The Token System – Chapter 643
कमरे में सन्नाटा छा गया। बंसी ने फ़ोटो वापस मेज़ पर रखा और अपने हाथ पतलून से पोंछे, जैसे कुछ गंदा छू लिया हो।
"मन्नू," उसने धीरे से कहा, "तेरे दादा ने सब जानते हुए भी भवानी को अपने साथ रखा?"
"शायद उस वक़्त भवानी दुश्मन नहीं था," मैंने कहा। "दुश्मन वो बाद में बना।"
मैंने काग़ज़ों का बंडल उठाया। सबसे ऊपर एक और नक़्शा था, छोटा, जिस पर सिर्फ़ तहखाने का रास्ता बना था। और उस रास्ते के आख़िर में एक कमरा था जिस पर एक ही शब्द लिखा था — "कुआँ।"
"कुआँ?" बंसी ने पढ़ा। "हवेली के नीचे कुआँ?"
"तेरे घर के पीछे वाला कुआँ," मैंने कहा। "वही जो सूखा पड़ा है।"
बंसी का चेहरा बदल गया। "मेरे घर के पीछे वाला कुआँ? मतलब सुरंग हमारे घर तक जाती है?"
"नहीं," मैंने नक़्शे को गौर से देखा। "सुरंग हवेली के तहखाने से निकलकर कुएँ तक जाती है। और कुआँ तेरे घर के पीछे है। यानी जो भी तहखाने में जाना चाहता है, वो तेरे घर के पीछे से भी जा सकता है।"
बंसी ने अपना सिर पकड़ लिया। "तो मेरा घर ख़तरे में है। आज भी।"
"इसीलिए भवानी का आदमी रात भर शेखर बाबू के घर के बाहर खड़ा था," मैंने कहा। "वो हमें रोक नहीं रहा था। वो देख रहा था कि हम रास्ता ढूँढ लें या नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि भवानी को ख़ुद रास्ता नहीं पता।" मैंने नक़्शा मोड़ा। "वो चाहता है कि हम रास्ता ढूँढें, और फिर वो हमारे पीछे-पीछे तहखाने तक पहुँच जाए।"
बंसी ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, पर तभी ऊपर से आवाज़ आई — दरवाज़ा खुलने की। और फिर पैरों की आहट, धीमी, सँभली हुई।
बंसी ने माचिस बुझा दी। अंधेरा कमरे में फैल गया।
"कोई ऊपर आया है," बंसी ने फुसफुसाया।
मैंने सीढ़ियों की तरफ़ कान लगाया। आहट रुक गई, फिर शुरू हुई — और ये आहट कमरे में घुस रही थी, उसी खिड़की वाले दरवाज़े से।
बंसी ने मेरी कलाई पकड़ ली। "अब?"
मैंने काग़ज़ों का बंडल संदूक में वापस रखा और चिट्ठी अपनी जेब में डाली। फिर मैंने ढक्कन धीरे से नीचे किया और बंसी को नीचे जाने का इशारा किया।
"पर वो ऊपर आ रहा है," बंसी ने कहा। "हम फँस जाएँगे।"
"नहीं," मैंने कहा। "याद है, तेरे घर के पीछे वाला कुआँ? अब जाना है वहीं से।"
बंसी मुझे घूरने लगा। "तो तू कह रहा है कि हम उसी रास्ते से भागें जिसे हम अभी ढूँढ ही रहे थे?"
"हाँ," मैंने कहा। "और अब हमें पता भी है कि रास्ता अपने पीछे बंद कैसे करना है।"
हम नीचे उतर गए और ढक्कन बंद कर दिया। सीढ़ियों की आहट ऊपर चलने लगी — कोई ऊपर वाले कमरे में घुसा था। मैंने बंसी का हाथ खींचकर गलियारे के आख़िर में जाने वाले रास्ते की तरफ़ बढ़ाया।
अंधेरे में चलते हुए मुझे सिर्फ़ बंसी की साँसें सुनाई दे रही थीं। नक़्शे में जो सुरंग कुएँ तक जाती थी, वो कहीं और से मुड़ती थी। हमें दीवार के सहारे-सहारे चलना पड़ा।
कुछ दूर चलने पर गलियारा चौड़ा हुआ और सामने ऊपर की तरफ़ रोशनी दिखी। बंसी ने देखा और फुसफुसाया।
"ये तो रोशनी है।"
"कुएँ का मुँह," मैंने कहा और सीढ़ियाँ ढूँढीं।
हम ऊपर चढ़ते हुए बाहर निकले। कुएँ के बगल में बंसी के घर की पिछली दीवार थी और सामने खुला आँगन। धूप लग रही थी।
बंसी ने अपने फटे कुर्ते को झाड़ा और आसमान की तरफ़ देखा। "कभी सोचा नहीं था कि सूखा कुआँ काम आएगा।"
"तेरे ख़ानदान का कुआँ है," मैंने कहा। "इसका काम तो होगा ही।"
उसी वक़्त पीछे से आवाज़ आई।
"मन्नू!"
हम दोनों चौंके। पीछे माँ खड़ी थी, हाथ में एक थाली, जिसमें रोटियाँ रखी थीं। उसने हम दोनों को सिर से पैर तक देखा — धूल में लिपटे, हाँफते हुए।
"ये कैसी हालत है?" माँ ने पूछा। "सुबह से तू घर पर नहीं। कहाँ था?"
