The Token System – Chapter 668
रीना ने काग़ज़ नीचे कर दिया। दोनों की साँसें कमरे में तेज़ सुनाई दे रही थीं।
"बाबा ज़िंदा हैं?" रीना ने फुसफुसाया।
"नहीं," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ कड़वी थी। "बाबा बदले गए हैं। मरने से बुरा।"
"मन्नू — यह आदमी कल जो तुझसे मिलेगा, वो बाबा का दुश्मन है। तुझे जाना ही है?"
"बाबा ने कहा है — मिलना, पर भरोसा मत करना।" मैंने काग़ज़ मोड़कर अपनी जेब में रखा, टोकन के ऊपर। "जाना है। और झूठ पकड़ने के लिए मुझे उससे सवाल पूछने होंगे। घूम-फिरकर। जैसे वो मुझसे पूछ सकता है कि मेरे पास क्या है।"
रीना ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "तू अकेला नहीं जा रहा।"
"रीना —"
"मैं मंदिर नहीं जाऊँगी। पर मैं गली के मोड़ पर खड़ी रहूँगी। पीछे। दूर। अगर नौ बजकर पंद्रह तक तू बाहर नहीं आया, तो मैं अंदर आऊँगी — और फिर जो होगा, देखा जाएगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वही ज़िद थी जो चारपाई पर बैठे बच्चे की थी, और वही डर जो माँ की आवाज़ में था। मैंने सिर हिलाया।
"ठीक है। गली के मोड़ पर। पर दूर। और —" मैंने अपनी जेब से काग़ज़ निकालकर उसके हाथ में दिया। "यह तेरे पास रहे। मेरे पास नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर वो मुझसे छीनना चाहेगा, तो यह मेरे पास से नहीं जाएगा। वो सोचेगा मैं सब कुछ अपने पास रखता हूँ। पर सच तेरे पास होगा।"
रीना ने काग़ज़ जेब में रखा। फिर उसने मेरी कलाई पकड़ी।
"मन्नू, एक बात। तूने माँ से पूछा कि क्या पता है उन्हें। उन्होंने कुछ नहीं बताया — पर उन्होंने पूछा भी नहीं कि काग़ज़ पर क्या लिखा है। तुझे यह अजीब नहीं लगा?"
मैं ठिठक गया। रीना ठीक कह रही थी। माँ ने चेहरा सफ़ेद किया, काग़ज़ पढ़ा, कहा "वो मरा हुआ है" — पर तीसरे आदमी के नाम के अलावा कुछ नहीं बताया। इतना डर कर भी कुछ छिपाया?
"सुबह देखेंगे," मैंने कहा। "अभी के लिए इसे उन्हीं पर छोड़।"
दरवाज़ा खुला। माँ आँगन में खड़ी थीं, टॉर्च उनके हाथ में बुझी हुई थी। उन्होंने मुझे देखा, फिर रीना को। कुछ नहीं बोलीं। बस आँगन के कोने में जाकर सिर्फ़ रास्ते देखने लगीं, जैसे कोई आने वाला हो।
मैं अपने कमरे में आया। चारपाई पर लेटा, पर आँखें नहीं लगीं। छत पर धूल के कण थे, हवा में तैरते। मैंने टोकन निकाला और उसे कमरे की खिड़की के पास चाँदनी में रख दिया। वह चमका — हल्की सुनहरी रोशनी। और फिर, बिल्कुल साफ़, जैसे किसी ने मेरे कान के अंदर बैठकर बोला हो — एक शब्द।
"मिल।"
फिर शब्द खो गया, टोकन ठंडा हो गया, और रोशनी वापस आई। मैं उठकर बैठ गया। पहली बार टोकन ने मुझे कुछ मना नहीं किया, कुछ पूछा नहीं। उसने आदेश दिया। मुझे मिलने का। जैसे उस आदमी के साथ उसका भी कोई हिसाब बाकी हो।
मैंने टोकन जेब में रखा और चारपाई पर आड़ा लेट गया। आँखें बंद की, पर नींद आधी रात को आई। और जब आई, तो उसमें सपना था — बाबा के कमरे का, जिसमें बाबा बैठे थे, और बोल रहे थे, "तीन सवाल, मन्नू। तीन सवाल।" मैंने सपने में ही पूछा, "चौथा जवाब क्या होगा?" बाबा मुस्कुराए और कहा, "चौथा जवाब तेरे सामने होगा, और तू उसे पहचान नहीं पाएगा।"
सुबह मुझे रीना ने उठाया — हाथ में चाय, आँखों में थकान।
"चल," उसने कहा, "आठ बज गए।"
मैं उठा। नहाया। कपड़े पहने। जेब में टोकन, और टोकन के नीचे एक छोटी सी चिट जो मैंने रात में ही अपने हाथ से लिखी थी — तीन सवाल। कौन? क्यों? और बाबा कहाँ हैं?
