The Token System – Chapter 669
"और तेरी माँ ने मुझे पचास साल पहले उस रात आँगन में देखा था। मुझे पता है वो जानती है कि उस रात ख़ून किसने बहाया था।"
टोकन मेरी हथेली पर ठंडा रह गया। सपाट। कोई शब्द नहीं।
चौथा जवाब।
मैंने टोकन मुट्ठी में भींचा। मेरी आवाज़ शांत थी, और यही सबसे डरावनी बात थी।
"तू टोकन नहीं लेगा। मेरे पास कुछ और है जो तुझे देना है।"
उसने लाठी नीचे की। "क्या?"
"एक सवाल।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "उस रात ख़ून किसने बहाया था — और मेरी माँ ने किसे आँगन में देखा था?"
वह पीछे हटा। सफ़ेद दाढ़ी के नीचे उसकी गर्दन की नसें खिंच गईं। उसने मुँ
॥
पीपल के पत्तों के बीच से धूप छनकर आ रही थी, और वह आदमी मेरी आँखों के सामने से हट गया था। बस उसकी लाठी की खट-खट दो क़दम तक सुनाई दी, फिर बंद हो गई।
मैं वहीं खड़ा रहा। टोकन मुट्ठी में ठंडा था। मेरी साँस अंदर रुकी हुई थी, जैसे किसी ने छाती पर पत्थर रख दिया हो।
तभी झाड़ियों में खड़खड़ाहट हुई।
"ये सब क्या था?" बंसी निकला, पैरों में घास के तिनके चिपके हुए। "मैं तने के पीछे से सुन रहा था। तूने टोकन निकाला उसके सामने? तू पागल हो गया है क्या?"
"वो टोकन लेने आया था।"
"तो दे दिया होता? तेरी अक्ल गई है?"
"देख लिया।" मैंने मुट्ठी खोली। टोकन चुपचाप पड़ा था, धूल जमी उसकी सतह पर। "उसने झूठ बोला — भवानी का भाई होने का। झूठ बोला — बाबा को दफ़नाने का। और तीसरी बात — टोकन का सौदा करने की। तीनों में टोकन ठंडा रहा।"
"तीन झूठ में ठंडा?" बंसी ने माथा खुजाया। "फिर कब गरम हुआ?"
"जब उसने माँ का नाम लिया।"
बंसी ने कुछ नहीं कहा। उसने पीपल के पत्तों की तरफ़ देखा, जैसे वहीं जवाब लिखा हो।
"मैं उसके पीछे जाता हूँ," मैंने कहा और क़दम बढ़ा दिए।
"रुक।" बंसी ने बाज़ू पकड़ा। "वो बूढ़ा नहीं है जितना दिखता है। उसकी लाठी के सिरे पर वही निशान था — दो लकीरें, एक बिंदु। ये निशान किसी को भी नहीं मिलता। ये उसके पास कहाँ से आया?"
मैं उसकी तरफ़ मुड़ा। "यही तो पूछने जा रहा हूँ।"
पीपल के पीछे का रास्ता सीधा मंदिर की दीवार तक जाता था और वहीं से बाज़ार की तरफ़ मुड़ जाता था। मैंने मोड़ पर पहुँचकर दाएँ-बाएँ देखा। गली ख़ाली थी, सिवाय दूर एक साइकिल वाले के। मैं उसी तरफ़ भागा।
साइकिल वाला रुका। सत्तर के ऊपर का आदमी, सिर पर सफ़ेद टोपी, पीछे बँधी दूध की केनें।
"कोई सफ़ेद दाढ़ी वाला, लाठी लेकर गया — इस तरफ़ से?" मैंने हाँफते हुए पूछा।
"गया क्यों नहीं," उसने दूध की केन का ढक्कन टेढ़ा करते हुए कहा। "पर वो तो तीन गली छोड़कर बैठा था।"
"कहाँ?"
"पुराने कबाड़े के पीछे। वहाँ पीपल की जगह नीम है। नीम के नीचे एक चबूतरा है। रोज़ सुबह बैठता है। मुझे तो लगता है वो पागल है — अपने आप से बोलता रहता है।"
"वो पागल नहीं है," मैंने कहा और साइकिल वाले को वहीं छोड़कर पीछे मुड़ा।
बंसी मेरे पीछे-पीछे आ रहा था, साँस फूल रही थी। "तीन गली?"
"तीन गली।"
"तो पहले से बता देता। मैं तने के पीछे खड़े-खड़े और सुनता रहता।"
"तूने पूछा नहीं था।"
हम पुराने कबाड़े के पास पहुँचे। दो मंज़िला टूटी इमारत, जिसके आगे लोहे की ज़ंग लगी चादरें पड़ी थीं। पीछे की तरफ़ जाने का रास्ता कूड़े के ढेर से बंद था, पर बाईं तरफ़ एक चौड़ा फ़ाटक था, जिसकी साँकल खुली थी।
नीम का पेड़ वाकई वहाँ था। और उसके नीचे सीमेंट का चबूतरा।
वह बैठा था। लाठी उसके घुटनों के पार रखी थी, दोनों हाथ उसके सिरे पर।
मैं चबूतरे के सामने पहुँचकर रुका। उसने नज़र उठाई। चश्मे का चटका हुआ शीशा उसकी आँख की एक तरफ़ सफ़ेद दिखा रहा था।
"मैं जानता था तू आएगा," उसने कहा। "बस यह नहीं जानता था कि इतनी जल्दी आएगा।"
"तूने माँ का नाम क्यों लिया?"
