The Token System – Chapter 650
कन्हैया ने सिर झुकाया। “काकी, मैं डरा हुआ था। और — और मुझे लगा कि तुम मुझे मार डालोगी।”
“मारती क्यों नहीं?” माँ ने कहा। “पर तू नहीं आया। तेरे मामा ने अपना पाप मरते वक़्त तुझ पर छोड़ दिया और तू उसे इक्कीस साल पीठ पर ढोता रहा। अब आया है — तो आ गया। बैठ। पानी पी।”
कन्हैया ने लोटा उठाया। उसके हाथ काँप रहे थे। माँ ने उसे देखा और फिर अपने चूल्हे की तरफ़ लौट गई, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
मैंने रीना की तरफ़ देखा। रीना ने मुझे इशारे से बाहर बुलाया। मैं उसके पीछे आँगन के कोने तक गया, जहाँ तुलसी का चौरा है।
“अगर ये सच बोल रहा है,” रीना ने धीमे से कहा, “तो कल रजिस्टर खुलने पर क्या होगा?”
“मुंशी जो मुहर लगाएगा वो झूठी होगी,” मैंने कहा।
“पर हम उस मुंशी को कैसे चुनौती देंगे?” रीना ने कहा। “वो ख़ुद मुहर लगाएगा — भवानी के कहे मुताबिक़। हमारे पास मुंशी का कोई काग़ज़ नहीं।”
मैंने जेब से टोकन निकाला और उसे रीना की तरफ़ बढ़ाया। “ये टुकड़े मिल गए तो टोकन पूरा हो गया। दादा ने टोकन दीवार में इसलिए छुपाया था कि भवानी के दादा उसे बेचना चाहते थे और दादा ने हिसाब लौटाने में देरी की। माँ कहती है — देरी की वजह वही मौत बनी।”
रीना ने टोकन छुआ। उसका चेहरा सख़्त हो गया।
“चल,” उसने कहा। “मैं अंदर जाकर माँ को सब बताती हूँ।”
अंदर कमरे में रोशनी कम थी। माँ चूल्हे के पास बैठी थी और कन्हैया उसके सामने चारपाई पर। बंसी दरवाज़े के पास खड़ा था, जैसे पहरा दे रहा हो।
“कल मैं भी चलूँगा,” कन्हैया ने कहा।
“तू चलेगा तो भवानी का आदमी कहेगा — ये तो किशोरी लाल का भांजा है। इसकी बात कौन सुनेगा,” बंसी ने कहा।
“भवानी का आदमी नहीं, भवानी ख़ुद कहेगा,” कन्हैया ने कहा। “पर मैं अपनी बात कहूँगा। और मेरे पास मामा का लिखा हुआ एक काग़ज़ भी है। जिस रात की बात है, उसे मामा ने मरने से पहले लिखा था। जब काग़ज़ पढ़ा जाएगा, तब सबको सुनाई देगा।”
“काग़ज़ अभी कहाँ है?” मैंने पूछा।
“मेरे गले में ताबीज़ की तरह लटका है,” कन्हैया ने कहा। “कल सुबह से पहले मैं हटाऊँगा नहीं।”
रात के ग्यारह बज रहे थे। माँ ने कन्हैया को कमरे की दूसरी चारपाई पर सोने के लिए कहा। उसने पहले मना किया — “मैं बाहर बरामदे में पड़ूँगा” — पर माँ ने कहा, “तू यहाँ डर के साए में इक्कीस साल रहा। अब बरामदे में सोएगा तो गाँव वाले क्या कहेंगे?” कन्हैया चुप हो गया।
और मैं पहली बार झुककर रीना के सामने बैठा। बंसी चौकन्ना हो गया, जैसे ऐसा दृश्य उसने कभी नहीं देखा।
“रीना,” मैंने कहा, “तेरी शादी को भवानी ने अपना हथकंडा बनाया है। मैं इसे ऐसे नहीं छोड़ सकता। कल जो होगा — होगा। पर अगर कल भवानी जीत गया, तो वो तेरे रिश्ते के नाम पर माँ को फँसाएगा। मैं ये नहीं होने दूँगा।”
रीना ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ नहीं थी जो तीन दिन पहले थी — शक़ वाली, दूर वाली। उसने हाथ बढ़ाकर मेरे सिर पर हाथ रखा।
“तो जो करना है, साफ़-साफ़ कर,” उसने कहा। “छिपाकर मत कर। छिपाने में हम तीन पीढ़ियाँ खो चुके।”
कन्हैया ने चारपाई पर बैठे-बैठे सिर उठाया। “अब मुझ पर भरोसा न करना,” उसने कहा। “मैं इक्कीस साल किसी के काम न आया। अगर कल मेरी बात कमज़ोर निकले तो —”
“तू आज से काम का है,” माँ ने कहा। “बस इससे ज़्यादा मत बोल। सो जा।”
कन्हैया लेट गया। बंसी ने कमरे की लाइट बंद की, पर बाहर की लाइट जलती रही।
मैं अपनी चारपाई पर लेटा था और टोकन मेरी जेब में था। वो गरम था — हल्का-सा, जैसे आँगन की रोशनी उसमें उतर गई हो। मैंने सोचा — कल अदालत जाएगी। रजिस्टर खुलेगा। मुंशी की मुहर, माँ का बयान, तस्वीर। और कन्हैया का ताबीज़।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
