The Token System – Chapter 666
“मैं भी नहीं,” मैंने कहा।
वह निकल गया। बाहर जीप का दरवाज़ा खुला, बंद हुआ, इंजन चला। गली सुनसान हो गई। माँ वहीं बैठी थी, जहाँ बैठी थी। मैं उसके पास गया, चूल्हे पर पानी रखा।
फिर माँ ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी पकड़ सूखी थी, पर तेज़। उसने मुँह उठाया और सीधे मेरी आँखों में देखा।
“बसवा में जो औरत है, वह तेरी नानी है।”
मैं रुका।
“और मैंने उससे आज तक बात क्यों नहीं की — यह तू कभी नहीं समझेगा।”
॥
माँ के हाथ ठंडे थे, पर आँखें गरम। वह मेरे पास बैठी रही और मैंने कुछ नहीं पूछा। चूल्हे पर पानी उबलता रहा और उबलते-उबलते खत्म भी हो गया। अंत में माँ खुद उठी, चाय बनाई, मेरे सामने रखी और बोली, "सो जा। सुबह दिमाग़ ठंडा होगा।"
मैं सोया नहीं। रीना के कमरे की लाइट जल रही थी। दरवाज़े पर दस्तक दी तो उसने तुरंत खोल दिया, जैसे इंतज़ार कर रही हो। चारपाई पर बैठी थी, हाथ में कापी, पन्ने पर लाइनें खींच रही थी।
"इतनी रात तक जाग रही है।"
"नौकरी ढूँढ रही हूँ," उसने कापी बंद करके कहा। "स्कूल छोड़ दूँ, तो कोई रास्ता तो चाहिए।"
"क्यों छोड़ेगी स्कूल?"
वह मेरी तरफ़ देखकर हँसी। "भाई, तेरे सवाल बड़े सीधे होते हैं। सीधे-सीधे जवाब देने का मन करता है, इसलिए डर लगता है।"
मैं उसके पास बैठ गया। जेब में टोकन था। मेरा हाथ अपने आप उसकी तरफ़ गया — बस एक बार, सोचा, सब बता दूँ। रीना को पता होगा तो कम से कम जगन्नाथ लाल की बैठक में अंधेरे में नहीं खेलेगी। मेरी उँगलियाँ जेब में घुसीं।
टोकन गरम था।
नहीं गरम — जलता हुआ। जैसे कोई चूल्हे से सिंकी हुई लोई जेब में रख दे। मैंने हाथ झटके से बाहर निकाला और उसी वक़्त कान के अंदर आवाज़ आई, धीमी पर साफ़, किसी ने गले के पास से फुसफुसाया हो।
"मत बता।"
मैं पल भर सुन्न बैठा रहा। रीना मेरी तरफ़ देख रही थी।
"क्या हुआ? चेहरा सफ़ेद क्यों पड़ गया?"
मैंने हाथ वापस जेब में डाला और टोकन उसी कोने में खिसका दिया जहाँ चाबी रखता हूँ। वह ठंडा हो रहा था, रेत की तरह ठंडा।
"मेरे पास कुछ है," मैंने कहा, और खुद अपनी आवाज़ को सुनकर लगा कि बात अधूरी लटक गई।
"कुछ है?" रीना ने सिर झुकाया। "भाई, मैं चार दिन से तेरी आँखें देख रही हूँ। तेरे हाथ काँपते हैं, तू चलते-चलते रुक जाता है, रात को दो बजे छत पर खड़ा मिलता है। कुछ तो है।"
"पर बता नहीं सकता।"
"क्यों नहीं?"
"क्योंकि —" मैं रुका। जेब में ठंडा पीतल पड़ा था और मेरे पास इसका जवाब नहीं था। उसी लम्हे मुझे समझ आया कि मैं कभी किसी को सच नहीं बता पाऊँगा। न माँ को, न रीना को, न सुमन को। मैं सब कुछ अकेले ढोता रहूँगा, जैसे दादा ढोते रहे, जैसे पापा ढोते रहे, और एक दिन —
"भरोसा रख," मैंने कहा।
रीना ने मुझे देखा। देर तक देखा। फिर वह मुस्कुराई — थकी हुई, पर मुस्कुराई।
"भरोसा है। इसीलिए शादी टाल रही हूँ। वरना सोचता है, मैं अब तक मंडप में बैठी होती, तेरी जेब में हाथ डालकर कहती होती — भाई, अब तेरी बारी।"
मैं हँस पड़ा। अड़तालीस घंटे से पहली बार। कमरे में मेरी अपनी हँसी किसी और की लगी।
"तेरी बारी का इंतज़ार करता रहूँगा," मैंने कहा।
"कर लेना। मैं भी।"
तभी दरवाज़े पर माँ खड़ी थीं। कब आईं, पता नहीं चला। उनकी आँखें लाल थीं, दुपट्टा सरककर कंधे से उतरा हुआ था। वह सीधे मेरे सामने आईं और बोलीं, "शादी टलेगी नहीं।"
मैं उठ गया। "माँ?"
