The Token System – Chapter 676
मैंने नीम के नीचे देखा। जो आदमी फोन पर बात कर रहा था, वो गाड़ी की तरफ़ पीठ किए खड़ा था। उसने सिर घुमाया — बस आधा — और फिर दोनों आदमी पैरों से धूल उड़ाते हुए नीम के पीछे की गली में चले गए।
"जो भी है," हरीश चंद्र ने कहा, "वो गिरधारी देवी के कमरे तक आवाज़ पहुँचा सकता है, और भवानी तक भी। दो जगह एक साथ बोलने वाला आदमी मेरे अनुभव में एक ही होता है।"
"पर भवानी तो ख़ुद आया था," बंसी ने कहा। "अपने मुँह से बोला।"
"भवानी आया था," हरीश चंद्र ने धीरे कहा। "पर वो यहाँ अपनी बात कहने नहीं आया था। वो यहाँ यह देखने आया था कि हम कितना जानते हैं।"
अंदर से डॉक्टर निकला। उसने मुँह के इशारे से बाहर बुलाया। हम तीनों बरामदे में गए।
"बोलना कम," उसने कहा। "पर वो बार-बार तुम्हारा नाम ले रही है। ज़्यादा देर नहीं है।"
मैं अंदर गया। गिरधारी देवी की साँस बज रही थी। उन्होंने आँखें खोलीं और मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया। मैंने अपना हाथ उनकी हथेली पर रख दिया।
"काग़ज़ निकले?" उन्होंने पूछा।
"निकले, बुआ।"
"तो अब सुन। मैं तुझे कुछ दिखाना चाहती हूँ।" उन्होंने तकिये के नीचे हाथ डाला और एक छोटी सी मुड़ी तस्वीर निकाली। किनारे फटे हुए, ऊपर से कोई चीज़ छलकी हुई। "ये मेरी आख़िरी चीज़ है जो मैंने छिपाई थी। इसे तू रख। मेरे पास मत छोड़।"
मैंने तस्वीर खोली।
काली-सफ़ेद। हवेली के सामने — पर वो हवेली आज वाली नहीं थी। दीवारें नई थीं, बरामदे में ताज़ा चूना चढ़ा था। चार लोग खड़े थे — तीन आदमी और एक औरत। दो आदमियों के हाथ में औज़ार थे। बीच वाले आदमी के हाथ में एक मोटी बही थी। और औरत — औरत दीवार के पास खड़ी थी, सिर पर दुपट्टा, हाथ में पीतल की छोटी डिबिया।
"ये तू है," मैंने कहा।
"हाँ। सोलह साल की। उस घर में नौकरानी थी।"
"और ये तीन?"
"बायें वाला मेरा मालिक — सेठ गोवर्धनदास। बीच वाला जो बही लिए है — वो सेठ का बड़ा बेटा, हरि सिंह। और दायें वाला — वो रामदीन मिस्त्री।"
मैंने तस्वीर को करीब किया। तीन आदमी हँस रहे थे। औरत नहीं हँस रही थी।
"पीछे पलट," गिरधारी देवी ने कहा।
मैंने तस्वीर पलटी। पीछे पुरानी स्याही में एक लाइन लिखी थी, और नीचे एक मुड़ा हुआ कोना — जहाँ से काग़ज़ चिपका था, उखड़ चुका था। लिखा था — "हवेली का चौथा हिस्सा उस औरत का है जिसका नाम किसी काग़ज़ पर नहीं।"
"किसी काग़ज़ पर नहीं?" मैंने पूछा। "तो फिर हिस्सा कैसे?"
"वो मेरा हिस्सा था। मेरे नाम पर नहीं — उस औरत के नाम पर जिसे मैं ढोती फिरती थी।" उन्होंने आँखें मींच लीं। "मैं सोलह साल की थी जब मुझे इस घर में लाया गया। मेरा नाम भी कोई नहीं पूछता था। सेठ कहते थे — औरत का हिस्सा भी औरत के नाम पर हो, पर काग़ज़ पर नाम आदमी का आएगा। इसलिए मेरा नाम किसी काग़ज़ पर नहीं आया। पर हिसाब में आया।"
मैंने तस्वीर देखी, फिर उन्हें।
"बुआ," मैंने कहा। "चौथा हिस्सा किसका है?"
वो मेरी तरफ़ घूमीं। उनकी आँखें साफ़ थीं — बीमारी के बावजूद, एक अजीब सी चमक थी उनमें।
"तेरी माँ का," उन्होंने कहा।
मेरे हाथ से तस्वीर फिसलने लगी। मैंने कसकर पकड़ ली।
"क्या?"
"तेरी माँ सरोज। मेरी बेटी है।" वो रुकीं, साँस लेने के लिए ज़ोर लगाया। "मैंने उसे कभी नहीं बताया। उसके पापा ने उसे उठाकर रखवा दिया था। मैं यहाँ रह गई। मैं नहीं चाहती थी कि वो भी मेरी तरह इस घर में बंध जाए।"
बंसी बाहर से आया। "मन्नू, अब?"