ये दस्तक अलग थी — तीन बार नहीं, नौ बार। धीमी, बराबर, जैसे कोई गिनकर पीट रहा हो। कुत्ते भौंके। मैं उठा। बंसी दरवाज़े पर पहुँच गया था।
दरवाज़ा खुला। बाहर एक आदमी खड़ा था — छोटा, सुर्ख़, गले में कोई चीज़ लटकी हुई।
“मैं भवानी साहब का आदमी नहीं हूँ,” उसने कहा। “मैं वो आदमी हूँ जिसका नाम तुम्हारे काग़ज़ में उन्नीसवीं लकीर पर नहीं है, पर जिसका हिसाब उसी रजिस्टर में है।”
कन्हैया उठकर आया। उसने उस आदमी को देखा और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
“तू?” कन्हैया ने कहा। “मामा ने बताया था तुझे मार डाला।”
आदमी मुस्कुराया। “मरने से पहले वो झूठ बोल गए। मैं हूँ सुखदेव दादा के साथ पहाड़ी पर खड़ा तीसरा आदमी। और मैं ही वो आदमी हूँ जिसने दादा दुखदेव को पहाड़ी से गिरने नहीं दिया — उन्हें उस रात मारा गया।”
॥
दरवाज़े के बाहर खड़ा आदमी अंदर आया तो उसके जूते से पानी टपक रहा था। बारिश नहीं थी, पर मोहल्ले की नाली कल रात से उबल रही थी।
“श्यामू,” उसने अपनी तरफ़ इशारा किया। “रामदीन का छोटा भाई। उसी रामदीन का जिसकी मुहर कल अदालत में बजेगी।”
बंसी ने दरवाज़ा जैसे-तैसे खुला रखा था, पर उसका शरीर दरवाज़े के पीछे था। “रामदीन का भाई मरा हुआ है। उन्नीस सौ छियानवे में मला था। गाँव वाले बताते हैं।”
“वो मेरा दूसरा भाई था,” श्यामू ने कहा। “मैं तब आठ साल का था। घरवालों ने कह दिया — ‘छोटा बच्चा है, भूल जाएगा।’” वह रसोई की तरफ़ देख रहा था, जहाँ माँ बैठी थी। “काकी, तुम मुझे पहचानती हो। उस साल तुम्हारे पापा के घर का चूल्हा मैं जलाता था।”
माँ ने आँखें सिकोड़कर देखा, फिर धीरे से बोली, “श्यामू। तेरे सिर पर बाल तब भी ऐसे ही बिखरे थे।”
श्यामू अंदर आया। कन्हैया उसके सामने खड़ा था, हाथ गले के ताबीज़ पर।
“तू मामा के साथ था उस रात?” कन्हैया की आवाज़ काँपी।
“मामा तेरे थे, मेरे नहीं थे,” श्यामू ने कहा। “मैं उस रात पहाड़ी पर नहीं था। मैं उस रात पहाड़ी के नीचे खड़ा था — भवानी के बाप की गाड़ी में। और मैंने देखा कि दो आदमियों ने सुखदेव को उठाकर पहाड़ी के किनारे नहीं फेंका, बल्कि पीछे से सिर पर वार किया और फिर गाड़ी तक घसीट लाए।”
कमरे में किसी ने साँस नहीं ली।
“कौन?” मैंने पूछा।
“एक तो हरि सिंह ख़ुद था। दूसरा —” श्यामू ने कन्हैया की तरफ़ देखा। “दूसरा तेरा मामा था, कन्हैया। किशोरी लाल।”
कन्हैया दीवार से टिक गया। उसके हाथ से ताबीज़ छूटने ही लगा था कि बंसी ने उसे पकड़ लिया।
“झूठ,” कन्हैया फुसफुसाया।
“मैं इक्कीस साल से यही झूठ अपने आप से बोल रहा था,” श्यामू ने कहा। “भवानी के होम में नौकरी मिली, तो लगा — भूल जाऊँगा। पर हर उस मरीज़ के काग़ज़ पर जिसे हम ‘भेज’ देते थे, सुखदेव का चेहरा दिखता था।”
“भवानी के होम में तेरा काम?” बंसी ने पूछा।
“काग़ज़। सिर्फ़ काग़ज़।” श्यामू ने जेब से एक मुड़ी हुई पुरानी पर्ची निकाली। काग़ज़ पीला पड़ चुका था, किनारे से लगभग टूटा हुआ। “ये सूची मैंने दस साल में छिपाकर बनाई। भवानी के होम के वो मरीज़ जिन्हें सरकारी अस्पताल से ‘भेजा’ गया, और जो होम पहुँचने से पहले रास्ते में ही मर गए। तेरह नाम हैं। तेरह।”
मैंने पर्ची उसके हाथ से ली। काग़ज़ में उँगलियों के पसीने की महक थी। नाम छोटी, काँपती लिखाई में थे। पहला नाम — मोहन। दूसरा — सुनीता। तीसरा — किशन।
“रुक,” मैंने कहा। “ये किशन कौन है?”
“तेरा पापा नहीं,” श्यामू ने जल्दी से कहा। “तेरे पापा उस साल इस सूची में हैं भी नहीं। ये किशन लाल है, झामा राम की गली का। उसे भवानी के होम में तीन दिन रखा और फिर लिख दिया — ‘इलाज के बाद’।”
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