"माँ," मैंने कहा और आगे बढ़ा। "तुझे एक बात पूछनी है।"
"पहले हाथ-मुँह धो," माँ ने कहा। "फिर पूछ।"
"दादा ने तुझे कभी उस खिड़की के बारे में कुछ बताया था?"
माँ के हाथ से थाली ज़रा हिली। उसने मेरी तरफ़ देखा और फिर नज़र नीचे कर ली।
"क्यों पूछ रहा है?"
"माँ," मैंने कहा और उसकी तरफ़ एक कदम बढ़ाया। "दादा ने ये खिड़की बनाई थी। कुछ छिपाने के लिए। और तू जानती है कि क्या।"
माँ ने थाली बंसी की तरफ़ बढ़ा दी और हमें घर के अंदर चलने का इशारा किया। अंदर आकर उसने दरवाज़ा बंद किया।
"तेरे दादा ने मुझसे वादा लिया था," माँ ने धीरे से कहा। "कि जब तक तू ख़ुद न पूछे, मैं कुछ नहीं बताऊँगी।"
"मैं पूछ रहा हूँ," मैंने कहा।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था, पर आवाज़ साफ़ थी।
"तेरे दादा ने खिड़की इसलिए नहीं बनाई थी कि वो कुछ छिपाना चाहते थे," माँ ने कहा। "उन्होंने वो खिड़की इसलिए बनाई थी कि कोई और उस रास्ते से अंदर न आ सके।"
"कौन?" मैंने पूछा। "भवानी?"
"भवानी नहीं," माँ ने कहा। "तेरे दादा ने खिड़की उस दिन बनवाई थी जिस दिन भवानी के बाप ने हमारी हवेली की ज़मीन पर दावा ठोका था। दावा झूठा था, पर उसमें दम था। दादा को लगा कि काग़ज़ात कहीं सुरक्षित नहीं हैं। और तहखाने का रास्ता तो तब से था — हमारे पुरखों के ज़माने से।"
"माँ," बंसी ने कहा, "उस तहखाने में रजिस्टर है। और उसमें भवानी के ससुर का नाम भी है।"
माँ ने बंसी की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सख़्त हो गया।
"तो तुमने वो पढ़ लिया," माँ ने कहा। "जो दादा ज़िंदगी भर छिपाते रहे।"
"माँ," मैंने कहा, "वो रजिस्टर अब भवानी के हाथ लग सकता है। उसका आदमी हवेली में है। अभी।"
माँ ने एक गहरी साँस ली और फिर उसने अपने गले से कुछ निकाला — एक चाबी, जो एक पुरानी रस्सी में पिरोई थी।
"ये खिड़की की नहीं है," माँ ने कहा। "ये उस कोठरी की है जो तहखाने के रास्ते में है। तेरे दादा ने इसे मुझे दिया था, उस दिन जिस दिन वो बीमार पड़े।"
मैंने चाबी ली। वो मेरी जेब में रखे टोकन के पास गई, और उसी वक़्त मुझे लगा कि दोनों में कुछ है — वो नहीं, ये नहीं — पर कुछ।
मैंने सोचा कि पूछूँ, पर माँ ने खुद कहा।
"तेरे दादा कहते थे — इस चाबी में सिर्फ़ एक ताला नहीं खुलता।"
मैंने चाबी मुट्ठी में बंद कर ली और बंसी की तरफ़ देखा।
"अब मुझे नक़्शा फिर से देखना है," मैंने कहा।
॥
मैंने नक़्शा मेज़ पर फैलाया और उँगली कोने की तरफ़ सरकाई जहाँ से बंसी ने कल रात रोशनी में कुछ पढ़ा था। धूप खिड़की से आ रही थी और काग़ज़ पीला पड़कर और भी पुराना लग रहा था।
“यहाँ,” बंसी ने उँगली रखी। “ये नाम।”
मैंने आँखें सिकोड़ीं। बारीक लिखाई थी, स्याही भूरी हो चुकी थी, पर अक्षर साफ़ थे — ठाकुर हरि सिंह।
“भवानी का दादा,” मैंने कहा।
माँ चूल्हे के पास खड़ी थी। उसने पीछे से ही कहा, “ये नाम मैंने पहली बार देखा है।”
“कब का है ये हिस्सा?” बंसी ने पूछा।
मैंने काग़ज़ को उलटा किया। पीछे भी लिखाई थी, उसी बारीक हाथ से, पर ये स्याही थोड़ी ताज़ी लग रही थी — नीली नहीं, धुँधली काली।
“शेखर बाबू से पूछना पड़ेगा,” मैंने कहा। “ये इमारत का नक़्शा है, इसे बनाने वाला ही बता पाएगा कौन सा हिस्सा बाद में जुड़ा।”
माँ ने रोटी थाली में रखी और मेरी तरफ़ देखा। “पहले खा ले। फिर जो करना है कर।”
“माँ, देर नहीं है।”
“देर कोई अपने मुँह से नहीं कहता।”
मैंने एक रोटी जल्दी खाई, पानी पिया और बंसी को इशारा किया। निकलते वक़्त माँ ने मेरी जेब में कुछ ठूँसा। चाबी थी — वो ही रस्सी वाली। मैंने मुड़कर देखा, पर माँ दरवाज़ा बंद कर चुकी थी।
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