The Token System646 / 1154

The Token System – Chapter 646

6 min read November 6, 2026

“वो ज़िंदा है?” बंसी ने पूछा।

“मुझे नहीं पता,” हरीश चंद्र ने कहा। “मैंने उसे उन्नीस साल पहले आख़िरी बार देखा था। वो उस वक़्त रो रहा था। उसने मुझसे कहा था — जिस दिन मेरा हिसाब खुलेगा, मैं हवेली की छत पर खड़ा मिलूँगा। उसके बाद कुछ नहीं।”

मैंने अपने काग़ज़ फैलाए। हरीश चंद्र ने एक-एक उठाकर पढ़ा। उसने उन्नीस लकीरों वाला काग़ज़ दोनों हाथों में पकड़ा, दूर किया, करीब किया।

“यह चलेगा,” उसने कहा। “अदालत में। पर अकेला नहीं।”

“मतलब?”

“मतलब,” उसने कहा, “इस काग़ज़ से सिर्फ़ ये साबित होगा कि हिसाब में कोई नाम छिपा। हवेली पर हक़ साबित नहीं होगा। उसके लिए जमुना देवी को ख़ुद आना पड़ेगा, अपना हिस्सा ज़ाहिर करना पड़ेगा — ज़ुबानी और काग़ज़ी, दोनों से।”

“जमुना तैयार है,” मैंने कहा।

“फिर रजिस्टर?” हरीश चंद्र ने पूछा।

“दीवार में है,” मैंने कहा। “हवेली की उत्तर वाली दीवार के पीछे, छिपे कमरे में।”

हरीश चंद्र ने चश्मा उतारा और मेज़ पर रख दिया। “तो सुन,” उसने कहा। “उसे अपने हाथ से मत निकालना।”

“क्यों?”

“क्योंकि अगर तूने निकाला,” हरीश चंद्र ने कहा, “तो अदालत कहेगी — तुमने बनाया। तुमने रखा। तुमने छिपाया। रजिस्टर तभी चलेगा जब अदालत की निगरानी में, अदालत के आदमी के सामने, सीलबंद कमरे से निकले। एक गवाह, एक मुहर, एक तस्वीर।”

“मगर तारीख़ कल है,” बंसी ने कहा। “अर्ज़ी पर कल की तारीख़।”

“तारीख़ अर्ज़ी की है,” हरीश चंद्र ने कहा, “रजिस्टर की नहीं। हवेली गिराने की अर्ज़ी पर मुहर लगी है — पर मुहर माने क्या? मुहर का मतलब है फ़ैसला हो चुका। और फ़ैसला हवेली के उस हिस्से पर है जो जर्जर है।”

“तो?”

“तो कल हमें अर्ज़ी पर रोक लगवानी है,” हरीश चंद्र ने कहा। “और रोक लगाने के लिए हमें आज रात जज साहब के पास जाना पड़ेगा।”

“जज साहब?” मैंने कहा।

“मेरा साथी है,” हरीश चंद्र ने कहा। “साठ साल का। सेवानिवृत्त हो चुका। पर अभी भी सुनता है।”

हरीश चंद्र उठा और दीवार पर टँगी तस्वीर के पास गया। उसने तस्वीर को हटाया और पीछे की दराज़ से एक मोटी फ़ाइल निकाली।

“ये क्या है?” मैंने पूछा।

“तेरे दादा का पहला केस,” हरीश चंद्र ने कहा। “सालों पहले, जब हरि सिंह ने हवेली के काग़ज़ छीने थे। उन दिनों तेरे दादा के पास कोई सबूत नहीं था। मैंने केस जीता नहीं, बस एक रोक लगवाई थी — कोई काग़ज़ न बिके। तेरे दादा ने उसी दिन एक काग़ज़ छोड़ा था, मेरे नाम, जिसमें लिखा था — 'मेरा बेटा आएगा, तो उसे बताना'।”

“बताना क्या?”

हरीश चंद्र ने फ़ाइल खोली और उससे एक पुराना पीला काग़ज़ निकाला। उस पर दादा की लिखाई थी — मैं पहचान गया।

“इसमें लिखा है,” हरीश चंद्र ने कहा, “‘हरीश, अगर मेरा बेटा या पोता आए, तो उसे बताना कि काग़ज़ अदालत से नहीं, अदालत के लिए लड़ा जाता है। और अदालत में सच के लिए जगह पहले से बुक नहीं होती — वो लड़नी पड़ती है।'”

मैंने काग़ज़ बंसी को दिखाया। उसने पढ़ा और अपने होंठ काटे।

“तो अब?” मैंने पूछा।

“अब,” हरीश चंद्र ने कहा, “हमें जज साहब को उठाना है। तीन बजे रात।”

“तीन बजे?”

“क्योंकि भवानी तीन बजे से पहले अपनी अर्ज़ी पुख़्ता कर देगा,” हरीश चंद्र ने कहा। “ये खेल समय का है, अब सिर्फ़ काग़ज़ का नहीं।”

रास्ते में बंसी कुछ सोचता रहा। फिर बोला, “हरीश चंद्र ने कहा किशोरी लाल तेरे दादा का भाई है। तो माँ क्यों डरती है?”

“शायद,” मैंने कहा, “क्योंकि किशोरी लाल वो आदमी है जिसने हमें कभी हवेली की छत पर मिलने को कहा था।”

बंसी रुक गया। “क्या कहा था उस पर्ची पर?”

