The Token System640 / 1154

The Token System – Chapter 640

6 min read November 6, 2026

"अगर एक पकड़ा जाए," सुमन ने कहा, "तो बाकी दो बचेंगे।"

मैंने सिर हिलाया। फिर मैंने टोकन जेब से निकाला।

"क्या कर रहे हो?" सुमन ने पूछा।

"कुछ नहीं," मैंने कहा और टोकन वापस जेब में डाल दिया। ठंडा था। मगर मेरी उँगली पर एक हल्की गरमाहट आई थी — जैसे कोई मुझे देख रहा हो।

तभी खिड़की पर खटका हुआ।

हम तीनों रुक गए। बंसी ने बल्ब बुझाया। मैंने अलमारी के पीछे छिपकर खिड़की से झाँका। बाहर गली में सफ़ेद जीप खड़ी थी और दो आदमी दरवाज़े की तरफ़ बढ़ रहे थे।

"भैया के आदमी," मैंने धीरे से कहा।

"कितने?"

"दो दिख रहे हैं। जीप में शायद तीसरा।"

बंसी ने अलमारी की तरफ़ देखा। "पिछली खिड़की का सामान उठाओ।"

"क्या?"

"पुरानी साइकिल रखी है। उस पर ढेबर और रामकिशन को पीछे बैठाकर पीछे की गली से निकलो। सुमन साथ जाएगी।"

"और तू?"

"मैं उन्हें यहाँ रोकूँगा।"

"बंसी —"

"सुन," बंसी ने मेरा कंधा पकड़ा। "तू अगर यहाँ फँसा, तो काग़ज़ कौन ले जाएगा तहसील? मैं दुकान का मालिक हूँ। मेरी दुकान में आए हैं। मैं उनसे निपट लूँगा।"

मैंने उसकी आँखों में देखा। वो हँस रहा था — वही पुरानी हँसी।

"जा," उसने कहा।

मैंने ढेबर का हाथ पकड़ा। सुमन ने रामकिशन को उठाया। हम पिछली खिड़की से निकले। साइकिल वहीं थी। ढेबर को पीछे बैठाया और सुमन ने रामकिशन को संभाला।

"कहाँ?" सुमन ने पूछा।

"अस्पताल," मैंने कहा। "तुम्हारे कमरे के पीछे वाली गली। वहाँ कोई नहीं आएगा।"

साइकिल चली। पीछे से किसी के चिल्लाने की आवाज़ आई। मैंने पैडल मारे। मोहल्ले की गलियाँ रात में साँप जैसी लिपटी हुई लग रही थीं — हर मोड़ पर अंधेरा और हर अंधेरे में एक ख़तरा।

अस्पताल की पिछली गली में सुमन के कमरे के पीछे एक छोटा शेड था। हमने साइकिल वहाँ छिपाई। सुमन ने दरवाज़ा खोला और अंदर ले गई।

"इन्हें यहाँ रखो," उसने कहा। "मैं सुबह छह बजे आऊँगी। तब तक कोई बाहर नहीं निकलेगा।"

ढेबर ने दीवार से टेक लगाई। "मन्नू," उसने कहा। "तू अब भी वहाँ जाएगा या नहीं?"

"कहाँ?"

"भवानी के होम। उसका बेटा। जिसका नाम उन्नीसवीं लकीर पर है। अगर वो कल तहसील नहीं आया, तो काग़ज़ अधूरा रहेगा।"

मैं रुका। यह बात मेरे दिमाग़ में नहीं आई थी।

"तो?"

"तो उसे लाना पड़ेगा।"

मैंने ढेबर की तरफ़ देखा। "तू कह रहा है कि मैं भवानी के होम जाऊँ? अकेले? रात में?"

"मैं जानता हूँ ये पागलपन है," ढेबर ने कहा। "पर भवानी का बेटा अगर कल नहीं आया, तो भवानी कहेगा — ये काग़ज़ झूठे हैं।"

"और अगर मैं गया और वापस नहीं आया?"

"तो मैं खुद जाऊँगा," ढेबर ने कहा। "इन टाँगों के साथ भी।"

मैंने सुमन की तरफ़ देखा। वो चुप थी।

"मैं जा रहा हूँ," मैंने कहा। "पर एक शर्त पर। अगर सुबह सात बजे तक नहीं लौटा, तो तुम खुद काग़ज़ लेकर तहसील जाना। मुझे मत ढूँढना।"

सुमन ने मेरा हाथ पकड़ा। "मन्नू —"

"सात बजे," मैंने दोहराया। फिर पलटा और रात में निकल गया।

भवानी के होम के पीछे वाली गली में सन्नाटा था। सर्विस गली की ईंट की दीवार पर चढ़कर मैंने दूसरी मंज़िल की खुली खिड़की देखी। वहीं से मैं पहले भी घुसा था।

मैंने चढ़ना शुरू किया। ईंटें चिकनी थीं पर मेरे हाथ पहले से जानते थे कहाँ पकड़ना है। खिड़की तक पहुँचकर मैं रुका। अंदर अंधेरा था, मगर दूर किसी कमरे से रोशनी की एक पतली लकीर आ रही थी।

मैं अंदर उतरा। कमरा वही था जहाँ सरोज बंद थी। अब खाली था।

दालान पार करके मैं उस कमरे की तरफ़ बढ़ा जहाँ रोशनी थी। दरवाज़ा थोड़ा खुला था। मैंने अंदर झाँका।

एक आदमी कुर्सी पर बैठा था, सामने मेज़ पर काग़ज़ बिखरे थे और हाथ में कलम थी। पचास के आसपास का चेहरा, सफ़ेद बाल, झुर्रियाँ। वो कुछ लिख रहा था और बीच-बीच में रुककर छत की तरफ़ देख रहा था।

मैंने दरवाज़ा धकेला।

वो चौंका। कलम हाथ से छूट गई।

"कौन?" उसने पूछा। फिर मुझे पहचाना। "तू?"

