The Token System651 / 1154

The Token System – Chapter 651

7 min read November 6, 2026

माँ ने पर्ची मेरे हाथ से लेकर आँखों के पास लाई। उसकी उँगली एक नाम पर रुकी।

“ये,” उसने कहा। “ये हमारे मोहल्ले का रमज़ान। बीस साल पहले। इसके बेटे ने करीब साल भर यहाँ तहसील में आवेदन डाले। फिर चुप हो गया। घर वालों ने कहा — इलाज के लिए जयपुर ले गए थे।”

“रमज़ान तीसरे नंबर पर है मेरी सूची में,” श्यामू ने कहा।

“तो चलो,” मैंने बंसी को देखा। “ये पर्ची सबसे पहले सुमन को दिखानी है।”

बंसी ने अपनी जेब से चाभी निकाली। “गाड़ी में बैठो। और तू भी चल,” उसने श्यामू से कहा।

“मुझे छोड़ दो,” श्यामू ने अचानक घुटनों में हाथ रखकर कहा। “भवानी को पता चला तो मेरी बेटी का स्कूल से नाम कटवा देगा। वो आठवीं में है।”

“तेरी बेटी का नाम कटवाना है तो बोल देते हैं,” बंसी ने कहा। “ख़ुद का नाम किसने कटवाया था — सुखदेव ने। आज तेरी तरफ़ से मुंह फेरा, तो कल तेरी बेटी को कौन सुनाएगा?” श्यामू का हाथ काँपा। “मैं चलूँगा,” उसने कहा।

सुमन अस्पताल की रात की ड्यूटी से निकली थी। पीछे के चाय के कमरे में उसने सितारों जैसी नींद भरी आँखों से पर्ची पढ़ना शुरू किया, और नींद उड़ गई।

“ये,” उसने उँगली से काग़ज़ पर चलाया। “ये तो सीधा मेडिकल रिकॉर्ड से टकराता है। सरकारी अस्पताल की डिस्चार्ज बुक में इन नामों के आगे लिखा होगा — ‘नर्सिंग होम रेफ़र’। और अगर ये नाम वहाँ पहुँचे ही नहीं, तो भवानी का पूरा होम एक काग़ज़ का जाल है।”

“तू क्या करेगी?” बंसी ने पूछा।

“मैं पुराने रजिस्टर से इन नामों को मिलाऊँगी। हर नाम के आगे बुख़ार, ज़ुकाम, कुछ नहीं लिखा होगा — सिर्फ़ ‘होम’।” सुमन ने पर्ची उठाई। “और एक बात। ये तेरहवाँ नाम —” उसका चेहरा बदल गया।

“क्या?”

“सोहन।”

“सोहन कौन?”

सुमन ने कुर्सी पीछे सरकाई। “सोहन वही है जो मेरे पापा की डायरी में था। मोहन का बेटा। पर —” वह रुकी। “मैंने दो दिन पहले अस्पताल के रजिस्टर में देखा — सोहन आज भी ज़िंदा है, भवानी के होम के पिछले कमरे में।”

मैं खड़ा हो गया। “मतलब वो मरा नहीं।”

“मतलब उसे मारा नहीं गया। रखा गया है — गवाह ठहरेगा ना दबा हुआ।” सुमन ने पर्ची मेज़ पर रखी। “कल अदालत है, और अदालत में मेरे पास एक चलता-फिरता गवाह खड़ा करना होगा। मोहन का बेटा।”

श्यामू कुर्सी पर झुक गया, सिर घुटनों में। “तो मेरी सूची आधी है। मैंने मरने वालों के नाम गिने थे। ज़िंदा रह गए लोगों के नाम मैंने कभी गिने ही नहीं।”

“आज से गिन,” सुमन ने कहा। “कल सुबह आठ बजे मेरे पास हो। सिर्फ़ गिनना नहीं — तीन नाम देने हैं जिन्हें तू ख़ुद अपने हाथ से होम के पिछले कमरे में ले गया था।”

“मैं मरीज़ नहीं ले जाता था। मैं सिर्फ़ काग़ज़ ले जाता था,” श्यामू ने कहा।

“काग़ज़ काफ़ी नहीं,” सुमन ने तेज़ आवाज़ में कहा। “अदालत में ‘काग़ज़ कहता था’ पर सुनवाई नहीं होती। अदालत में गवाह कहता है।” वह उठी और उसका कंधा पकड़ा। “कल तुझे बोलना होगा। सिर्फ़ इतना — ‘मैंने उसे देखा। मैंने उसे ज़िंदा देखा।’”

श्यामू ने ऊपर देखा। “और मेरी बेटी?”

“तेरी बेटी का स्कूल,” बंसी ने कहा, “कल शाम से उसी की किताबों में नाम लिखा जाएगा जो आज सच बोलेगा।”

रात के एक बजे मैं घर पहुँचा। कन्हैया आँगन की चारपाई पर बैठा था, आँखें खुली। मैं उसके पास बैठ गया।

“तेरा मामा था उसमें,” उसने कहा, आवाज़ सूखी। “मैं तेरे घर आया, तो सोच रहा था — मैं भवानी का दुश्मन, इस घर का मेहमान। और पता नहीं चला कि मेरा अपना खून —”

“तेरा मामा पूरा सच नहीं जानता था,” मैंने कहा। “या जानता था और डरता था। ऐसे आदमी अदालत में आते हैं तो टूट जाते हैं। तू उससे अलग है क्योंकि तू आज सच बोल रहा है, वो कल झूठ बोलेगा।”

कन्हैया ने गले का ताबीज़ खोला और मेरी तरफ़ बढ़ाया। “इसे तू रख।”

“क्यों?”

