The Token System – Chapter 671
"ये दीवार?" मैंने कहा। "हमारे घर की?"
"हवेली की," माँ ने कहा। "पिछवाड़े वाली दीवार — जिस पर पाँच लकीरें खुदी हैं। जो रोज़ तेरी नज़र से गुज़रती है।"
मैंने अपनी जेब से चाबी निकाली। रामदीन वाली। उसे टेबल पर रखा। रीना ने उसे छुआ।
"मन्नू," बंसी ने कहा। "मेरे घर में वो संदूक है।"
"मुझे पता है।"
"नहीं, तू नहीं समझा।" बंसी उठकर खड़ा हो गया। "मैं अभी जा रहा हूँ। चाबी लेने। और तू तब तक माँ से पूछ — कौन-सी दीवार में क्या है।"
वह भागा। मैंने माँ की तरफ़ देखा।
"माँ — उस दीवार में क्या है?"
"तेरे बाप का हिसाब," माँ ने कहा। "और एक और चीज़।"
"क्या?"
"तेरे बाबा की घड़ी।"
रीना ने कुछ कहना चाहा, पर माँ ने उसे रोका।
"आज रात।" माँ ने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया। "आज रात तीनों चाबियाँ एक जगह होंगी, और तब हम उस तिजोरी को खोलेंगे।"
तभी बाहर गली में बंसी की आवाज़ आई। "मन्नू!"
मैं दौड़कर बाहर गया।
बंसी गली के मोड़ पर खड़ा था। उसके हाथ में एक छोटी, ज़ंग लगी चाबी थी। और उसके चेहरे पर एक अजीब-सी चमक।
"मिल गई," उसने कहा। "ईंट के पीछे। बिल्कुल जैसे उसने कहा था।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर था। और उस डर के नीचे, कुछ और भी था।
"बंसी?"
"मन्नू।" उसने चाबी मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "ये तो मेरे घर की पुरानी संदूक की चाबी थी।"
"हाँ।"
"तो रामदीन सच बोल रहा था।"
"हाँ।"
बंसी ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने धीरे से कहा, "मन्नू, अगर ये चाबी उस तिजोरी को खोलती है, तो इसका मतलब है कि मेरे ससुर उस हिसाब में शामिल थे। और अगर वो शामिल थे, तो मेरा पूरा घर…"
"बंसी।"
"मेरा पूरा घर उस हिसाब में शामिल है। और मैंने आठ साल उस हिसाब को अपने पिछवाड़े में पानी के स्टैंड की तरह रखा हुआ है।"
उसने चाबी मेरी हथेली पर रख दी। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
तभी गली के आख़िर से एक साइकिल की घंटी बजी।
हम दोनों पलटे।
साइकिल पर एक लड़का था — पंद्रह-सोलह साल का, फटी शर्ट। उसने हमें देखा, साइकिल रोकी और एक मुड़ा काग़ज़ हवा में उछालकर भाग गया।
काग़ज़ हवा में लहराकर मेरे पैरों के पास गिरा।
मैंने उसे उठाया। उस पर एक ही लाइन थी, मोटे हाथ से लिखी — "तिजोरी के पहले ताले की चाबी मत ढूँढना। वो मेरे पास है। और मैं उसे ख़ुद लाऊँगा।"
रीना दौड़कर बाहर आई। उसने काग़ज़ पढ़ा। फिर मेरी तरफ़ देखा।
"ये कौन है?"
"कोई जो नहीं चाहता कि हम अकेले तिजोरी खोलें।"
॥
चाबी मेरी हथेली पर रखी थी और रीना की आवाज़ गली में गूँज रही थी — "ये कौन है?" — पर जवाब मेरे पास नहीं था। साइकिल की घंटी दूर तक सुनाई दे रही थी, जैसे कोई जाते-जाते अपनी हाज़िरी दर्ज करा गया हो।
बंसी ने मेरा हाथ पकड़ा।
"चल।"
"कहाँ?"
"मेरे घर। संदूक खोलते हैं। अभी।"
"बंसी — उस लड़के ने कहा कि पहले ताले की चाबी उसके पास है। हम आधा खोलकर क्या करेंगे?"
"आधा खोलेंगे तो पता तो चलेगा कि अंदर क्या है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "और मन्नू — मुझे ये भी देखना है कि मेरे घर में, मेरे पीछे, आठ साल से क्या रखा है।"
मैंने रीना की तरफ़ देखा।
"तू अंदर जा," उसने कहा। "माँ के पास। मैं आती हूँ।" वह रुकी। "मन्नू — वो लड़का अगर वाकई चाबी लाएगा, तो कब? आज रात? कल? हमें कुछ पता तो होना चाहिए।"
"जब वो आएगा, तब पता चलेगा।"
रीना ने कुछ कहना चाहा, फिर चुप होकर अंदर चली गई।
बंसी का घर गली के आगे वाले मोड़ पर है — दो कमरे का पक्का मकान, पीली दीवार, दरवाज़े पर टूटी सीढ़ी रखी है जिसे कभी उसने ठीक करने की सोची थी और कभी नहीं की। पिछवाड़े में पानी की टंकी का स्टैंड — मोटा, लोहे का, जंग खाया।
उसी स्टैंड के नीचे से बंसी ने एक ईंट हटाई। ईंट के नीचे गड्ढा था, और गड्ढे में एक और चीज़ — छोटा, लोहे का, काले रंग का डिब्बा। चाबी उसी की थी।
बंसी ने चाबी घुमाई। ताला खट-खट दो बार फँसा, फिर खुला।
डिब्बा खोला तो मैं एक कदम पीछे हट गया।
अंदर कुछ बहुत कम था — एक मुड़ी हुई पुरानी रसीद, एक फटा हुआ काग़ज़ का नक़्शा, और ज़ंग की बदबू।
"यही?" बंसी ने कहा। "इतना सा?"
