा — "मेरी बुआ कहेगी, जो वो लिफ़ाफ़े में है, वो असली काग़ज़ नहीं।"
"क्या मतलब?"
"असली काग़ज़ उसने ज़मीन में गाड़े थे। ये उसने इसलिए रखे, ताकि भवानी का आदमी उसे अगर मार भी डाले, तो सच साथ न जाए।"
मैं गाड़ी की खिड़की से बाहर देखने लगा। रोड के किनारे खेत थे, खाली, सोए हुए।
फ़ोन बजा। माँ का नंबर।
"मन्नू," माँ की आवाज़ भारी थी। "तू निकलने के बाद कोई आया था।"
मेरा हाथ कस गया।
"कौन?"
"नाम नहीं बताया। काला कोट वाला आदमी था। मैंने दरवाज़ा खोला तो रसीद माँगने लगा। कह रहा था — 'बंसी के ससुर के काग़ज़ मन्नू के पास हैं। उसने रास्ते में कोई काम करने से पहले काग़ज़ दे देना। और अगर वो कहे, तो कह देना कि भवानी का आदमी जगन्नाथ लाल से बड़ा है।'"
मैंने आँखें बंद कीं।
"तुमने क्या कहा?"
"मैंने कहा — 'काग़ज़ तो मेरे पति ने किसी और को दे दिए।' वो हँसा और चला गया। पर जाते वक़्त बोला — 'अपने बेटे को बोल दे, बसवा जाते-जाते सोच ले। भवानी का आदमी उसका इंतज़ार नहीं करेगा।'"
फ़ोन कट गया।
मैंने बंसी की तरफ़ देखा।
"काला कोट वाला आदमी," मैंने कहा। "जो भवानी का आदमी है, वो जगन्नाथ लाल से डरता नहीं। बल्कि जगन्नाथ लाल उसके नाम पर हमें डरा रहा है।"
बंसी ने गाड़ी तेज़ की।
"तो एक बात साफ़ हो गई," उसने कहा। "जगन्नाथ लाल बीच का ठेकेदार है। असली मालिक कहीं और बैठा है। और वो मालिक चाहता है कि हम गिरधारी देवी से पहले पहुँच जाएँ।"
"क्यों चाहेगा?"
"क्योंकि गिरधारी देवी अगर मर गई, तो सबसे बड़ा गवाह ख़त्म।" बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "और हमें काग़ज़ मिल भी गए, तो गवाह कहाँ है जो हवेली के दरवाज़े पर खड़ा होकर कहे — 'हाँ, मैंने देखा था, उन्हें ज़मीन से निकाला गया था'?"
गाड़ी की स्पीड से पेड़ पीछे छूट रहे थे। मैंने अपना फ़ोन निकाला और श्यामू को एक मैसेज भेजा — "बसवा जा रहे हैं। हरीश चंद्र को बता। सुबह वो भी वहीं आए।"
मैसेज भेजते ही फ़ोन बजा। श्यामू।
"मन्नू," उसकी आवाज़ फूटी हुई थी, "मैं तहसील पहुँचा तो हरीश चंद्र की चेयर खाली थी। उनका चपरासी बोला — 'वकील साहब रात ही में कहीं गए हैं। किसी का फ़ोन आया था, तुरंत गाड़ी लेकर निकले।' मन्नू, वकील साहब की गाड़ी का नंबर मुझे पता है — वो बसवा रोड पर देखी गई।"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा।
"बंसी, हरीश चंद्र बसवा जा रहे हैं।"
बंसी ने गाड़ी और तेज़ की। सामने एक मोड़ आया और गाड़ी के लाइट में कुछ दिखा — एक खड़ी गाड़ी, बोनट खुला, एक आदमी सिर झुकाए खड़ा था।
बंसी ने ब्रेक मारे।
वो हरीश चंद्र थे। उनका कोट फटा हुआ था और हाथ में एक पत्थर था — जैसे किसी ने उन पर फेंका हो।
"वकील साहब!" मैं दौड़कर निकला।
"मन्नू।" उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। "मुझे बसवा से फ़ोन आया था — गिरधारी देवी के आदमी ने। कहा कि वो औरत मर रही है और मुझे अभी आना है।" उन्होंने फटे कोट की तरफ़ देखा। "मैं निकला ही था कि इस मोड़ पर दो लड़के आए। पत्थर फेंका। कहा — 'वकील साहब, बसवा जाना छोड़ दो। ये केस तुम्हारी ज़िंदगी का नहीं।'"
"किसने भेजा?"
"वो नहीं बोले। पर उनके जूते महँगे थे।" हरीश चंद्र ने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, ये मामला अब किसी विरासत का नहीं रहा। जिसके लोग वकील को रास्ते में रोकने उतर आए हैं, वो इलाक़े में ऊपर बैठा है।"
"आप डर गए?"
वो हँसे — थकी हुई हँसी।
"डरा हुआ आदमी रुक जाता है।" उन्होंने गाड़ी की चाबी निकाली। "मैं तुम्हारे साथ चल रहा हूँ। तुम्हारी गाड़ी में। मेरी गाड़ी यहीं छोड़ता हूँ। अगर वो इसे तोड़ेंगे, तो समझूँगा वो खुद डर गए हैं।"
हम चले। हरीश चंद्र पीछे बैठे। बंसी ने रामकथा से पूछा — "बुआ कितनी देर और?"
"डॉक्टर ने दो दिन कहा है। पर उसकी साँस… आवाज़ दबी हुई है।"
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