आँगन में आया तो माँ चूल्हे पर रोटी बना रही थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। रोटी पर घी लगाया, प्लेट मेरे आगे रखी।
"खा ले। भरे पेट आदमी को झूठ जल्दी पकड़ में आता है।"
मैं हँसा। रोटी खाई। एक घूँट पानी पिया। फिर उठकर खड़ा हुआ।
"माँ, कल तू मंदिर चलने की बात कर रही थी। आज मैं जा रहा हूँ — अकेले।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "पर जाने से पहले — तुझे पता है कि मुझे वहाँ क्या मिलेगा? सच बोल।"
माँ ने रोटी बनाना रोक दिया। आँच उनके चेहरे पर लाल थी। उन्होंने प्लेट धोई, हाथ पोंछे, और मेरे पास आकर खड़ी हो गईं।
"तुझे वहाँ एक आदमी मिलेगा जो तेरे बाबा का दोस्त था और जिसने मुझे एक बार बचाया था — उस रात, जब तेरे बाबा बदले गए थे।" उनकी आवाज़ सपाट थी। "पर मन्नू, यह भी सच है कि जिसे मैंने आख़िरी बार देखा था, उसके हाथ ख़ून से रंगे थे। और वो ख़ून तेरे बाबा का नहीं था।"
मेरा हाथ जेब में गया। टोकन ठंडा था। पर मेरी रीढ़ ठंडी नहीं थी।
"तो तीसरा आदमी बाबा को बदलने में शामिल था?"
"यही तो पचास साल का सवाल है," माँ ने कहा। "और आज तू जवाब लेने जा रहा है।"
मैं दरवाज़े तक पहुँचा। रीना भी साथ आई। दोनों गली में निकले। सुबह की धूप अभी पीली थी, बाज़ार के शटर खुल रहे थे। रीना मोड़ तक मेरे साथ चली और वहीं रुक गई।
"नौ बजकर पंद्रह," उसने दोहराया।
"हाँ।" मैंने उसका हाथ दबाया और मंदिर की तरफ़ बढ़ गया।
मंदिर के पीछे का रास्ता पथरीला था, दोनों तरफ़ ऊँची घास। पीपल का पेड़ दूर से दिख रहा था, शाखाएँ ज़मीन तक लटकी हुई, जैसे कोई परदा लटकाकर बैठा हो। मैंने पेड़ के नीचे झाँका। कोई नहीं था।
फिर पीपल के तने के पीछे से आवाज़ आई।
"तू समय का पक्का है। यह अच्छी बात है। ख़राब आदमी कभी समय पर नहीं आता।"
वह बाहर आया। ऊँचा नहीं, पतला, सफ़ेद दाढ़ी, सिर पर पुरानी टोपी। आँखों पर चश्मा, एक शीशा चटका हुआ। उसके हाथ में लाठी थी, और उस लाठी के सिरे पर — दो लकीरें, एक बिंदु। वही चिह्न।
"तू तीसरा आदमी है?" मैंने पूछा।
"मैं वो हूँ जो तेरे बाबा के साथ था," उसने कहा। "बैठ। लंबी कहानी है, और मुझे तेरे सवालों के जवाब देने हैं।"
मैं नहीं बैठा। पेड़ के तने से टेक लगाकर खड़ा रहा, हाथ जेब में, टोकन पर। "पहला सवाल — तू कौन है?"
उसने लाठी ज़मीन पर टिकाई। "मैं भवानी का भाई हूँ।"
मेरे भीतर कुछ हिला। भवानी का भाई? भवानी तो वही था जिसने जगन्नाथ लाल के साथ मिलकर माँ को डराया था।
"तू झूठ बोल रहा है," मैंने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि भवानी का कोई भाई नहीं था।"
वह हँसा। धीमी हँसी, जैसे पुरानी मशीन चले। "देखा? तूने पूछा, मैंने जवाब दिया, तूने झूठ पकड़ लिया। यही तो तेरे बाबा का तरीका था।" उसने चश्मा उतारा। "अब दूसरा सवाल।"
"दूसरा सवाल — बाबा कहाँ हैं?"
उसकी आँखें एक पल के लिए झुकीं। फिर उसने कहा, "तेरे बाबा मरे हुए हैं। उन्हें मैंने ख़ुद दफ़नाया था।"
टोकन मेरी जेब में गरम हुआ। हल्का, सिर्फ़ एक पल। झूठ।
मैंने गला साफ़ किया। "तीसरा सवाल — तू मुझसे क्या चाहता है?"
वह सीधा खड़ा हो गया। उसने लाठी उठाई और उसका सिरा मेरी तरफ़ कर दिया — चिह्न मेरी आँखों के सामने।
"मैं चाहता हूँ कि तू अपने पास जो टोकन रखा है, वो मुझे दे दे। बदले में मैं तुझे तेरे बाबा का सच दे दूँगा। पूरा सच। जिस सच को मैंने पचास साल अपने सीने में रखा है।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। फिर बिना कुछ बोले, जेब से टोकन निकालकर अपनी हथेली पर रख दिया।
वह टोकन की तरफ़ बढ़ा।
और उसी वक़्त, बिना मैंने कुछ पूछे, उसके मुँह से एक वाक्य निकला — धीमा, जैसे सोच-समझकर नहीं, बस बहकर।
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