"एक मिनट," मैंने कहा।
"पर सुन —" गिरधारी देवी ने मेरा हाथ और कसकर पकड़ा। "जो काग़ज़ तूने निकाले, वो मेरे हैं। पर मैं उन्हें उस काग़ज़ में मिलाना चाहती हूँ जो तेरे पास है। जो चौथे हिस्से का है।"
"कौन सा?"
"जो तेरे पापा ने छिपाया था। जो माँ के पास है।" वो फिर रुकीं। "उस काग़ज़ पर मेरी बेटी का नाम है, और मेरा नहीं। पर मुझे पता है कि वो मेरा हिस्सा है। अब जब तू उसे अदालत में ले जाएगा, तो एक बात कहना — चौथा हिस्सा सरोज का है, और सरोज का मतलब मैं हूँ।"
"बुआ," मैंने कहा, "आप ख़ुद आएँगी गवाही देने?"
उन्होंने आँखें बंद कर लीं। बहुत देर तक बंद रखीं। मैंने सोचा वो सो गईं।
फिर उन्होंने आँखें खोलीं और कहा, "जब तक मेरी साँस है, मैं आऊँगी। भवानी ने आज मुझे देखा। अब वो मुझे इस हाल में मरने नहीं देगा। वो मुझे मरने से पहले गवाही देने से रोकने की कोशिश करेगा। इसलिए एक काम कर। मेरे बेटे से कह — जो मेरी बहन के घर में रहती है, काम करने वाली… उसे बोल दे, कोई भी मेरे पास बाहर का न आने पाए।"
"कौन?"
"जो मेरी बहन के घर में दस साल से काम कर रही है।" उन्होंने फिर आँखें बंद कर लीं। "उसका नाम मैं लेती हूँ, तो भवानी के कान तक पहुँच जाता है। तू पहचान जाएगा।"
मैंने तस्वीर जेब में रखी। कमरे से बाहर आया। बंसी बरामदे में खड़ा था, हाथ में कुल्हाड़ी अभी भी।
"क्या हुआ?" उसने पूछा।
"बस," मैंने कहा। "अब चलते हैं।"
"चलते हैं?" हरीश चंद्र ने कहा। "काग़ज़ तो निकले।"
"काग़ज़ निकले हैं," मैंने कहा। "पर अभी दिखाने का वक़्त नहीं आया। पहले दो काम हैं।"
हरीश चंद्र ने मेरी आँखों में देखा, फिर चुपचाप बैग उठा लिया।
बंसी की गाड़ी से हम बसवा की सड़क पर चल पड़े। आधा घंटा ही चला होगा कि पीछे से सीटी बजी। एक पुरानी पुलिस जीप सामने आकर रुकी।
हवलदार उतरा। कमर पर बेल्ट टेढ़ी बंधी थी।
"मनोहर?" उसने पूछा।
"हाँ।"
"थाने से आ रहे हैं। तुम्हें ढूँढ रहे थे।" उसने काग़ज़ निकाला। "हवेली के सामने एक बूढ़ी औरत बेहोश मिली है। रास्ते वालों ने कहा — गिरी है। पर एक चश्मदीद ने कहा — धक्का लगा है।"
मेरा खून जम गया।
"कौन?" बंसी ने कहा।
"नाम बता रही है — जमुना देवी। सिर पर चोट है, पर होश में है। उसने तुम्हारा नाम लिया। कहा — जो हवेली के काग़ज़ों में दिखता है, वो आए।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
"कहाँ है?" मैंने कहा।
"थाने के पास वाले सरकारी अस्पताल में।"
बंसी ने गाड़ी घुमाई।
जमुना देवी सरकारी अस्पताल के उसी वार्ड में थीं जिसमें हम अक्सर आते थे। सिर पर पट्टी बंधी थी, एक आँख के ऊपर भी। नर्स दवा देकर गई थी।
हम अंदर घुसे। वो खिड़की की तरफ़ देख रही थीं। मेरी आहट सुनकर घूमीं।
"तू आ गया," उन्होंने कहा। आवाज़ में कड़वाहट थी। "मुझे पता था तू आएगा।"
"किसने किया?"
"कौन करेगा?" उन्होंने कहा। "मैं भवानी की गवाह होने आई थी हवेली। दरवाज़े पर खड़ी थी। वो आया। बोला — अगर काग़ज़ तेरे पास हैं, अभी दे दे। मैंने कहा — काग़ज़ नहीं, अपने पास है। तो उसने धक्का दिया।" वो रुकीं। "मैं गिरी। सिर चूर हुआ। पर वो भागा नहीं। मेरे ऊपर झुककर बोला — देख, मैंने कहा था न, हिसाब सबका नहीं छूटता।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
"जमुना बाई," मैंने कहा। "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"थाने में यही बोलोगी?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर बंसी की तरफ़, फिर हरीश चंद्र की तरफ़ जो दरवाज़े पर खड़े थे।
"अगर मैं बोलूँ," उन्होंने कहा, "तो मुझे क्या मिलेगा?"
"हिस्सा," मैंने कहा। "हवेली का चौथा आपका। काग़ज़ आपके पास? नहीं, मेरे पास हैं। पर आपका काग़ज़ — 'नानी का चूल्हा' वाला — वो भी हमारे पास है।"
"और मेरा बेटा? जो सात साल से भवानी के होम में है?"
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