The Token System – Chapter 670
"गिरधारी देवी," मैंने कहा।
रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। फिर धीरे से मुस्कुराया, बिना दाँत दिखाए। "तुमने खोद-खोदकर सब निकाल लिया। अच्छा किया। और तीसरी चाबी?"
वह रुका। उसने बंसी की तरफ़ देखा।
"एक तेरे पास है, बंसी।"
बंसी हँसा, पर हँसी में डर था। "भाई, मैं चाय बेचता हूँ। मेरे पास किसकी चाबी होगी?"
"तेरे ससुर ने छोड़ी थी।"
बंसी का चेहरा बदला। हँसी उतर गई। "मेरे ससुर? वो तो…"
"वो हवेली में हिसाब लिखता था," रामदीन ने कहा। "तेरे पापा के साथ। तीसरे हिस्से का हिसाब। और जब तेरा ब्याह हुआ, तो उसने अपनी चीज़ें तेरे घर भेज दीं। बिना बताए।"
"मेरे घर में कोई तिजोरी नहीं है।"
"तिजोरी नहीं," रामदीन ने कहा। "संदूक। पुराना लोहे का संदूक, जो तेरे घर के पिछवाड़े में रखा है। जिसे तू बरसों से पानी की टंकी का स्टैंड समझता आया है।"
बंसी का मुँह खुला रह गया। "वो… वो स्टैंड मेरे बाप ने…"
"तेरे ससुर ने तेरे बाप को दिया था, इस शर्त पर कि कभी नहीं खोलेगा।"
बंसी अपनी जेब में हाथ डालने लगा, फिर रुक गया। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"मन्नू।"
मैंने उसे देखा। उसका चेहरा पसीने से भीगा था और मुँह ख़ाली।
"तेरे पास चाबी है?" मैंने पूछा।
"मेरे घर की उस संदूक की चाबी थी। पर वो तो मैंने सालों पहले खो दे दी थी। मुझे लगा वो कोई रद्दी चीज़ है।"
रामदीन हँसा। इस बार हँसी में कुछ गरमाहट थी। "बंसी, तेरे ससुर ने बहुत समझदारी की थी। उन्होंने कहा था कि अगर संदूक का ताला कभी बदला जाए, तो नई चाबी वहीं रखनी है जहाँ रात में भी हाथ पहुँचे।"
बंसी ने अपना सिर उठाया। "मेरे घर के पिछवाड़े वाली दीवार में… एक ईंट ढीली है। पच्चीस साल से है। मैंने कभी नहीं देखा उसके पीछे।"
"तो देख।"
बंसी उठ खड़ा हुआ। फिर रुका। उसने रामदीन की तरफ़ देखा। "अगर मैं चाबी ले आया, तो तिजोरी खोलूँगा किस हक़ से? मेरा उसमें क्या है?"
"तू तीसरा हाथ है, बंसी। तेरे ससुर ने चाबी इसलिए नहीं छोड़ी थी कि तू उसे संदूक में रखे रखे बूढ़ा हो जाए। उसने छोड़ी थी इसलिए कि जिस दिन हिसाब खुले, उस दिन हवेली में तीन आदमी खड़े हों — एक तेरे पापा का बेटा, एक उस औरत का वारिस, और एक वो जिसके हाथ में तीसरा ताला है।"
मैंने चाबी उठाई। ज़ंग मेरी उँगलियों पर लग गई। "और तीसरी चाबी?"
"वही तो तेरी माँ के पास है।"
मैंने रामदीन की तरफ़ देखा। "माँ के पास चाबी है?"
"तेरे बाबा ने उसे दी थी। उस दिन, जिस दिन उसे बसवा भेजा। उसने तेरी माँ को नहीं दी — उसने सरोज के हाथ में रखकर कहा था, 'तू इस घर की बहू है, तेरे पास रहेगी।' और जब भवानी ने उसे ढूँढ़ा, तो उसने उस चाबी को कहीं और छिपा दिया।"
"कहाँ?"
"यह तेरी माँ बताएगी।"
मैंने चाबी अपनी जेब से लगी जेब में रखी। बंसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"रामदीन," मैंने कहा। "एक बात और। उस रात आँगन में माँ ने किसे देखा था?"
रामदीन ने कुल्हड़ उठाया, पिया, फिर नीचे रखा। उसके हाथ की नसें फूली हुई थीं।
"मुझे," उसने कहा। "मैं उस रात आँगन में था। मैं उससे मिलने आया था। तेरी माँ से।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। मैं खड़ा रहा।
"तू माँ से मिलने आया था? उस रात?"
"उस रात ख़ून बहने के बाद। मैं छिपकर आया था। मुझे लगा कि वो जानती होगी कि क्या हुआ। वो आँगन में खड़ी थी, हाथ में टॉर्च। उसने मुझे देखा, और उसने…" वह रुका।
"क्या कहा?"
"उसने कहा — 'अगर तू सच बोलने आया है, तो अभी बोल। और अगर चुप रहने आया है, तो उसी रास्ते से लौट जहाँ से आया।'"
"और तू?"
