The Token System – Chapter 672
बंसी ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने काग़ज़ का वो फटा नक़्शा उठाया।
"ये क्या है?"
नक़्शा बहुत पुराना था। किनारे फटे हुए, मोड़ों पर छेद। मैंने उसे खोला — आधा हवेली का था, आधा कटा हुआ। और जहाँ नक़्शा कटा था, वहाँ किसी ने पेंसिल से एक लाइन खींचकर लिखा था — "दीवार से आगे मत खोदना।"
"ये तेरे ससुर की लिखाई है?"
"नहीं।" बंसी ने गौर से देखा। "ये किसी और की है।"
तभी बाहर गली में दौड़ने की आवाज़ आई।
दरवाज़ा खुला और श्यामू अंदर घुसा — साँस फूली हुई, चेहरा लाल, माथे पर पसीना।
"मन्नू!" वह घुटनों पर हाथ रखकर झुका। "तहसील से आ रहा हूँ। जगन्नाथ लाल आया था।"
मैं खड़ा हो गया।
"उसने रीना के रिश्ते की नई तारीख़ तय कर दी है," श्यामू ने कहा। "पर एक शर्त रखी है।"
"क्या शर्त?"
श्यामू ने मेरी तरफ़ देखा, फिर ज़मीन की तरफ़।
"कह रहा है — मन्नू पहले भवानी से माफ़ी माँगे। सार्वजनिक रूप से। तहसील के आँगन में, सबके सामने कहे कि उसने भवानी पर झूठे इल्ज़ाम लगाए। तब रिश्ता पक्का।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। श्यामू ने भी।
मैं हँस पड़ा।
"माफ़ी?" मैंने कहा। "भवानी से?"
"मन्नू, ये शर्त नहीं, ये जाल है," बंसी ने कहा। "वो चाहता है कि तू सबके सामने झुके, ताकि तेरी गवाही कमज़ोर पड़े।"
"मुझे पता है।" मैंने श्यामू की तरफ़ देखा। "जगन्नाथ लाल ने ये बात किसके सामने कही?"
"हरीश चंद्र के सामने," श्यामू ने कहा। "वकील साहब ने सुनकर कहा — 'तुम्हारा फ़ैसला है, तुम बताओ मन्नू को।'"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो पुरानी जानी-पहचानी खीज लौट आई थी।
"माफ़ी तो मैं माँगूँगा," मैंने कहा। "पर उस दिन, जब भवानी का हिसाब खुलेगा। उस दिन मैं नहीं, वो माफ़ी माँगेगा।"
श्यामू ने गला साफ़ किया।
"और एक बात," वह धीरे बोला। "तहसील में भवानी का आदमी भी बैठा था। जगन्नाथ लाल से पहले वो आया था। हरीश चंद्र को कुछ काग़ज़ दिखाए। मुझे नहीं पता क्या था — पर वकील साहब का चेहरा बदल गया था।"
"कैसा काग़ज़?"
"पता नहीं। बस एक पीला लिफ़ाफ़ा था।"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने मेरी तरफ़।
"आज रात तिजोरी खुलेगी," बंसी ने कहा, "और कल सुबह हम वकील साहब से पूछेंगे कि वो पीला लिफ़ाफ़ा क्या था।"
मैंने सिर हिलाया। फिर मैंने जेब से वो मुड़ा काग़ज़ निकाला — साइकिल वाले लड़के की पर्ची। उसे बंसी की मेज़ पर रख दिया।
"इसे किसी को मत दिखाना," मैंने कहा। "और श्यामू — तू तहसील वापस जा। हरीश चंद्र से कहना कि आज रात मुझे उनकी ज़रूरत पड़ सकती है।"
श्यामू चला गया। बंसी ने वो लोहे का डिब्बा उठाया और अपने सीने से लगा लिया।
"मन्नू," उसने कहा। "मेरे ससुर की रसीद आज रात तिजोरी के सामने रखूँगा। जब वो खुलेगी, तो पहले उनका नाम निकलेगा।"
"निकलेगा।"
तभी मेरा फ़ोन बजा।
माँ का नंबर था। मैंने उठाया।
"मन्नू।" उसकी आवाज़ में वो कंपन था जो पहले भी एक-दो बार सुना था। "घर आ जा। जल्दी।"
"क्या हुआ?"
"बसवा से कोई आया है।" वह रुकी। "गिरधारी देवी का आदमी। कह रहा है — वो औरत मरने से पहले तुझसे एक बार मिलना चाहती है।"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने मेरे चेहरे से पढ़ लिया।
"क्या हुआ?"
मैंने फ़ोन रखा।
"तीसरी चाबी हमारे पास नहीं है," मैंने कहा। "वो गिरधारी देवी के पास है — और वो मरने से पहले मुझसे मिलना चाहती है।"
बंसी ने डिब्बा उठाया और सीधा खड़ा हो गया।
"तो फिर चल।"
"कहाँ?"
