The Token System – Chapter 652
भवानी का वकील पहली बार हिला। उसने जल्दी से अपना ब्रीफ़केस उठाया, जैसे कुछ अंदर रखना हो और फिर हवा में कुछ कहा — “मैं वकील हूँ, गवाह नहीं।”
“कोई कह नहीं रहा,” बंसी ने कहा। “बैठ जाओ।”
दिन चढ़ रहा था, और आँगन में उन्नीस आम आदमी, तीन अख़बार वाले, और एक चलता-फिरता गवाह — यही सब जुटा तो लगा कि अब कुछ ऐसा होगा जो भवानी की दीवार के इस पार और उस पार — दोनों तरफ़ सिर्फ़ एक आदमी जानता था।
श्यामू की फ़ाइल मेज़ से उठाकर नायब ने कोई तीसरा पन्ना खोला और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
“ये पन्ना अलग स्याही में है,” उसने कहा। “इस पर एक नाम है, जिसे पिछले साल तुम्हारा पापा मिलने के बाद किसी ने जोड़ा था।” उँगली उस नाम पर रुकी।
सफ़ेद काग़ज़ पर, नीली स्याही में, छोटी लिखाई में एक नाम था — “अमर।”
“अमर कौन है?” मैंने श्यामू की तरफ़ देखा।
वह हिल गया। “अमर… अमर भवानी का बेटा है।”
“वो तो रणविजय है,” मैंने कहा।
“रणविजय बड़ा है,” श्यामू ने धीरे से कहा। “अमर छोटा है। बराबर का नहीं, सौतेला। और उसे भवानी ने कभी अपना नहीं कहा।”
सुमन ने आँगन के बीच से धीमे से कहा, “अमर राघव है। अब मैं समझी।”
और वहीं, तहसील के खुले आँगन में, पहली बार मुझे एहसास हुआ कि भवानी की लड़ाई कोई बाहर से नहीं — उसके ही खून से आएगी।
“अमर राघव मतलब मेरा ही भाई?” बंसी ने आगे आकर कहा। “मेरे पापा का… कोई और बेटा?”
श्यामू ने अपनी जेब से एक फटा हुआ फोटो निकाला, बिना कुछ कहे मेज़ पर रख दिया। फोटो में तीन लोग थे — भवानी, एक औरत जिसका चेहरा मिट गया था, और बीच में करीब दस साल का एक लड़का, जिसकी आँखें भवानी की आँखों की तरह ही पतली थीं।
“ये फोटो होम की दीवार पर टँगी थी,” श्यामू ने कहा। “पापा जब पहली बार वहाँ गए थे, तब उन्होंने ये फोटो इसी लड़के को दिखाकर पूछा था — ‘जानता है इसे?’ और वो लड़का बोला था — ‘ये मेरी माँ है।’”
बंसी का रंग उड़ गया। “और पापा ने ये बात मुझसे नहीं कही?”
“कहने की हिम्मत किसमें थी?” माँ ने दरवाज़े से आवाज़ दी। “तुम्हारे पापा अस्पताल से लौटकर तीन दिन चुप रहे। चौथे दिन उन्होंने अपनी ज़ुबान से कहा था — ‘भवानी की एक औरत और एक बेटा है, जिसका नाम रघव के नाम में छुपा है।’”
बंसी ने मेज़ पर हाथ रखकर ख़ुद को सँभाला। “तो रणविजय — जो हमें सार्स का बाप कहता है — वो मेरा बड़ा भाई है?”
“सौतेला,” श्यामू ने ठीक किया। “अमर असली है। रणविजय भवानी की दूसरी औरत से है। और अमर पहली से। और भवानी ने अमर को इसलिए छुपाया क्योंकि उसकी पहली औरत ने उसे छोड़ दिया था, और भवानी को अपनी रोबदार छवि से प्यार था।”
नायब तहसीलदार ने पूरा आँगन देखा, फिर अपना पेन उठाकर एक पुराने पन्ने पर कुछ लिखा।
“ये अमर अब कहाँ है?” सुमन ने पूछा, और उसका सवाल तेज़ था, सीधा उस जगह पर जहाँ दर्द हो रहा था।
श्यामू ने होंठ सिल लिए। फिर बोला, “भवानी के होम में। पिछले कमरे में।”
“जहाँ सोहन है?” मैंने कहा।
“उसी कमरे में,” श्यामू ने सिर नीचा करके कहा। “बारह साल से।”
आँगन में बैठे उन्नीस आम आदमी एक साथ साँस लेने लगे। बंसी ने फोटो उठाया और फिर उसे अपनी जेब में रख लिया, जैसे किसी महँगी चीज़ को शर्ट के अंदर छुपा रहा हो।
“अमर को होम में क्यों रखा है?” मैंने पूछा। “वो भवानी का बेटा है। वो बाहर नहीं आ सकता?”
