The Token System – Chapter 667
मैंने टायर के निशानों को देर तक नहीं देखा। माँ की तरफ़ लौटा तो वे रसोई की दीवार से सटी खड़ी थीं, आँच बुझ चुकी थी, चूल्हे में सिर्फ़ लाल राख बची थी। मैंने उनके आगे पानी का लोटा रखा। उन्होंने नहीं उठाया।
"माँ, तू बैठ।"
"बैठूँगी नहीं।" उनकी आवाज़ लौट रही थी, थोड़ी-थोड़ी। "बैठ गई तो फिर उठूँगी नहीं। पचास साल से मैं बैठी हूँ, मन्नू। अब खड़ी रहूँगी।"
"तो खड़ी रह। पर बोल।" मैंने काग़ज़ जेब से निकालकर उनके सामने खोला। "तीसरा आदमी मरा हुआ है — मतलब? भूत है? या तू कह रही है कि वो नाम का आदमी मर चुका?"
माँ ने आँखें बंद कीं। एक लंबी साँस। फिर खोलीं।
"भूत नहीं, मन्नू। आदमी। जिसे दुनिया मरा समझती है, वो असल में ज़िंदा रहकर भी मरा ही होता है।" उन्होंने काग़ज़ पर उँगली रखी। "यह चिह्न मैंने पहली बार तेरे बाबा के हाथ में देखा था। उनकी अँगूठी पर खुदा था — दो लकीरें, एक बिंदु। उन्होंने मुझसे कहा था, 'यह निशान उस आदमी का है जो सब जानता है और किसी को नहीं बताता।'"
"बाबा?" मेरा मुँह खुला रह गया। "बाबा तो बीस साल पहले चल बसे।"
"और उनके जाने के तीन दिन बाद तीसरा आदमी भी मर गया, ऐसा सबने कहा। गाँव में उसकी उठाईगिरी की रस्म भी हुई थी। मैं ख़ुद गई थी, मन्नू। मैंने उसकी अर्थी को आग दी थी।"
रसोई ठंडी हो गई थी। मैंने अपने घुटनों पर हाथ रखा और उनके सामने बैठ गया।
"तो कल सुबह मंदिर के पीछे जो आदमी मिलेगा, वो कौन होगा?"
"यही तो डर है," माँ ने धीरे से कहा। "या तो कोई उसका नाम इस्तेमाल कर रहा है — या…" वो रुकीं।
"या?"
"या वो मरा नहीं। और अगर वो मरा नहीं, तो बाबा की मौत भी उतनी ही झूठी है जितनी जगन्नाथ लाल की।"
मैं उठ खड़ा हुआ। सीने में एक ठंडी गोली सी चल दी।
"माँ, साफ़ बोल। बाबा की मौत में क्या था?"
"बीमारी कहा गया। दिल का दौरा। डॉक्टर आया, काग़ज़ दिखाया, सबने सिर हिलाया। पर बाबा के जाने से पहले उसी हफ़्ते, अपने कमरे में आग लग गई थी। छोटी आग — तेल का लैंप उलट गया। कोई रोया नहीं, कोई सवाल नहीं किया। मुझे बस एक चीज़ याद है — बाबा ने उस रात मुझे चामल के डिब्बे से एक लिफ़ाफ़ा निकालकर दिया था। बोले, 'अगर मुझे कुछ हो जाए तो यह मन्नू के हाथ में जाना चाहिए, जब वो बड़ा हो।' मैंने रख लिया। फिर तेरे ताऊ ने वो डिब्बा घर से हटवा दिया, कहा कि मरे हुए के काग़ज़ घर में नहीं रखते।"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए।
"लिफ़ाफ़ा कहाँ है?"
"पता नहीं। शायद नष्ट हो गया।"
मैंने लोटे का पानी एक साँस में पी लिया। खिड़की के बाहर अब भी चाँद था, पर मुझे चाँद की जगह सिर्फ़ वह मुड़ा हुआ टायर-निशान दिख रहा था।
"कल तू मंदिर नहीं जाएगी," मैंने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि अगर वो आदमी ख़तरनाक है, तो मैं नहीं ले जा सकता तुझे। और अगर वो सच में तीसरा आदमी है — तो मुझे अकेले ही पता लगाना होगा कि वो क्या चाहता है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। फिर वो पास आईं और मेरी जेब पर हाथ रखा — ठीक उस जगह, जहाँ टोकन था।
"यह चीज़ तेरे बाबा के पास भी थी," उन्होंने कहा। "बहुत छोटी थी, मैंने एक बार देखी थी, चावल के डिब्बे में, काग़ज़ के लिफ़ाफ़े के नीचे।" उनका हाथ हट गया। "मन्नू, अगर कल वो आदमी सच में तीसरा है — तो वो तुझसे कुछ माँगेगा। और अगर झूठा है — तो वो तुझसे कुछ छीनेगा। दोनों हालत में तू अकेला है।"
"अकेला नहीं हूँ," मैंने कहा और जेब से टोकन निकालकर मुट्ठी में भींच लिया। "यह मेरे साथ है।"
माँ ने टोकन देखा। पीतल पर पड़ी रोशनी। उनकी आँखें भर आईं, पर आँसू नहीं गिरे।
"यह तो तेरे बाबा का ही है," बस इतना बोलीं, और फिर रसोई से बाहर चली गईं।
मैं कमरे में अकेला बैठा रहा। पीतल हथेली पर रखा था। ठंडा। सपाट। मैंने धीरे से बोला —
"कल सुबह। तुम साथ हो या नहीं?"