“क्योंकि सुबह अगर मैं डगमगाया, तो तुझे याद रहेगा कि काग़ज़ किसका था।”

मैंने ताबीज़ लिया। कपड़े के अंदर मुड़ा काग़ज़ था। मैंने खोलने की कोशिश की तो कन्हैया ने हाथ रोका। “सुबह। अदालत में।”

मैंने सिर हिलाया।

सुबह सात बजे मैं उठा तो माँ चूल्हे पर चाय बना रही थी और रीना दरवाज़े पर खड़ी थी, स्कूल नहीं गई थी। उसने कहा, “आज मैं भी चलूँगी।”

“अदालत में भीड़ होगी।”

“भीड़ है तो सही,” रीना ने कहा। “भवानी की औरतें मेरे हाथ में काग़ज़ थमा चुकी हैं, तो मैं भी अपने हाथ में एक काग़ज़ लेकर खड़ी रहूँगी।” उसने माँ के हाथ से चाय का प्याला लिया। “तेरी माँ का बयान सुनेगी तो आधी अदालत रोएगी।”

और फिर, सात बजकर दस मिनट पर, दरवाज़े पर एक लड़का आया। सोलह-सत्रह साल का, स्कूल बैग लटके हुए।

“मनोहर जी?” उसने पूछा।

“हाँ।”

“ये —” उसने मुड़ा काग़ज़ दिया और पलटने लगा।

“रुक। किसने भेजा?”

“किसी ने नहीं।” उसने पीछे देखा। “मैं सुबह स्कूल जा रहा था। स्कूल के पीछे की गली में एक बूढ़ा बैठा था, सफ़ेद दाढ़ी। उसने ये दिया और कहा — मनोहर के घर दे दे। और कहा — मुझे छोड़ देना, लोग मुझे डराते हैं।”

मैंने काग़ज़ खोला। पीली स्याही में एक ही लाइन थी।

“अदालत में आज वो आदमी आएगा जिसकी गवाही तेरे सच से बड़ी है। मत जाना। — शुभचिंतक।”

मैंने काग़ज़ बंसी को दिया। बंसी पढ़कर हँसा। “शुभचिंतक। पूरे शहर में एक ही शुभचिंतक है — भवानी का मुंशी।” उसने काग़ज़ गोल करके जेब में रख दिया। “चल। देर हो रही है।”

तहसील का आँगन भरा हुआ था। दो पुलिस गाड़ियाँ, दो अख़बार वाले, भवानी के आदमी और उन्नीस आम आदमी जो अपने काग़ज़ लेकर खड़े थे।

मैं जैसे ही सीढ़ियाँ चढ़ा, किसी ने पीछे से आवाज़ दी। पलटा — श्यामू खड़ा था, कमीज़ में खुँसा हुआ, हाथ में कोई पुरानी फ़ाइल दबाए हुए।

“लाए भी और ये ले जाओ,” उसने कहा। “ये भवानी के होम के पिछले कमरे का रजिस्टर है। असली। दो साल का। मैं चुरा लाया।”

मैंने फ़ाइल ली। उसमें पन्ने उलटे — हर पन्ने पर नाम, तारीख़, और आगे लिखा — “भेजा गया”।

“ये भी पक्का है?” बंसी ने पूछा।

“जितना तेरा हिसाब,” श्यामू ने कहा। फिर वह जल्दी से बोला, “मेरी बेटी कल से स्कूल जाएगी ना?”

“जाएगी,” बंसी ने कहा। “पहले दिन मैं ख़ुद छोड़ूँगा।”

आँगन में नायब तहसीलदार का मेज़ लगा था। भवानी का वकील एक कोने में खड़ा था, सूट के बटन तक बंद। मैंने श्यामू की फ़ाइल मेज़ पर रखी।

नायब ने चश्मा ठीक किया। “ये क्या है?”

“भवानी के होम का रजिस्टर,” मैंने कहा। “लगता है कल कोई पन्ना फाड़कर भूल गया।”

नायब ने फ़ाइल उलटी। एक पन्ने पर उँगली रुकी। “ये सोहन का नाम है।”

“और सोहन हमारा अगला गवाह है,” सुमन ने पीछे से कहा, जो अपने घूँघट वाले दुपट्टे में आँगन में घुसी थी। “जो आज भी ज़िंदा है।”

नायब ने ऊपर देखा, सीधे मेरी तरफ़। “सुनो।” उसकी आवाज़ धीमी हो गई। “आज फ़ैसला फाइलों पर नहीं होगा। आज फ़ैसला दरवाज़ा खुला रखकर होगा।”

“मतलब?” मैंने पूछा।

“मतलब — तुम्हारे गवाह सिर्फ़ काग़ज़ नहीं पढ़ेंगे। कमरे के अंदर आकर अपना नाम बोलेंगे। एक-एक करके।” उसने फ़ाइल बंद की। “और पहला नाम क्या है?”

मैंने पीछे देखा।

माँ दरवाज़े पर खड़ी थी, हाथ साड़ी में। मैंने उसकी तरफ़ इशारा किया। “पहला नाम,” मैंने कहा, “हमारी माँ का है। और दूसरा नाम — तेरा, सुमन।”

सुमन एक कदम आगे आई। “तीसरा नाम मेरे पास है,” उसने कहा। “और वो नाम आज कोर्ट के बाहर से नहीं, भवानी के होम के पिछले कमरे से आएगा।”

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