The Token System – Chapter 641
चाय का गिलास मेरे हाथ में ठंडा हो रहा था और बंसी मेरे सामने बैठा अपने फटे होंठों पर ज़ुबान फेर रहा था। मैंने गिलास नीचे रख दिया।
"मैं पड़ोसी की छत से उस खिड़की का ताला तोड़ देता हूँ।"
बंसी का हाथ रुका। उसने गिलास पटक दिया, चाय छलककर खटिया पर फैल गई।
"ताला तोड़ा तो चोरी का केस तेरे नाम।" उसने मेरी तरफ़ उँगली उठाई। "और भवानी को क्या चाहिए? बस यही — तेरा नाम गंदा हो जाए। फिर तेरी गवाही का कोई मोल नहीं रहेगा।"
"तो क्या करूँ? बैठा रहूँ?"
"पहले तहसील।" बंसी उठ खड़ा हुआ, कमर पर हाथ रखे। "देखते हैं काग़ज़ क्या कहते हैं। रजिस्टर चोरी से निकाला तो वो सबूत नहीं रहेगा, लानत बन जाएगा।"
मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था। आठ हज़ार का अंक नहीं बदला था।
"तेरे हाथ में क्या है?" बंसी ने पूछा।
"कुछ नहीं। चल।"
सुबह की हवा में धूल थी। सड़क पर पानी का छींटा फिर भी नहीं आया था। हम तहसील के गेट पर पहुँचे तो सूरज निकल चुका था और चपरासी झाड़ू लगा रहा था। शेखर बाबू का कमरा खुला था, पर वो कुर्सी पर नहीं बैठा था।
वो खिड़की के पास खड़ा था, हाथ में चश्मा पकड़े, और खिड़की से बाहर झाँक रहा था।
"शेखर बाबू।"
वो घूमा। उसका चेहरा पीला था, आँखों के नीचे काला।
"रात भर वो आदमी मेरे घर के बाहर खड़ा रहा," उसने कहा। आवाज़ धीमी थी। "काली शर्ट। सिगरेट नहीं पी रहा था, बस खड़ा था। मेरी बीवी डर गई। मैंने दरवाज़ा नहीं खोला।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्या चाहता था?"
"कुछ नहीं बोला।" शेखर बाबू ने चश्मा पहना। "पर जब मैं सुबह निकला, तो गेट पर ये पड़ा था।"
उसने मेज़ की दराज़ खोली और एक मुड़ा काग़ज़ निकाला। इसमें सिर्फ़ एक लाइन थी — "काग़ज़ जो तूने निकाले, वो तेरे घर से निकलेंगे।"
मैंने काग़ज़ बंसी को दिया। उसने पढ़कर मेज़ पर रख दिया।
"शेखर बाबू," मैंने कहा। "पुराने नक़्शों का कमरा कहाँ है?"
उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर बंसी की तरफ़। "तुम्हें क्या चाहिए?"
"हवेली का नक़्शा।"
वो थोड़ी देर खड़ा रहा। फिर उसने कुर्सी से अपनी चाबियों का गुच्छा उठाया। "पीछे से चलो। सामने से कोई देखेगा।"
पीछे की गली से हम तहसील की पिछली इमारत तक पहुँचे। शेखर बाबू ने धूल भरा ताला खोला और अंदर घुसे। कमरा छोटा था, दीवारों पर लकड़ी के रैक पड़े थे जिन पर मोटे काग़ज़ों के बंडल धागे से बँधे रखे थे। फर्श पर सीलन थी और सीलन की बदबू थी।
"यहाँ कोई नहीं आता," शेखर बाबू ने कहा। "पच्चीस साल से।"
वो दूसरे रैक की तरफ़ बढ़ा, नीचे की तरफ़ झुका और एक मोटा लपेटा हुआ काग़ज़ निकाला। उसने उसे मेज़ पर रखा और खोला।
हवेली का नक़्शा था। पुराना, पीले काग़ज़ पर भूरी स्याही में बना। नीचे कोने में नंबर लिखा था — तीन सौ सत्ताईस।
मैंने नक़्शे पर उँगली फेरी। पहली मंज़िल का हिस्सा बना था, आँगन, कुएँ का घेरा, पिछवाड़ा। और एक जगह — मेरी उँगली रुक गई।
पिछवाड़े की तरफ़ एक खिड़की बनी थी, जिसका रंग बाकी नक़्शे से अलग था। गाढ़ा नीला। बाकी सब भूरा।
"ये नीला रंग क्यों है?" मैंने पूछा।
शेखर बाबू झुका और देखने लगा। उसने चश्मा उतारा, आँखें सिकोड़ीं, फिर लगाया।
"ये… ये बाद में बना है।" उसने धीरे से कहा। "देखो, बाकी लकीरें पतली हैं, ये मोटी है। स्याही भी नई लगती है — मतलब पुरानी नक़्शे के बाद की।"
बंसी ने आगे झुककर देखा। "मतलब कोई बाद में आकर ये हिस्सा जोड़ गया?"
