The Token System64 / 1154

The Token System – Chapter 64

7 min read November 6, 2026

"कटा तो तब जब तूने अपने हाथ से काम नहीं किया। किसी और का हाथ लगा, तो हिसाब उसी हाथ का बोझ बन गया। तेरे दादा इसी से डरते थे।"

मैंने टोकन जेब में रखा। "तो अब मुझे क्या करना है?"

"वो तेरा टोकन बताएगा। मैं नहीं।"

अस्पताल पहुँचा तो सुमन इमरजेंसी के बाहर बैठी थीं। हाथ में फ़ाइल थी, पर उसे खोला नहीं था। मेरी तरफ़ देखकर फ़ाइल बंद कर दी।

"क्या हुआ?"

"भवानी ने प्रशासन को फ़ोन किया। मेरा तबादला प्रस्तावित आया है — बाड़मेर।"

"उसने इतना हिम्मत कैसे की? उसके पास तो ज़मीन लेने के काग़ज़ भी अब ज़ब्त हैं।"

सुमन ने फ़ाइल मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "देख ले। तबादले का हुक्मनामा आज सुबह का है। साफ़ लिखा है — प्रशासनिक ज़रूरत। पर मुझे पता है कि ये किसकी ज़रूरत है।"

"तू जाएगी?"

सुमन हँसीं। "मैंने अभी से एक चिट्ठी लिख दी है — मुख्य चिकित्सा अधिकारी को। उसमें भवानी के नर्सिंग होम से छुड़ाए छह बच्चों का पूरा ब्यौरा है। अगर मेरा तबादला रोका गया, तो ये चिट्ठी दबा दी जाएगी। अगर हुआ, तो ये चिट्ठी अख़बार तक जाएगी।"

"तू जानती है, इससे तेरा करियर जा सकता है।"

"करियर जाएगा तो जाएगा। मरीज़ का हिसाब मैं भूल नहीं सकती।"

मैंने चिट्ठी की कॉपी ली। जेब में रखी। "मुझे एक काम करना है।"

"कल दस बजे हवेली है।"

"उससे पहले।"

मैं हवेली पहुँचा तो दिन ढल रहा था। दरवाज़े पर राजेंद्र का सिपाही तैनात था। मैंने पास जाकर अपनी जेब से वकील का नक्शा निकाला।

"ये नक्शा भवानी के वकील के बस्ते से निकला है। इसमें एक कमरा दिखाया गया है जो किसी दरवाज़े से नहीं जुड़ता। मुझे वो कमरा खोजना है।"

सिपाही ने अंदर झाँका। फिर राजेंद्र को बुलाया। राजेंद्र आया, नक्शा देखा।

"तेरे पास कैसे आया?"

"अंकित ने दिया। भवानी ने उसे दफ़्तर में बुलाकर टोकन का सच बताया था, और अंकित ने दीवार पर टँगा ये नक्शा उतार लिया था।"

राजेंड्र ने नक्शा टेबल पर खोला। उँगली चलाई।

"ये कमरा यहाँ है — पहली मंज़िल के पीछे। बाहर तीन कमरे हैं, और ये चौथा बीच में फँसा है। इसका कोई दरवाज़ा नहीं।"

"तो कैसे खुलेगा?"

"अंदर से।"

मैं सीढ़ियों से ऊपर गया। बूढ़ी औरत कमरे में बैठी थी, लाठी सामने रखी।

"आज क्या लाया?"

"आज नक्शा लाया हूँ।" मैंने उसे खोला। "बताओ, ये बीच वाला कमरा कहाँ से खुलता है?"

बूढ़ी औरत ने नक्शे पर उँगली रखी। "यहाँ एक दरवाज़ा है। पर वो दीवार में है। छुपा हुआ। जब सेठ ज़िंदा थे, वो अंदर से खोलते थे। बाहर से नहीं।"

"तो अंदर कैसे जाएँ?"

"छत से।" उसने लाठी से ऊपर की तरफ़ इशारा किया। "छत पर एक कमरा है जिसकी खिड़की उस कमरे में खुलती है। कभी सीढ़ी से जाया जाता था। अब सीढ़ी नहीं है।"

"रस्सी हो तो?"

"रस्सी हो तो जा सकता है।"

मैंने राजेंद्र को बुलाया। बंसी को भी फ़ोन किया। शाम चार बजे हम छत पर थे — मैं, बंसी, राजेंद्र का एक सिपाही, और बूढ़ी औरत की बताई जगह पर एक रस्सी बँधी।

मैंने रस्सी पकड़ी। बंसी ने कमर पकड़ी। "संभल के। अगर तू गिरा, तो मैं तेरी माँ को क्या जवाब दूँगा?"

