The Token System – Chapter 653
एक बिस्तर पर एक बूढ़ा आदमी लेटा था। सफ़ेद दाढ़ी, पीली आँखें, हड्डियों का ढाँचा। बराबर के बिस्तर पर एक लड़का बैठा था — कोई उनतीस-तीस साल का, सिर पर पतले बाल, हाथ में लकड़ी का टुकड़ा जिस पर वह चाकू से कुछ खुरच रहा था।
दरवाज़े के खुलने की आवाज़ पर लड़के ने सिर उठाया। घबराया नहीं। जैसे रोज़ कोई आता हो।
“तू कौन है?” उसने पूछा।
“मन्नू,” मैंने कहा। “राघव का बेटा।”
लड़के के हाथ से लकड़ी छूट गई। उसने सुमन की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
“राघव… राघव अब नहीं है?”
“नहीं। भवानी अपने अस्पताल में ले गया था।”
लड़के ने बूढ़े की तरफ़ देखा। बूढ़े ने आँखें खोलीं, और फिर बंद कर लीं, जैसे वह जानता था कि यह रास्ता एक दिन यहीं आकर रुकेगा।
लड़का उठा। “मैं अमर हूँ,” उसने कहा। “भवानी का बेटा। और —” वह रुका, जैसे उस वाक्य को वह पहली बार बोल रहा हो — “राघव का बड़ा भाई।”
सुमन ने भीतर कदम रखा और सोहन के बिस्तर के पास पहुँची। “सोहन दादा?”
बूढ़े ने आँखें खोलीं।
“आपको मुझे पहचानना है,” सुमन ने कहा। “मैं नर्स सुमन नहीं हूँ।”
“तू सुमन हो,” बूढ़े ने धीरे से कहा। “जो रोज़ पीछे के गलियारे में सफ़ाई करती है।”
“आज मैं सफ़ाई नहीं करने आई,” सुमन ने कहा। “आज मैं आपको अपना नाम अदालत में बोलने के लिए लेने आई हूँ।”
बूढ़े ने अपना हाथ पकड़कर सुमन की कलाई पकड़ी। “पहले मेरी एक बात सुन। भवानी को मैंने अपनी आँखों से देखा है — रात को, इसी सीढ़ी पर, काग़ज़ जलाते हुए। और अब मैं ज़िंदा रहूँ या मरूँ, हिसाब बराबर।”
अमर ने दीवार से अपनी लाठी उठाई। “मैं चलूँगा। पर भवानी के सामने मैं सिर्फ़ बारह साल का बेटा बनूँगा — वो मेरी आदत है। तुम हिसाब मेरे से रखवाना, बात मेरे से मत करवाना।”
बंसी ने दरवाज़े से सिर डाला और खाँसा — नकली खाँसी, बहुत ज़ोर की। श्यामू का इशारा था। सुमन ने अमर की तरफ़ देखा और सिर्फ़ एक लाइन बोली।
“फ़ाइल मेरे पास है, अमर। तेरी आदत से बड़ी।”
हम बाहर निकले। गलियारे में श्यामू दीवार से चिपका खड़ा था। अमर उसे देखकर रुका। “तू भी आया?”
“मैं तो रोज़ आता था,” श्यामू ने कहा। “बस तुझे नहीं बताया।”
अमर ने कुछ कहना चाहा, फिर चुप हो गया, और आगे बढ़ गया। लेकिन गलियारे से बाहर निकलते वक़्त उसने अपना हाथ पीछे बढ़ाकर श्यामू का हाथ पकड़ लिया — जैसे कोई बच्चा अंधेरे से बाहर आते हुए अपने साथी की उँगली पकड़ता है।
सुमन ने चलते-चलते पर्ची अपनी जेब से निकाली और मे
॥
सुमन की पर्ची मेरे हाथ में आई तो स्याही उँगली पर लग गई। पुरानी स्याही, छूते ही फैल जाने वाली। मैंने पर्ची सूँघी — हल्की सी लोबान की बू, वही जो माँ के सामने के कमरे में जलती थी।
“पढ़ना उस वक़्त,” सुमन ने कहा। “पहले काम।”
हम ग्यारह लोग थे — गिनती नहीं करूँगा, क्योंकि आधे लोग गिनती में भरोसा रखते, मैं जेब में। दो घंटे की शर्त चल रही थी, यानी थोड़ा हिसाब से ज़्यादा बाकी था। बंसी आगे चल रहा था, श्यामू उसके कंधे से चिपका, और अमर — अमर सबसे पीछे, लाठी के सहारे, जैसे वो हमारे साथ नहीं, हमारी तरफ़ से बाहर जा रहा हो।
तहसील से निकलते वक़्त सुमन ने पर्ची देकर कहा था — “सोहन तक पहुँचने के लिए तेरी ज़रूरत है। बाकी मैं करूँगी।” मैंने पूछा क्यों मेरी। वह मुस्कुराई और बोली — “क्योंकि तू जेब में टोकन रखता है और गिनती भूल जाता है। बचने का इलाज है।”
अब हम होम की पीछे वाली गली में थे। चार फीट चौड़ी, दोनों तरफ़ ईंट की दीवारें, और दीवारों के बीच से खिसकता पानी जो जाने कहाँ से आ रहा था। श्यामू ने दीवार पर हाथ फेरा और एक जगह रुक गया।
“यहाँ,” उसने कहा। “यहीं शिकंजा ढीला है।”
“तू याद रखता है इतना?” बंसी ने पूछा।
“याद नहीं रखता।” श्यामू ने दीवार पर उँगली चलाई। “मैं इक्कीस बार सफ़ाई करता था इसके नीचे। हर बार सोचता — यह शिकंजा अगर मैं ढीला छोड़ दूँ, तो कोई न कोई एक दिन अंदर आएगा।”
“यानी तूने आज के दिन के लिए इंतज़ार किया।”
“नहीं, बंसी भाई। मैंने इस डर के लिए छोड़ा कि मैं जब भी जाऊँ, कोई मेरी खबर लेने अंदर आ सके।”
अमर ने बीच में आकर धक्का दिया और खिड़की बिना आवाज़ खुल गई। श्यामू ने पहले अपना हाथ अंदर डाला, फिर पैर, फिर मेरी तरफ़ मुड़कर इशारा किया। मैंने सोचा, बूढ़ा आदमी है, गिर जाएगा — पर वह अंदर सीधा उतरा, जैसे यह गलियारा उसके पैरों से पहचानता हो।
अंदर अंधेरा था, पर अंधेरा नहीं था — दूर किसी कमरे से पीली रोशनी आ रही थी, जो दीवारों पर केले के पत्तों जैसी छाया बना रही थी। सुमन पीछे आई और मेरे कान में बोली — “दाएँ मुड़ना है, यहाँ फिसलन है।”
“तूने देखा है यह रास्ता?”