टोकन चुप रहा। पर मुझे लगा कि जैसे कमरे की हवा एक पल के लिए रुकी हो। फिर चली गई।
मैंने काग़ज़ जेब से निकाला और उसे घड़ी की तरह देखता रहा। दो लकीरें। एक बिंदु। वही चिह्न। मैंने उँगली से उसे छुआ तो स्याही अब भी गीली थी — जबकि काग़ज़ सूखा था और कलम की गंध नहीं थी, सिर्फ़ गीले धुएँ की गंध थी।
तभी दरवाज़े पर धीरे से खटका हुआ।
मैं चौंका। रात के इस वक़्त कोई? माँ अपने कमरे में थीं। रीना सो रही थी — या सोने का नाटक कर रही थी।
दरवाज़ा खोला तो बाहर रीना खड़ी थी, सिर पर दुपट्टा, हाथ में टॉर्च।
"तूने मुझे बाहर जाने से मना किया था?" मैंने कहा। "और तू कहाँ जा रही है?"
"तेरे साथ नहीं। मैं सीधा बाबा के कमरे में।" रीना ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे भीतर खींचा। "माँ चली गई, तू यहाँ बैठा है — पता है मैंने अभी क्या सुना? माँ की आवाज़ कमरे से नहीं, आँगन से आ रही थी। वे किसी से फुसफुसा रही थीं।"
"किससे?"
"नहीं दिखा। पर जब मैंने झाँका, तो आँगन में कोई नहीं था। सिर्फ़ माँ के हाथ में टॉर्च थी — और वे उसे ऊपर आसमान की तरफ़ उठाए खड़ी थीं। जैसे किसी को इशारा कर रही हों।"
मेरा हाथ टोकन पर गया। लेकिन अभी वो खाली था, सिर्फ़ पीतल, ठंडा।
"चल," मैंने कहा और बाबा के कमरे की तरफ़ बढ़ गया।
वो कमरा बीस साल से बंद था — असल में बंद किया गया था। दरवाज़े पर ताला नहीं था, बस भारी कुंडी। मैंने कुंडी उठाई। अंदर से हवा बाहर आई — बंद कमरे की बासी हवा नहीं, खुली ज़मीन की गंध। मिट्टी और सूखी लकड़ी। किसी ने इसमें आना-जाना बंद नहीं किया था, बल्कि दरवाज़ा नज़र से ओझल कर दिया था।
टॉर्च जलाई। कमरे में चारपाई थी, धूल में लिपटी। लकड़ी का संदूक। दीवार पर टंगा पुराना कैलेंडर, पन्ने पलटे नहीं थे — वही तारीख़ दिखा रहा था जिस दिन बाबा गए थे। कोई तारीख़ मैंने पढ़ने की कोशिश नहीं की, क्योंकि मेरी नज़र उस संदूक पर अटक गई थी।
रीना ने संदूक खोला। अंदर कपड़े थे, कुछ किताबें, और सबसे नीचे — चावल के डिब्बे का ढक्कन।
"ढक्कन?" रीना ने पलटा। "डिब्बा तो नहीं है।"
मैंने वह ढक्कन हाथ में लिया। हल्का था, दोहरी तह का। मैंने उँगली से किनारा खुरचा तो तह खुल गई — अंदर एक लिफ़ाफ़ा था, भूरा, मुड़ा हुआ, मुहर लगी बिना स्याही के।
रीना ने टॉर्च मेरे हाथ के ऊपर की। मैंने लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर एक काग़ज़ था — पुराना, किनारों से फटा। और एक छोटी सी चिट। चिट पर सिर्फ़ दो लाइनें —
"जो ख़ुद को तीसरा कहता है, वो मरा नहीं। वो सिर्फ़ बदल गया है। जिस दिन तुझे यह मिले, उस दिन उसने तुझे ढूँढ लिया है।"
मेरे हाथ सुन्न हो गए। रीना ने काग़ज़ मेरे हाथ से लिया — बड़ा काग़ज़ था, उस पर किसी की लंबी लिखाई, और नीचे दो लकीरें, एक बिंदु। वही चिह्न। बाबा की लिखाई।
"पढ़," रीना ने कहा।
मैंने पढ़ा। और पढ़ते ही कमरे की दीवारें मेरे चारों तरफ़ सिकुड़ने लगीं।
बाबा ने लिखा था — "मैं जानता हूँ कि मेरे बाद सब कुछ मेरी मौत कहकर दफ़ना दिया जाएगा। पर सच यह है कि मुझे मारा नहीं गया। मुझे बदला गया। तीसरा आदमी मेरा साथी था, बाद में दुश्मन बना। जगन्नाथ लाल सिर्फ़ हाथ है, दिमाग़ नहीं। दिमाग़ मंदिर के पीछे रहता है, पीपल के नीचे, जहाँ कोई नहीं जाता। जो टोकन तेरे पास होगा, वो उसी ने मुझे दिया था, और जिस दिन वो अपना हाथ खोलेगा, टोकन तुझे ख़ुद बताएगा। उससे मिलना, पर उस पर भरोसा मत करना। याद रख — तीन सवाल पूछना, और उसके जवाब में तीन झूठ होंगे। जो सच होगा, वो चौथा जवाब होगा, जो वो बिना पूछे बोलेगा।"
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