“तस्वीर में बीच वाला आदमी तेरा नहीं, मेरा है,” मैंने कहा। “आज दस बजे तहसील में मिलूँगा। तीसरा।”

“तो किशोरी लाल ही तीसरा है,” बंसी ने कहा। “और तीसरा ही वो आदमी है जिसने तेरे पापा वाली रात गाड़ी में बैठा था।”

मैंने अपने कदम रोक लिए। सामने हरीश चंद्र की गली थी, जो पुराने बाज़ार से जुड़ती थी। मेरे जेब में टोकन ठंडा था, पर मेरी उँगलियाँ फिर भी गरम।

“तो अब साफ़ हो गया,” मैंने कहा।

“क्या?”

“तीसरा ही हमारा दुश्मन है। और वो ही चौथा नाम है।” मैंने अपना काग़ज़ देखा। “और अगर किशोरी लाल तीसरा है, तो उसका नाम अदालत में खुलते ही वो मेरे दादा का भाई साबित हो जाएगा।”

“और तेरे दादा पर चोरी का इल्ज़ाम?” बंसी ने पूछा।

“वही,” मैंने कहा। “किशोरी लाल शायद यही कह रहा है।”

“क्या?”

“कि हमारे दादा ने हिसाब छिपाया है,” मैंने कहा। “और शायद हरीश चंद्र भी यही कह रहा है।”

हम हरीश चंद्र के दरवाज़े से निकलकर तीन बजे की तैयारी में लग गए।

रात के तीन बजे हरीश चंद्र की गली सुनसान थी। एक कुत्ता दूर किसी गली में भौंक रहा था, बस वही आवाज़ थी। बंसी ने अपनी जेब से सिगरेट निकाली, फिर याद आया कि हरीश चंद्र ने मना किया था — “मेरे घर के सामने मत पीना, मेरी तुलसी नाराज़ होती है।” उसने सिगरेट वापस रखी।

“जज साहब कहाँ रहते हैं?” मैंने पूछा।

“पीछे की गली में,” बंसी ने कहा। “पेंशन वाला मकान। बाहर से देखकर लगेगा कोई मर चुका है — पर जज साहब सोते नहीं।”

“सोते नहीं?”

“रात भर बैठकर फ़ाइलें पढ़ते हैं। कहते हैं, अब सुनने की बारी उनकी नहीं रही, पर पढ़ने से कोई रोक नहीं सकता।”

हम पीछे की गली में मुड़े। तीसरे मकान के बाहर बंसी रुका और दरवाज़े पर तीन बार थपथपाया — दो बार धीरे, एक बार ज़ोर से। अंदर से कोई हिला नहीं। वह फिर थपथपाया, उसी तरतीब से।

दरवाज़ा खुला। सामने एक आदमी खड़ा था — सफ़ेद शर्ट, मुँह पर बिना चश्मे के, हाथ में लालटेन।

“बंसी,” उसने कहा। “तू जानता है मैं किस वक़्त नहीं उठता?”

“जानता हूँ,” बंसी ने कहा। “तभी उस वक़्त आया हूँ।”

जज साहब ने मेरी तरफ़ देखा। “ये?”

“नंदू,” बंसी ने कहा। “जमुना देवी का बेटा।”

जज साहब की आँखें एक पल के लिए रुकीं। “जमुना देवी का बेटा मेरे दरवाज़े पर आज नहीं, बीस साल बाद आया है।” उसने दरवाज़ा पूरा खोल दिया। “अंदर आओ। चाय रखी है, ठंडी हो गई होगी।”

अंदर कमरे में किताबें थीं — ज़मीन से छत तक, किसी फ़िल्म के दृश्य जैसा। एक कोने में एक ही कुर्सी थी जिस पर कोई बैठ सके, बाकी सब काग़ज़ों से भरी थीं। जज साहब ने काग़ज़ों की एक गड्डी उठाई और मेज़ के कोने पर रख दी।

“बोलो,” उन्होंने कहा। “तीन बजे कोई आता है तो ज़रूर दाल में कुछ काला है। वरना लोग सुबह आते हैं — मुफ़्त सलाह लेने, और मेरा भी सुबह के बाद ही नींद आता है।”

बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने काग़ज़ आगे किया।

जज साहब ने काग़ज़ पढ़ा। पूरा पढ़ा — शुरू से आख़िर तक, दो बार। फिर उसने काग़ज़ मेज़ पर रखा और लालटेन की लौ कम की।

“हरीश चंद्र ने भेजा?” उसने पूछा।

“हмаरे पास भेजने का और कोई नहीं था,” मैंने कहा।

“हरीश चंद्र के पास भेजने का कोई और नहीं है,” जज साहब ने कहा। “वो ख़ुद बता नहीं सकता, इसलिए तुम्हें सिखा रहा है। सोचता है, मैं मना नहीं करूँगा।”

“आप मना करेंगे?” बंसी ने पूछा।

जज साहब ने मेरी तरफ़ देखा। “तू जानता है तेरी माँ हवेली में क्यों अकेली रहती है?”

मैंने सिर हिलाया — नहीं।

“क्योंकि तेरे पापा मरे नहीं थे,” जज साहब ने कहा। “वो भाग गए थे। और भागने वाले के घर वाले अकेले रह जाते हैं।”

कमरे में हवा भारी हो गई। बंसी ने अपनी कुर्सी थोड़ी पीछे सरकाई।

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