"कहना — वो अपने काम में मरा।"

मैंने खिड़की से अंदर पैर डाले। उतरा। नीचे एक छोटा कमरा था, धूल भरा। बीच में लकड़ी की मेज़ थी और उस पर एक लोहे का बक्सा। बक्से पर जंग थी, पर ताला खुला था।

बक्से में एक और बही थी। और बही के नीचे एक लिफ़ाफ़ा, जिस पर लिखा था — "कन्हैया माली के नाम।"

मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर दो काग़ज़ थे। एक पर लिखा था — "मैं, हरि सिंह, गवाही देता हूँ कि हवेली का चौथा हिस्सा कन्हैया माली का है। यह हिस्सा उसने अपने हिस्से के टोकन के बदले लिया था। उसने टोकन मुझे दिया था, पर हिसाब का हिस्सा उसका रहेगा। और मैं उसे कभी नहीं लूँगा।"

दूसरे काग़ज़ पर मेरे दादा की लिखाई थी — "मैंने अपना हिस्सा हरि सिंह को क्यों दिया — यह बात सिर्फ़ उसी को पता थी जिसने सेठ की बही देखी थी। हिसाब का बोझ मेरे बेटे पर आने वाला था। इसलिए मैंने टोकन छुपा दिया। पर मैंने हिस्सा नहीं छोड़ा। मेरा नाम बही में है। अगर आने वाले को पढ़ना हो, तो बही उसी कमरे में है।"

मैंने बही उठाई। भारी थी। पन्ने पलटे। कुछ पन्नों पर हिसाब लिखा था, कुछ पर नाम। पीछे एक पन्ने पर लिखा था — "हिस्सा बाँटने वालो, हिसाब तुम्हारा है। जो हिस्सा दबाएगा, हिसाब उसका बढ़ेगा।"

मैंने बही बंद की। राजेंद्र ने ऊपर से आवाज़ दी, "कुछ मिला?"

"बहुत कुछ मिला।"

मैंने लिफ़ाफ़ा और बही ऊपर भेजी। फिर खुद चढ़ा। रस्सी खींची, बंसी ने पकड़ा।

घर पहुँचते-पहुँचते रात हो गई। माँ ने खाना लगाया। रीना ने चाय बनाई। बंसी बैठा था, बही उसके सामने थी।

"इसमें क्या है?" रीना ने मेरी तरफ़ देखा।

"बही में तीन चीज़ें हैं — नाम, हिसाब, और हरि सिंह की गवाही।"

"मतलब?"

"मतलब — दादा का हिस्सा हवेली में आज भी है।" मैंने चाय ली। "वो लिफ़ाफ़ा जो भवानी अपने बेटे को देती… जो वो बैग में छुपाकर रखे था — उसमें यही है। और अगर कल तलाशी में ये बही सबके सामने आती है, तो हवेली का चौथा हिस्सा हमारा है।"

रीना ने चाय की चुस्की ली। "तो शादी अब उस पैसे से होगी जो हमारा हक़ है, भवानी के दिए पैसे से नहीं।"

"हाँ।"

बंसी ने हाथ जोड़े। "ईश्वर करे कल भवानी हवेली आए और ये बही देखे।"

तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। एक नहीं, दो बार। मैं उठा। बाहर अंधेरा था। सामने एक आदमी खड़ा था। सफ़ेद कमीज़, काला सूट, हाथ में बस्ता।

"मैं भवानी सिंह का बेटा नहीं, भवानी सिंह का वकील हूँ।" उसने बस्ता सीधा पकड़ा। "और मुझे वह काग़ज़ चाहिए जो तेरे पास है।"

मैंने दरवाज़े का पल्ला थोड़ा और खोला। पीछे माँ चूल्हे पर थीं, रीना मेज़ पर, बंसी बही के पास।

"कौन सा काग़ज़?"

"जो तूने आज शाम हवेली से निकाला।" वकील का चेहरा सपाट था। "मैं जानता हूँ, उसमें बही है और एक लिफ़ाफ़ा भी। दोनों मेरे मुवक्किल के हैं।"

"हवेली से निकली चीज़ भवानी सिंह की होती तो वो रात को वहाँ ख़ुद होता। पर वो नहीं था। चीज़ वहाँ से खुलकर निकली है, और उसका हक़दार वो है जिसका नाम उसमें लिखा है।"

वकील ने बस्ता खोला। एक काग़ज़ निकाला।

"ये अदालत का हुक्म है। कल सुबह तक हवेली की सारी चीज़ें वापस उसकी जगह पर होनी चाहिए, वरना ये अदालत की अवमानना होगी।"

मैंने काग़ज़ लिया। पढ़ा। राजेंद्र का नाम ऊपर था — उसे भी नोटिस मिला था।

"तो कल सुबह दस बजे," मैंने कहा। "तलाशी में सब मौजूद होंगे। अदालत का हुक्म भी। बही भी। और जिनके नाम बही में हैं, वो भी।"

वकील एक पल रुका। "भवानी सिंह ने कहा है — अगर तू बही आज रात दे दे, तो वो रीना की शादी का सारा ख़र्च उठाएगा। मोटी रकम। कोई शर्त नहीं।"

मैंने पीछे मुड़कर देखा। रीना मेज़ पर बैठी थी। उसने चाय का कप उठाया और हल्का सा सिर हिलाया — ना में।

"वकील साहब," मैंने कहा, "रात हो गई है। कल सुबह हवेली में मिलते हैं।"

दरवाज़ा बंद किया। भीतर आया। बंसी हँस रहा था। रीना ने कहा, "शादी तय है। लालाजी के भतीजे से, जो खुद इंतज़ार कर रहा है। बस भवानी को इसकी खबर नहीं।"

माँ ने खाने की थाली सामने रखी। "कल सुबह जल्दी उठना है।"

मैंने बही उठाई। मेज़ पर रखी। ऊपर मेरी नज़र एक नाम पर पड़ी — तीसरे पन्ने पर, हाशिये में, पुरानी स्याही में लिखा — "कन्हैया माली का हिस्सा — अभी बाकी।"

टोकन जेब में हल्का गरम हुआ। मैंने निकाला। नई लकीर उभर रही थी — "सुबह हवेली में, सबके सामने।"

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