उसने लाठी चबूतरे पर टिकाई। पास ही एक मिट्टी का कुल्हड़ रखा था, आधा भरा। उसने उसमें से घूँट भरा।
"क्योंकि तू उसे झटके में भूल जाएगा नहीं। और मुझे चाहिए था कि तू भूल जाए।"
"ये क्या बकवास है?" बंसी आगे आया। "तू कौन है भाई? सीधा बोल।"
उसने बंसी की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। "मैं रामदीन हूँ।"
मेरी जेब में टोकन एक झटके से गरम हुआ — पूरा गरम, जैसे किसी ने अंगारा रख दिया हो। मैंने हाथ जेब में डाला और उसे दबाकर मुट्ठी में लिया।
"मरा हुआ आदमी चबूतरे पर नहीं बैठता," मैंने कहा।
"मरने की ख़बर फैलाना सबसे सस्ता बहाना है," उसने कहा। "काग़ज़ पर एक लाइन लिखवा दो, दो गवाह ठोक दो, और शहर मान लेता है कि आदमी ख़त्म। तेरे पापा ने यही किया था।"
"मेरे पापा?"
"आठ साल पहले। भवानी के होम की असली बही मेरे और तेरे पापा ने मिलकर छिपाई थी। उसी रात से मैं मरा हुआ हूँ।"
मैंने टोकन मुट्ठी में दबाया। ठंडा हुआ। सच।
"क्यों छिपाई?"
"क्योंकि उसमें भवानी का हिसाब था। हर वो नाम जिसे उसने मिटाया। और उसमें तेरे पापा का नाम भी था।"
मैं कुछ देर खड़ा रहा। नीम की छाँव मेरे चेहरे पर सरक रही थी।
"बैठ," उसने चबूतरे पर जगह दिखाई।
मैं वहीं बैठ गया। बंसी ने भी जगह ली, पर तीन हाथ दूर।
"तेरे पापा को मारने वाला किशोरी लाल था," रामदीन ने कहा। "पर गाड़ी में वो अकेला नहीं था। आदेश ऊपर से आया था।"
"किससे?"
"उससे जो आज भी बोलता है — पर काग़ज़ पर कहीं नहीं है। उसका नाम लिया जाए तो गला घुट जाता है।"
"और तू?" मैंने पूछा। "तू उस रात कहाँ था?"
"मैं गाड़ी में नहीं था।" रामदीन ने दोनों हाथ लाठी पर जोड़े। "मैं पहाड़ी के नीचे खड़ा था। पीछे वाली झाड़ियों में। और मुझसे पहले श्यामू वहाँ था। वो देख रहा था, और वो देखकर मारा गया। बस इसलिए कि वो कुछ बोल सकता था।"
"तो तू चुप क्यों रहा?" बंसी का स्वर तेज़ हुआ। "आठ साल?"
रामदीन ने अपनी कमीज़ की जेब से एक काग़ज़ निकाला। छोटा, मुड़ा हुआ, किनारों से फटा।
"क्योंकि मेरे घर में दो बच्चे हैं," उसने कहा। "एक बेटी, जिसकी शादी वही तय कर रहा था, और एक बेटा, जिसका नाम उसने काग़ज़ पर बेचने के लिए लिख लिया था। अगर मैं बोलता, तो उन्हें क्या देता — इन्हीं हड्डियों का सच?"
मैंने उसके हाथ से काग़ज़ लिया। पीला, मुड़ा, ऊपर की तरफ़ एक नाम — किशोरी लाल। और नीचे दो लकीरें, एक बिंदु।
"ये चिह्न तेरे पास कहाँ से आया?"
"तेरे बाबा से।"
मेरी साँस फिर रुकी।
"तेरे बाबा जानते थे कि मुझे छिपना पड़ेगा। उन्होंने मुझे इस चिह्न के साथ एक लाठी दी थी और कहा था — जिस दिन तेरे बड़े बेटे से मुलाक़ात हो, ये चिह्न दिखा देना। मुझे यह भी कहा था कि जिस दिन ये चिह्न दिखाऊँ, उस दिन मुझे कुछ देना होगा।"
उसने कमर से एक कपड़े में लिपटी चीज़ निकाली। कपड़ा खोला। एक चाबी। बड़ी, मोटी, लाल-भूरे रंग की ज़ंग चढ़ी हुई, पीतल का रंग अब भी ज़रा-सा चमक रहा था धूल में। उसके सिरे पर तीन दाँते थे।
"ये चाबी हवेली की उस तिजोरी की है जो दीवार के पीछे है। तुमने टोकन वाली बात सुनी होगी — नहीं सुनी? तो सुन। हवेली की उस पुरानी तिजोरी में तीन ताले हैं। तीन ताले, तीन चाबियाँ, तीन आदमी।"
बंसी ने आगे झुककर चाबी देखी। "तीन आदमी?"
"एक चाबी मेरे पास थी," रामदीन ने कहा। "ये। दूसरी उस औरत के पास है जिसे तेरे बाबा ने बसवा भेजा था।"
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