“रोज़ झाड़ू उठाकर सोचती रही — यहाँ से क्या ज़रूरत है किसी की।”
हम मुड़े। दो सीढ़ियाँ ऊपर, एक नीचे, फिर एक दरवाज़ा जो खुला था। अंदर तीन बिस्तर थे, दो खाली, एक पर कोई बैठा था — घुटने सीने से लगाए, सिर झुकाए, सिर पर कंबल लपेटे।
“सोहन।” श्यामू का स्वर बदल गया, जैसे किसी पुराने भाई को जगा रहा हो।
कंबल के नीचे से आवाज़ आई, फटी हुई, जैसे किसी की ज़ुबान को ताले में बंद कर दिया गया हो।
“मैं नहीं हूँ।”
“सोहन, तू है। मैं श्यामू हूँ। रामदीन का भाई। तू ही मुझे चारपाई के नीचे काग़ज़ छिपाना सिखाता था।”
कंबल हटा। एक बूढ़ा चेहरा — आँखें पीली, गाल धँसे, दाढ़ी बेतरतीब। मुझे लगा जैसे किसी ने आदमी को उम्र से ज़्यादा बड़ा कर दिया हो, और उसका कुछ हिस्सा अंदर ही रख लिया हो।
“श्यामू?” उसकी आवाज़ काँपी। “तू मरा नहीं?”
“मरने की जल्दी किसे है, सोहन। भवानी के होम में जगह नहीं, मरने की भी।”
सोहन ने हम सब पर नज़र घुमाई, फिर दीवार पर टँगे कैलेंडर पर, फिर अपने हाथों पर। जैसे गिन रहा हो कि कितने साल कमरे में बंद رہے ہو۔
“कितने साल?” सुमन ने हल्के से पूछा। “सोहन दादा, कितने साल?”
“तारीख़ भूल गया।” उसने हथेली देखी, जैसे उस पर तारीख़ लिखी हो। “पर साल नहीं भूले। चार बार पानी की टंकी बदली। चार बार मैंने यहाँ सर्दी गिनी।”
“चार साल।” श्यामू ने मेरी तरफ़ देखा। “मैंने कहा था न, चार साल।”
“चार साल,” सोहन ने दोहराया। “और अब भी कोई नहीं पूछता कि सोहन कहाँ है। मेरा बेटा? वो भी भूल गया होगा।”
“तेरा बेटा तुझे ढूँढ रहा है,” सुमन ने कहा। “वो रज़िस्ट्रार के दफ़्तर में काम करता है। भवानी के अठारह मरीज़ों की कॉपी उसके पास है।”
सोहन की आँखों में कुछ हिला — डर नहीं, पहचान।
“उसने कॉपी रखी?”
“रखी है। और अब तेरे नाम की वजह से वो कॉपी अदालत में जाएगी।”
सोहन ने अपना हाथ उठाया, जैसे सुमन को रोकना हो। “नहीं। भवानी… भवानी कहेगा मैं मरा हुआ हूँ।”
“तू ज़िंदा है, सोहन। यही सबसे बड़ा सबूत है।”
मैंने बीच में आकर हाथ बढ़ाया। “सोहन भाई, उठ। मेरे साथ चल।”
सोहन पीछे हटा। कंबल फिर से सीने से चिपका लिया। “तू कौन है?”
“मन्नू। किशनचंद का बेटा।”
सोहन की आँखें फैलीं। “किशनचंद… किशनचंद का बेटा?” उसने मेरा चेहरा ध्यान से देखा, फिर श्यामू की तरफ़ देखा, फिर फिर मेरी तरफ़। “वो नहीं आया?”
“नहीं। अब वो नहीं आता।”
सोहन ने कंबल पकड़कर खींचा और कमरे की दीवार से लग गया। “तो मैं भी नहीं जाता। ठाकुर साहब ने कहा था — जिस दिन किशनचंद का नाम बाहर जाएगा, उस दिन मैं मरा हुआ हूँ। मरा हुआ आदमी कहीं नहीं जाता।”
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