श्यामू ने आँखें उठाईं, और उसमें जो था वो डर नहीं था — शर्म थी। “अमर बाहर आ सकता है। पर अमर भवानी से लड़ता नहीं। अमर तो भवानी की एक बात पर सब कुछ मान जाता है। भवानी ने उसे बचपन से एक बात पक्की करवा दी — ‘तू राघव नहीं, तू अमर है। तेरा हिस्सा सिर्फ मेरे हाथ में है।’”
“कैसा हिस्सा?” बंसी खींचकर बोला।
“होम में पचास लोग हैं,” श्यामू ने धीरे से कहा। “बीस तो मरे हुए हैं। तीस नाम काग़ज़ों में बदले हुए हैं। और अगर भवानी की वसीयत मान ली गई तो सारा होम, सारी ज़मीन, और जो भी सरकारी ग्रांट आती है — सब अमर के नाम। नहीं तो, भवानी की दूसरी औरत के बेटे — रणविजय के नाम।”
सुमन ने पर्ची उठाई जो मेज़ पर पड़ी थी।
“तभी भवानी को रणविजय प्यारा है,” वह बोली। “क्योंकि रणविजय उसका काम बाहर से करता है, और अमर अंदर बंद रहकर उसका नाम चलाता है।”
नायब ने पेन नीचे रख दिया। “मिस्टर बंसी।”
“जी।”
“आपके पास दो घंटे हैं। मैं अदालत का काम आगे बढ़ा रहा हूँ। आप दो घंटे में अगर सोहन और अमर दोनों को यहाँ ले आएँ, तो मैं इस फ़ाइल को सिर्फ़ काग़ज़ नहीं मानूँगा। मैं इसे सबूत मानूँगा।”
“और अगर नहीं लाए?” माँ ने पूछा।
नायब ने उनकी तरफ़ देखा। “तब मुझे भी भवानी के वकील की तरह बोलना पड़ेगा — ‘मैं सिर्फ़ हुक्म चलाने वाला हूँ।’”
बंसी मेरी तरफ़ झुका। “मन्नू, तू माँ के साथ रुक। मैं और सुमन होम जा रहे हैं।”
“मैं आ रहा हूँ,” मैंने कहा। “श्यामू भी चलेगा।”
श्यामू ने एक कदम पीछे हटते हुए हाथ जोड़ लिए। “मैं… मैं अंदर नहीं जा सकता। मैं अगर गया तो भवानी के आदमी पहचान लेंगे।”
“तो तू छुपकर जा,” मैंने कहा। “जैसे बारह साल से जाता था।”
वह हक्का-बक्का रह गया। फिर उसने अपने कपड़ों की सिलवटें ठीक कीं और चल पड़ा।
हम तीन, रास्ते में ही, पीछे-पीछे। सुमन दौड़ रही थी, और बीच रास्ते में रुककर किसी लड़के को बीस रुपये देकर कह रही थी, “अस्पताल के पुराने कमरे में जो श्याम लाल रजिस्टर है, मिस्टर सिंह को मेरा नाम लेकर बता। कह — सोहन और अमर के नाम का पन्ना लेकर आए।”
मैंने पूछा, “श्याम लाल रजिस्टर?”
“अस्पताल के उस काग़ज़ के पीछे का काग़ज़,” उसने कहा। “जो सरकारी नहीं है। जिसमें दर्ज है कि कौन मरीज़ किस दिन भवानी के होम भेजा गया।”
“और तुझे कैसे पता कि वो रजिस्टर है भी?”
सुमन ने पहली बार उस दिन अपनी आँखों में वो चमक दिखाई जो रात की थी। “मैं वहाँ दो घंटे सफ़ाई करती थी। जब भी कोई पन्ना जलता था, श्याम लाल रजिस्टर की दराज़ धुँए से काली हो जाती थी। आख़िरी बार मैंने उसे देखा था। वो अब भी वहीं है। किसी ने उसे आग नहीं दी — क्योंकि उसका नाम किसी किताब में नहीं, श्यामू के सिर में है।”
हम होम के दरवाज़े पर पहुँचे। सामने का दरवाज़ा खुला था, चौकीदार गायब था, और आँगन में एक भी मरीज़ नहीं था। जैसे सबको अंदर किसी कमरे में बंद कर दिया गया हो।
श्यामू मेरी आस्तीन खींचकर रुका। “पिछले कमरे में चोरी-दरवाज़ा है। रसोई के पीछे। पंद्रह सीढ़ियाँ नीचे। जब भवानी नहीं होता, सोहन वहाँ से बैठकर धूप खाता है।”
हम रसोई के पीछे पहुँचे। सुमन ने दालान में नज़र दौड़ाई। “दो मिनट। दरवाज़ा मैं खोलूँगी। श्यामू, तू बाहर खड़ा रह। अगर भवानी का आदमी आए तो खाँसना।”
“खाँसना?” श्यामू ने कहा। “मुझे खाँसी नहीं है।”
“अब है,” सुमन ने कहा, और मुँह फेरकर मुस्कुराई।
दरवाज़ा खुला। अंदर अंधेरा था। सुमन मेरी तरफ़ देखकर कहा, “जानता है, मैं इस दरवाज़े के सामने सौ बार झाड़ू कर चुकी हूँ। हर बार सोचती थी — इसमें क्या है।”
“और कभी नहीं खोला?”
“खोलती तो नौकरी जाती।” वह सीढ़ी उतरने लगी और आवाज़ नीचे से आई। “अब नौकरी गई, तो दरवाज़ा क्यों बचाऊँ?”
सीढ़ियों के नीचे एक छोटा कमरा था — तीन मरीज़ के बिस्तर, एक खिड़की जिस पर लोहे की जाली, और दीवार पर एक पुराना कैलेंडर जिसका पन्ना दो साल पहले का अटका था।
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