"जोड़ा नहीं," मैंने कहा। "देखो — असली हवेली की दीवार यहाँ से मुड़ती है। ये खिड़की दीवार के बाहर निकली हुई है। ये हिस्सा हवेली का है ही नहीं।"
शेखर बाबू ने काग़ज़ के कोने की तरफ़ देखा जहाँ कुछ छोटा लिखा था। उसने उँगली रखी।
"यहाँ कुछ लिखा है।" उसने मुझे करीब बुलाया। "पढ़ो।"
मैं झुका। कोने पर छोटी स्याही में एक नाम लिखा था, और उसके नीचे तारीख़।
"ये नाम —" मैंने शेखर बाबू की तरफ़ देखा। "ये रामदीन का है।"
शेखर बाबू ने सिर हिलाया। "मिस्त्री रामदीन। जिसने हवेली बनाई थी। पर ये खिड़की उसने नहीं बनाई — ये तो बाद की है। तारीख़ देखो, नक़्शे की तारीख़ से पंद्रह साल बाद की।"
"मतलब किसी ने रामदीन के बाद ये खिड़की जोड़ी," बंसी ने कहा। "और उसका नाम भी रामदीन के नाम के नीचे लिख दिया, ताकि लगे सब उसी का काम है।"
मैंने नक़्शे को करीब से देखा। खिड़की के ठीक नीचे एक और छोटी लकीर थी जो दीवार से जुड़ती थी और दीवार के अंदर जाकर खत्म हो जाती थी।
"ये क्या है?" मैंने उँगली रखी।
शेखर बाबू ने आँखें सिकोड़ीं। "ये… ये कोई रास्ता है। दीवार के अंदर से।"
मेरी साँस रुक गई।
"दीवार के अंदर से कहाँ जाता है?"
"नीचे।" शेखर बाबू की उँगली नक़्शे पर चली। "यहाँ। हवेली के नीचे।"
बंसी ने मेरी कलाई पकड़ी। "मन्नू।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"याद है, माँ ने क्या कहा था? वो पुरानी खिड़की का ताला — उस पर पापा का नाम खुदा था। और माँ ने कहा था कि ये सब दादा ने छिपाया था।"
मैंने नक़्शे पर उँगली रखी, ठीक उस खिड़की पर जो नीले रंग में बनी थी।
"यह खिड़की बाद में जोड़ी गई है," मैंने कहा। "और इसे जोड़ने वाले का नाम नक़्शे के कोने पर लिखा है।"
शेखर बाबू ने काग़ज़ के उस कोने को करीब लाया जहाँ नाम लिखा था। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"ये नाम रामदीन का है, पर लिखाई रामदीन की नहीं है।" उसकी आवाज़ काँपी। "मैं रामदीन की लिखाई पहचानता हूँ। ये किसी और ने लिखा है।"
"कौन?"
शेखर बाबू ने काग़ज़ को रोशनी की तरफ़ उठाया। "मुझे तो ये लिखाई… तेरे दादा की लगती है।"
मेरे हाथ से नक़्शा छूटने लगा। बंसी ने पकड़ लिया।
"दादा ने खिड़की जोड़ी?" मैंने कहा। "तो वो खिड़की के पीछे क्या छिपा रहे थे?"
तभी बाहर गलियारे में पैरों की आवाज़ आई। शेखर बाबू ने जल्दी से नक़्शा लपेटा और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"ले। छिपा।"
मैंने नक़्शा कुर्ते के अंदर डाल लिया। दरवाज़ा खुला और एक चपरासी अंदर झाँका।
"शेखर बाबू, नीचे कोई आपसे मिलने आया है। कह रहा है ऊपर के दफ़्तार से आया है।"
शेखर बाबू का चेहरा फिर पीला पड़ गया। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"तुम दोनों पीछे के दरवाज़े से निकलो। अभी।"
"कौन है?" बंसी ने पूछा।
"मत पूछो। निकलो।"
हम पीछे के दरवाज़े से निकले। नीचे सीढ़ियों के मोड़ पर मैंने रुककर झाँका। तहसील के आँगन में एक सफ़ेद कुर्ते वाला लंबा आदमी खड़ा था, हाथ में ब्रीफ़केस। उसके पीछे दो और आदमी थे, काली शर्ट में।
बंसी ने मेरी बाँह खींची।
हम पिछली गली से निकलकर सड़क पर आए। मैंने कुर्ते के अंदर से नक़्शा निकाला और फिर से उस कोने को देखा।
"बंसी।"
"हाँ।"
"अगर ये खिड़की दादा ने जोड़ी, तो इसका मतलब है कि वो कुछ छिपाना चाहते थे। और जो छिपाया, वो अभी भी उस खिड़की के पीछे है।"
बंसी ने नक़्शे को ध्यान से देखा। "पर माँ ने कहा था कि खिड़की का ताला आठ साल से बंद है। कोई नहीं खोल सका।"
"कोई नहीं खोल सका क्योंकि चाबी नहीं थी।" मैंने नक़्शे को मोड़ा। "पर अगर वो रास्ता दीवार के अंदर से नीचे जाता है, तो चाबी की ज़रूरत ही नहीं।"
बंसी रुका। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"तू कहना क्या चाहता है?"
"मैं कहना चाहता हूँ कि वो खिड़की खोलने की ज़रूरत नहीं। उसके नीचे जो सुराख है, उससे नीचे उतरा जा सकता है।"
बंसी ने अपना सिर खुजाया। "और वो जगह?"
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