"तू कौन है?" मैंने पूछा।

वो उठा। कुर्सी पीछे सरकी। "यहाँ कोई नहीं आता। तुझे किसने भेजा?"

"मुझे किसी ने नहीं भेजा," मैंने कहा। "मैं खुद आया हूँ। और तू भवानी का बेटा है, है न?"

वो रुका। फिर हँसा। हँसी में कुछ टूटा हुआ था।

"भवानी का बेटा," उसने दोहराया। "पूरी ज़िंदगी यही सुनता आया हूँ। भवानी का बेटा। कभी किसी ने मेरा नाम नहीं पूछा।"

"नाम क्या है?"

"रणविजय," उसने कहा। "मगर यहाँ सब मुझे बेटा बुलाते हैं।"

मैंने आगे कदम बढ़ाया। "तेरा नाम उन्नीसवीं लकीर पर है। भवानी का हिसाब तेरे नाम पर बैठा है। कल सुबह तहसील में वो काग़ज़ खुलेगा — अगर तू आया तो।"

रणविजय ने मेज़ की तरफ़ देखा। "मैं जानता हूँ," उसने कहा। "मेरे पापा ने मुझे बताया था।"

"तो फिर तू चुप क्यों बैठा है?"

"क्योंकि मेरा बेटा ऊपर है," उसने कहा। "सात साल का। साँस की मशीन पर। अगर मैं पापा के ख़िलाफ़ खड़ा हुआ, तो वो मशीन बंद हो जाएगी।"

मैं रुक गया। उसकी आँखों में कुछ था जो मैं जानता था — वही देखा हुआ डर।

"तेरा बेटा ठीक हो जाएगा," मैंने कहा। "ये मैं वादा नहीं कर सकता। पर इतना कह सकता हूँ — अगर तू कल तहसील में नहीं आया, तो तेरे पापा का हिसाब कभी नहीं खुलेगा। और जो हिसाब कभी नहीं खुलता, वो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता है। तेरे बेटे पर भी आएगा।"

रणविजय की आँखें भर आईं। उसने कुछ कहना चाहा पर आवाज़ नहीं निकली।

तभी नीचे से आवाज़ आई। "साहब! साहब!"

रणविजय ने खिड़की से झाँका। "पापा के आदमी हैं। तुझे यहाँ से निकलना पड़ेगा।"

"तू आएगा?" मैंने पूछा।

वो रुका। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा। "सात बजे। तहसील के पिछले दरवाज़े से आऊँगा। मेरा बेटा अगर —" वो रुका, गला भरा। "अगर वो रहा, तो आऊँगा।"

मैंने सिर हिलाया। "सात बजे।"

वो मेरी तरफ़ एक काग़ज़ बढ़ाया। "ये ले। मेरे पापा की लिखाई है। मुझे नहीं पता इसमें क्या है, पर मैं इसे दस साल से संभाले हूँ।"

मैंने काग़ज़ लिया और खिड़की की तरफ़ बढ़ा। नीचे दो आदमी दालान में आ चुके थे। मैंने खिड़की से कूदकर दीवार पकड़ी और नीचे उतरा। घुटने में चोट लगी, पर मैं भागता रहा।

गली के मोड़ पर पहुँचकर मैंने पीछे देखा। कोई नहीं आ रहा था।

मैं सीधा बंसी की दुकान पहुँचा। सुबह की पहली किरण आ रही थी। दुकान का शटर आधा खुला था।

मैंने अंदर झाँका। बंसी खटिया पर बैठा चाय पी रहा था, माथे पर पट्टी बँधी थी और होंठ फटे हुए थे।

"तू ज़िंदा है," मैंने कहा।

"मैं तो था ही," बंसी ने कहा। "तेरे जाने के बाद उन दोनों को मैंने खुद ही भगाया। एक की टाँग तोड़ी और दूसरे को भगाया। फिर सो गया।"

"और ढेबर?"

"सुमन के पास है। सुरक्षित।"

मैंने उसके पास बैठकर रणविजय का काग़ज़ निकाला। पीली स्याही में भवानी की लिखाई थी —

"मेरा बेटा जानता है कि उसका नाम उस काग़ज़ पर है। वो कभी नहीं आएगा। क्योंकि अगर आया, तो उसका बेटा मरेगा। और मैं वो कर सकता हूँ।"

मैंने काग़ज़ बंसी को दिया। उसने पढ़ा और चुप हो गया।

"अब?" उसने पूछा।

मैंने टोकन जेब से निकाला। वो ठंडा था। मैंने उसे हथेली पर रखा और देखा — आठ हज़ार का अंक अभी भी वहीं था।

"अब सात बजे तहसील," मैंने कहा। "और उसके बाद जो होगा, देखा जाएगा।"

बंसी ने चाय का गिलास मेरी तरफ़ बढ़ाया। "पी ले। आज का दिन लंबा है।"

मैंने गिलास पकड़ा। चाय गरम थी। और मेरी जेब में टोकन ठंडा पड़ा था, जैसे वो भी जानता हो कि आज का हिसाब सबसे भारी है।

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