"बसवा। रास्ते में तू माँ से बात कर।" उसने डिब्बा काँधे पर रखा। "तिजोरी आज रात खुलेगी — पर तीन चाबियों के बिना नहीं। और अगर तीसरी चाबी वाली औरत मरने से पहले मिलना चाहती है, तो मतलब उसके पास सिर्फ़ चाबी नहीं है। उसके पास वो भी है जो चाबी के साथ आता है — और वो कुछ ऐसा है जो भवानी नहीं जानता।"
बंसी ने डिब्बा काँधे पर रखा और बाहर निकल पड़ा। मैं पीछे-पीछे। गली में उस वक़्त सन्नाटा था, बस एक कुत्ता दूर किसी दरवाज़े पर सो रहा था। बंसी की चाल इतनी तेज़ थी कि मुझे लगभग दौड़ना पड़ रहा था।
"बंसी, रुक।" मैंने उसका हाथ पकड़ा। "पहले ये बता — गिरधारी देवी कौन हैँ? तूने नाम ऐसे लिया जैसे तुझे पता है।"
बंसी रुका। उसने डिब्बा ज़मीन पर रखा और एक दीवार का सहारा लिया।
"मेरे ससुर की बहन," उसने कहा।
मुझे लगा जैसे रास्ते में कोई गड्ढा मिल गया।
"तेरे ससुर की बहन? तो फिर ये बात मुझे पहले क्यों नहीं बताई?"
"क्योंकि ये बात मुझे भी कल रात पता चली।" बंसी ने मुँह फेरा। "ससुर की मौत के बाद उनकी बहन बसवा में अपने ससुराल चली गई थी। मेरी सास ने ज़िक्र तक नहीं किया। कल मैंने चाय की दुकान पर फ़कीरू से पूछा — वो पुराना आदमी है, सब जानता है — तो उसने बताया।"
"तो गिरधारी देवी तेरे ससुर की बहन है, और उसके पास तीसरी चाबी है।"
"इतना ही नहीं।" बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "फ़कीरू ने कहा कि जिस दिन मेरे ससुर को हवेली से निकाला गया, उस दिन गिरधारी देवी मुकदमा लड़ने के लिए तहसील-तहसील भागी थी। काग़ज़ लेकर। किसी ने उसे डरा दिया। किसी ने उसके पति को धमकी दी। और वो पीछे हट गई।"
"किसने डराया?"
"फ़कीरू को इतना ही पता था।" बंसी ने डिब्बा फिर उठाया। "ये गिरधारी देवी ही बताएगी — अगर मिलने से पहले मर न जाए।"
मैंने उसका हाथ फिर पकड़ा।
"एक बात और। माँ कह रही थी कि उसका आदमी आया है। माँ का डरना ज़रूरी नहीं था। पर वो डर रही थी। क्यों?"
बंसी चलने लगा।
"क्योंकि ये कहानी में हमारे घर का नाम भी आता है," उसने कहा। "तेरे पिता का नाम। तेरी माँ को पता है जो हम नहीं जानते।"
हम पहुँचे तो माँ दरवाज़े पर ही खड़ी थीं। सिर पर चादर, हाथ में मोबाइल, और आँचल किसी ने पकड़ कर खींचा हो जैसे। बरामदे में एक आदमी बैठा था — पचास से ऊपर, सूखा-दुबला, कानों पर सफ़ेद बाल, और हाथों में एक बड़ी-सी ज़र्द लिफ़ाफ़ा।
"तू आ गया," माँ ने मेरा हाथ पकड़कर धीरे कहा। "सुन ले इसकी बात। फिर मुझे बताना क्या करना है।"
मैं बैठ गया। बंसी भी। उस आदमी ने लिफ़ाफ़ा गोद में रखा और अपना नाम बताया — रामकथा। गिरधारी देवी का भतीजा।
"वो बीमार है," रामकथा ने कहा। "डॉक्टर कहते हैं दो-तीन दिन। ज़्यादा बोल नहीं सकती। पर वो बार-बार तुम्हारा नाम ले रही है — मन्नू। कहती है उसके जाने से पहले वो एक बात कहनी है, जो तीस साल से उसके गले में अटकी है।"
"क्यों मुझसे?" मैंने पूछा।
"तुम्हारे पिता से नहीं कह सकी। तुम्हारे नाना से नहीं कह सकी। तुमसे कहेगी।" रामकथा ने कहा। "क्योंकि वो कहती है — गुनाह समय के साथ मर जाता है, अगर तुम उसे सच कहने वाले को ज़िंदा रहने दो।"
माँ ने आँचल से आँख पोंछी।
"इसके पिता इसमें कहाँ आते हैं?" मैंने पूछा।
रामकथा ने लिफ़ाफ़ा उठाया और मेरी तरफ़ सरका दिया।
"ये वो काग़ज़ हैं जो मेरी बुआ ने उस दिन तहसील में ले जाकर वकील को दिखाए थे। उस दिन भवानी के दादा ने उसे रोक लिया था। उस दिन तुम्हारे पिता उसके साथ मौजूद थे।"
कमरे में हवा ठंडी हो गई।
"क्या?" मैं उठ गया।
"बैठ।" बंसी ने मेरा कंधा पकड़ा।
"तुम्हारे पिता उस वक़्त तहसील में मुंशी थे," रामकथा ने कहा, "और उन्होंने मेरी बुआ से कहा था — 'बहन, ये काग़ज़ छुपा लो। भवानी का दादा इन्हें जलवा देगा। जब वक़्त आएगा, ख़ुद निकल आएँगे।'"
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