"मैं ख़ुद जगन्नाथ लाल से बात करूँगी। कल सुबह।"
"तू क्या बोलेगी?" मेरी आवाज़ अपने ही कानों में तेज़ लगी। "वो आदमी भवानी का साथी है, माँ। वहाँ बात करने का मतलब है —"
"मतलब है डर का मुँह तोड़ना," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में कोई काँप नहीं थी। "पचास साल से मैं चुप हूँ। माँ को होम में बंद देखकर चुप हूँ, पति को गाड़ी की सीट पर देखकर चुप हूँ, तेरे को अंधेरे में लड़ते देखकर चुप हूँ। अब नहीं।"
रीना चारपाई से उठी और माँ के पास आकर खड़ी हो गई।
"माँ, मैं साथ चलूँगी।"
"तू नहीं चलेगी। तू घर पर रहेगी।" माँ ने रीना का हाथ पकड़ा और मेरी तरफ़ देखा। "और तू — तू चलेगा। मेरे पीछे खड़ा रहेगा, पर ज़ुबान मेरी चलेगी।"
मैं कुछ बोलता, उससे पहले रीना हँसी, "भाई, माँ को हिसाब में हरा दिया। अब तेरी बारी।"
माँ बाहर जाने लगीं, फिर रुकीं, पलटीं, और मेरे सिर पर हाथ रखा। कुछ नहीं बोलीं। बस हाथ रखा, जैसे गिनती कर रही हों — कितने साल से यह सिर उनके हाथ में नहीं आया।
वह गईं। रीना ने दरवाज़ा बंद किया और मेरे कंधे से टकराई।
"सुन," उसने कहा, "तू जो बता नहीं सकता, वो तेरे पास रहे। पर एक बात याद रख — मैं तेरी बहन हूँ, तेरी मरीज़ नहीं। मेरा इलाज मैं ख़ुद करूँगी।"
मैं कमरे से बाहर आया। आँगन में चाँद निकला था, बबूल की छाया दीवार पर हिल रही थी। मैंने जेब से टोकन निकालकर हथेली पर रखा। ठंडा था, सपाट, कोई शब्द नहीं, कोई अंक नहीं। मैंने उसे देर तक देखा, जैसे कोई जवाब माँग रहा हो। टोकन चुप रहा।
मैंने उसे वापस जेब में डाला ही था कि खिड़की के शीशे पर कुछ टकराया। हल्की आवाज़, कंकड़ जैसी। फिर दूसरी। तीसरी नहीं आई।
मैं खिड़की तक गया। नीचे गली खाली थी। दीवार के नीचे एक पत्थर पड़ा था, उस पर काग़ज़ लिपटा हुआ, रस्सी से बँधा। मैंने खिड़की खोली, झुककर उसे उठाया — हल्का था, काग़ज़ सूखा।
रस्सी खोली। काग़ज़ खोला।
सीधी स्याही, छोटी लिखाई। चार लाइनें।
"कल सुबह नौ बजे, मंदिर के पीछे, पीपल के नीचे। अकेले आना। तेरे पास जो चीज़ है, वो मेरी भी है। जो तुझे ढूँढ रहा है, वो मैं हूँ — तीसरा आदमी।"
मैंने काग़ज़ पलटकर देखा। पीछे कुछ नहीं, बस एक कोना-चिह्न — दो लकीरें और बिंदु, सीधा, बिल्कुल टोकन वाले चिह्न जैसा।
मेरी साँस रुक गई। सीधा चिह्न। टोकन का चिह्न।
मैं रसोई में गया। माँ चूल्हे के पास बैठी थीं, आँच बुझा रही थीं। मैंने काग़ज़ उनके सामने रख दिया।
"कल कोई मिलने आ रहा है," मैंने कहा। "ख़ुद को तीसरा आदमी बता रहा है।"
माँ ने काग़ज़ उठाया। पढ़ा। फिर उनका चेहरा बदल गया — रंग उतर गया, जैसे किसी ने दीवार से चूना खुरच दिया हो। उनके हाथ से काग़ज़ फिसला और फ़र्श पर गिरा।
"माँ?"
वह उठीं, दो कदम पीछे हटीं, दीवार का सहारा लिया।
"यह नहीं हो सकता," वह बोलीं। आवाज़ इतनी धीमी कि मैंने सिर्फ़ होंठ हिलते देखे।
"क्या हुआ? कौन है यह?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में जो था, वह डर नहीं था। कुछ और था। पहचान।
"तीसरा आदमी," उन्होंने कहा, बड़ी मुश्किल से, "वो मरा हुआ है।"
कमरे में राख की गंध थी और माँ के होंठ काँप रहे थे। मैंने फ़र्श से काग़ज़ उठाया, उसे अपनी जेब में रखा — टोकन के ठीक ऊपर, और उसी वक़्त मुझे लगा कि पीतल का वह ठंडा टुकड़ा फिर से एक बार, बहुत हल्का, गरम हुआ। फिर ठंडा हो गया।
माँ ने कुछ कहना चाहा, पर बाहर गली में किसी गाड़ी का इंजन चालू हुआ और वह चुप हो गईं। गाड़ी चली गई। मैं दरवाज़े तक गया, बाहर झाँका। गली खाली। सिर्फ़ मोड़ पर पीली गाड़ी की जगह अब कुछ नहीं था — और वहाँ मिट्टी पर ताज़े टायर के निशान बन गए थे, जो सीधे हमारे दरवाज़े की तरफ़ आकर मुड़े थे।
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