"मैं लौट गया। आठ साल बाद आज लौटा हूँ।"
मैंने नीम के पत्तों की तरफ़ देखा। धूप तेज़ हो रही थी।
"और ख़ून किसने बहाया था? मेरे पापा का?"
"मैं उस रात गाड़ी के पास नहीं था। पर तेरे पापा ने मुझे एक हफ़्ता पहले बता दिया था कि अगर कुछ हो जाए, तो तिजोरी खोलने वाला पहला आदमी मैं होऊँ। उन्हें पता था।"
"पता था और फिर भी गया?"
"तेरे बाबा का सच उस गाड़ी के साथ जुड़ा था।"
बंसी ने अचानक कहा, "रामदीन। तू अभी भी एक बात नहीं बता रहा। भवानी का भाई कौन है? जिसे तूने ख़ुद होने का झूठ बोला?"
रामदीन उठ खड़ा हुआ। लाठी उसके हाथ में आई।
"जिसे मैंने चार साल पहले चबूतरे पर बैठा देखा था," उसने कहा। "वही आदमी वो है। और वही आज सुबह पीपल के नीचे तुझे मिला था।"
"तो वो कौन है?"
"तेरे बाबा के साथ वो उस रात पहाड़ी पर था। जो अब भी गिनती करता है — पचास साल से एक ही गिनती। और आज सुबह तुझे देखकर वो डर गया, इसीलिए भाग गया। नहीं तो वो भागता क्यों?"
"तो वो बाबा का दुश्मन है?"
"नहीं, बेटा।" रामदीन ने उसकी आँखों में देखा। "वो तेरे बाबा का सबसे करीबी आदमी है। और उसी ने उन्हें बता दिया था कि ख़तरा कहाँ से आएगा।"
मैं चुप खड़ा रहा। टोकन मेरी जेब में पूरा ठंडा था।
रामदीन ने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया। "चाबी देख ली?"
"हाँ।"
"अब सुन।" उसने आवाज़ धीमी की। "ये चाबी ताले के अंदर जाती है, पर घूमती नहीं। घूमेगी तभी, जब तीनों चाबियाँ अंदर हों। और उस दिन तिजोरी खुद खुलेगी — बंद नहीं करेगी।"
"तो तीनों को इकट्ठा करना होगा।"
"तीनों को इकट्ठा करना होगा," उसने दोहराया। "और इसके पहले ये जान लेना है कि उस तिजोरी में किसका हिसाब है।"
बंसी अचानक बोला, "और तू कहाँ मिलेगा?"
रामदीन ने अपनी कमीज़ की जेब में हाथ डाला। दूसरा मुड़ा काग़ज़ निकालकर उसने मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"इस पर पता है। शाम को छह बजे। तेरी माँ को साथ लाना — अगर वो आए।"
मैंने काग़ज़ उठाया। मैंने उसकी तरफ़ देखा। "अगर माँ नहीं आई तो?"
"तो तिजोरी नहीं खुलेगी।"
रामदीन ने लाठी उठाई और नीम के पेड़ के पीछे से निकल गया। इस बार न हड़बड़ी, न छिपना। धीरे-धीरे, खुली गली में। मुझे लगा कोई उसे देख लेगा। पर कोई नहीं दिखा।
बंसी ने मेरा हाथ पकड़ा। "चल। घर चल।"
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे उस संदूक की चाबी देखनी है। और अगर वो वहाँ है, तो मैं तुझे अकेले नहीं जाने दूँगा।"
हम बाज़ार के रास्ते भागे। मेरे घर के गली के मोड़ पर रीना मिली। उसके हाथ में कुछ था — एक सफ़ेद लिफ़ाफ़ा।
"अंदर आ।" रीना ने मुझे हाथ से खींचकर कहा। "बंसी, तू भी।"
अंदर माँ चूल्हे के पास बैठी थी। मेरी नज़र रीना के हाथ वाले लिफ़ाफ़े पर गई। "ये क्या है?"
"सुबह दरवाज़े के नीचे से आया है," रीना ने कहा। "माँ के नाम पर।"
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक काग़ज़ था। माँ की मोटी, झुकी लिखाई में? नहीं, ये माँ की लिखाई नहीं थी। किसी दूसरे की थी। एक लाइन थी — "तीसरी चाबी उस दीवार में है, जिसे तूने सबसे आख़िर में देखा।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। वह उठ गई थी। चूल्हा बुझा हुआ था।
"माँ।"
वह मेरे पास आई। काग़ज़ उसने मेरे हाथ से लिया और एक बार पढ़ा। फिर उसने काग़ज़ मोड़कर अपनी साड़ी के पल्लू में रख लिया।
"बैठ," उसने कहा। "तीनों बैठो।"
हम बैठ गए। माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"वो काग़ज़ झूठ नहीं है," उसने कहा। "तीसरी चाबी उस दीवार में है। उस दीवार में, जो तेरे बाप ने आख़िरी बार छुई थी।"
"कौन-सी दीवार?"
माँ ने चूल्हे के पास वाली ईंट की तरफ़ इशारा किया।
मैं उसकी तरफ़ देखने लगा। फिर मैंने बंसी की तरफ़ देखा — और बंसी मेरी तरफ़।
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