उसने रसीद उठाई। पीला काग़ज़, जगह-जगह से मुड़ा, मोहर फीकी पड़ चुकी थी। बंसी उसे रोशनी में ले गया, और उसके होंठ धीरे-धीरे खुलने लगे।
"क्या है?" मैंने पूछा।
"पढ़।" उसने रसीद मेरी तरफ़ बढ़ाई। "ये मेरे ससुर की लिखाई है।"
मैंने पढ़ा। रसीद पर लिखा था — हवेली के हिस्से का हिसाब, उन्नीस सौ अठहत्तर, रकम चार हज़ार आठ सौ, दो हिस्से, तीन गवाह। और सबसे नीचे एक लाइन थी जो शायद किसी और ने बाद में जोड़ी थी — "नाम काटा गया। हिस्सा बाक़ी।"
"नाम काटा गया?" मैंने कहा।
बंसी ने रसीद के ऊपरी हिस्से की तरफ़ उँगली रखी। जहाँ हिस्सेदार का नाम होना चाहिए था, वहाँ स्याही से मोटी लकीर खींची थी। लकीर के नीचे से सिर्फ़ दो अक्षर झाँक रहे थे, और वो भी अधूरे।
"मेरे ससुर का नाम यहाँ से मिटाया गया है," बंसी ने कहा। उसकी आवाज़ पहले से धीमी थी। "मेरे ससुर ने हिसाब चुकाया, ये रसीद उसका सबूत है — और उनका नाम काट दिया गया। जैसे किसी ने कहा हो — तू हिसाब में था ही नहीं।"
वह चुप हो गया। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा, पर उसने हटाया नहीं, बस रसीद को दोनों हाथों से थामे बैठा रहा।
"मन्नू," उसने कहा, "मेरे ससुर के पास तीन बीघा ज़मीन थी। रामगंज के पास। उस ज़मीन पर आज भवानी का गोदाम है।" उसने सामने दीवार की तरफ़ देखा। "मेरे ससुर जब बीमार पड़े, तो भवानी के दादा उनसे मिलने आए। दवा के लिए पैसे दिए। और उसके बदले — ये।" उसने रसीद हिलाई। "एक काग़ज़। जिस पर उनका नाम था, और जो आज मिटा हुआ है।"
"उन्होंने ज़मीन कैसे छोड़ी?"
"नहीं छोड़ी।" बंसी ने सिर उठाया। "उन्हें बेदख़ल कर दिया गया। तहसील से काग़ज़ आया — 'ज़मीन का हक़ ख़त्म'। उन्होंने केस किया, तो किसी ने उन्हें डरा दिया। फिर वो बीमार पड़े, फिर चल बसे।" उसने रसीद को मेज़ पर रख दिया। "और मैं? मैं उस हवेली के सामने से रोज़ गुज़रता हूँ, जिसके आधे हिस्से का हिसाब इन काग़ज़ों में लिखा है, और मैं भवानी का हाथ बाँधकर चाय पिलाता हूँ।"
"बंसी —"
"मुझे पता है तू क्या कहेगा।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तू कहेगा — अब सब खुलेगा। पर मन्नू, मेरे ससुर को उनका हिसाब नहीं मिला, उन्हें सिर्फ़ एक रसीद मिली जिस पर उनका नाम नहीं है। मैं आठ साल से उस संदूक को पानी के स्टैंड की तरह रखे हुए था — और आज पता चला कि वो हवेली की तिजोरी की चाबी है।"
"तो अब मतलब निकलता है," मैंने कहा, "कि तेरे ससुर सिर्फ़ शामिल नहीं थे। उन्हें ठगा गया था।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं तुझे कुछ बताता हूँ," मैंने कहा। "मेरे दादा को भी ऐसे ही हिसाब से जोड़ा गया था — एक रसीद, एक गवाही, और एक ऐसा नाम जो काग़ज़ पर था पर किसी के दिल में नहीं। और जब उन्होंने हिस्सा माँगा, तो वो टोकन दीवार में छिपाने तक पहुँच गए। उन्हें भी कोई नहीं बचा सका।" मैंने रसीद उठाई। "पर तेरे ससुर का हिसाब आज भी बाक़ी है — ये रसीद कहती है। और आज रात जब वो तिजोरी खुलेगी, तो पहला काम ये होगा — इस काटे हुए नाम को वापस लिखवाना।"
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