The Token System63 / 1154

The Token System – Chapter 63

7 min read November 6, 2026

"तीसरी बात सबसे डरावनी है।"

"हाँ। पर सच जो भी हो, तुझे तहखाने में जाना है। छुपाकर कुछ अच्छा नहीं होता।"

मैंने चाय ख़त्म की। घुटने पर लगी चोट अब भी उभरी हुई लाल थी।

घर लौटते वक़्त सुबह की पहली किरण आ रही थी। रीना घर के बाहर चाय की केतली रख रही थी। मुझे देखकर केतली वहीं रख दी।

"तेरी शर्ट कैसी है?" उसने पूछा।

"रात भर जागा।"

"छह बच्चे छुड़ाए," बंसी ने कहा, जो पीछे से आ रहा था। "इससे पूछ लेना।"

रीना ने मेरे घुटने पर नज़र डाली। कुछ नहीं बोली। अंदर गई, फिर एक कपड़ा और पानी लेकर आई। कपड़ा भिगोकर मेरे घुटने पर रख दिया।

"आज हवेली?" उसने पूछा।

"दस बजे।"

"मैं भी चलूँगी।"

"रीना…"

"मैंने कहा था न, मैं तेरे काम में नहीं पड़ती। पर आज मैं सिर्फ़ ये देखना चाहती हूँ कि जो काग़ज़ तेरे दादा का नाम कहेगा, वो कैसा है।"

माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। उनके हाथ में चाय का कप था। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस चाय मेरी तरफ़ बढ़ा दी।

मैंने कप पकड़ा।

"माँ," मैंने कहा। "आज हवेली में तहखाना खुलेगा। तेरे ससुर का नाम वहाँ हो सकता है किसी ऐसी बात में जिससे तू नाख़ुश हो।"

माँ ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर बोलीं, "मैं जानती हूँ।"

"क्या जानती है?"

"मैं तुझे हवेली के बारे में बताने से रोक रही थी, क्योंकि उसमें हमारा नाम भी है। तेरे दादा ने अपने हाथ से जो एक चीज़ बचाई थी, वो उस बही में गवाही के तौर पर दर्ज है। वो डरता था कि कहीं उसे भी उसी हिसाब में न लिख दिया जाए जिसमें हरि सिंह लिख रहा था।"

"तो दादा ने किस हिसाब में नाम लिखवाया?"

"वो आज पता चलेगा।" माँ अंदर चली गईं।

मैंने चाय ख़त्म की। जेब में हाथ डाला। पाँच सौ के नोट — दो हज़ार पाँच सौ बाकी वाला हिसाब — वहीं थे।

टोकन फिर गरम हुआ। मैंने निकालकर देखा।

नई लकीर उभर रही थी। धीरे-धीरे।

"अगला काम: जो काग़ज़ तेरे दादा के हाथ से बचा — वो सबके सामने रख।"

मैंने टोकन वापस जेब में रखा और रीना की तरफ़ देखा।

"दस बजे," मैंने कहा। "हवेली।"

॥

मैंने जेब से नोट निकाले और गिने। पाँच सौ। पाँच सौ ही। कल रात तक जेब में तीन हज़ार थे। छह बच्चे छुड़ाए, दो हज़ार पाँच सौ कट गए, और अब अगर यही हिसाब रहा तो रीना की शादी के लिए मुझे अगली सदी तक काम करना पड़ेगा।

बंसी खोखे पर चाय के पत्ते छान रहा था। मैंने नोट उसकी मेज़ पर रख दिए।

"गिन ले।"

"क्या गिनूँ?"

"जो है। पाँच सौ। कल तीन हज़ार थे। छह बच्चे छुड़ाए, छह ज़िंदगियाँ बचाईं, और मेरा हिसाब कट गया। ये कौन सा न्याय है, बंसी?"

बंसी ने चाय का गिलास मेरी तरफ़ सरका दिया। खुद भी एक बनाया। दो चुस्की ली।

"तेरे को याद है, पहली बार जब तूने छोटू की माँ के काग़ज़ निकाले थे? तीन सौ मिले थे।"

"याद है।"

"और जब तूने काकी की रसीद तहसील से निकलवाई थी, तब कितने मिले थे?"

"दो हज़ार।"

"उसमें तेरा कितना हाथ था? तू अकेला गया था?"

"नहीं। राजेंद्र साथ था। और शेखर बाबू ने फ़ाइल निकाली थी।"

बंसी ने गिलास रख दिया। "और छह बच्चे? उसमें कितने लोग थे?"

मैं चुप हो गया। सुमन, शेखर, राजेंद्र, बंसी, रीना — और गंगा ने अंदर से रास्ता बताया था।

"तो हिसाब कटा क्यों?" मैंने गिलास ज़ोर से रखा। चाय छलक गई।

"क्योंकि टोकन ये नहीं देखता कि काम कितना बड़ा था। वो ये देखता है कि काम किसने किया।" बंसी ने पोछा लेकर चाय पोंछी। "जिस दिन तूने अकेले काम किया, पूरा पैसा आया। जिस दिन भीड़ लगी, हिसाब कटा। मैंने तुझे पहले भी कहा था — टोकन का हिसाब तेरे हाथ का है, तेरे साथियों का नहीं।"

"तो क्या मुझे सबको अकेले छोड़कर काम करना चाहिए? बच्चे अकेले निकालता तो भवानी के आदमी मुझे वहीं ख़त्म कर देते।"

"मैं ये नहीं कह रहा कि अकेले जा। मैं ये कह रहा हूँ कि हिसाब में जो कटा, वो कटा। रोने से नहीं जुड़ेगा।"

मैंने जेब से टोकन निकाला। मेज़ पर पटक दिया। पीतल की आवाज़ सुनकर बंसी के खोखे पर बैठा एक आदमी भी मुड़कर देखने लगा।

"मैं ये हिसाब नहीं समझता। छह बच्चे बचाए। छह! उनमें से एक भी अगर भवानी के होम में रह जाता, तो आज तक किसी को पता नहीं चलता। और ये मेरे पैसे काट रहा है।"

बंसी ने टोकन की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।

"तूने मुझे एक बार बताया था कि टोकन पर अंक क्या दिखाते हैं?"

"बाकी हिसाब।"

"नहीं।" बंसी ने उँगली उठाई। "तूने कहा था — कितना बाकी है। और किसका बाकी है?"

मैंने सोचा। "जिसका काम है, उसका।"

"तो फिर कटा किसका?"

मैंने टोकन उठाया। लकीर देखी। "बच्चों की रसीद: दो हज़ार पाँच सौ बाकी।" और नीचे नई लकीर — "जो काग़ज़ तेरे दादा के हाथ से बचा — वो सबके सामने रख।"

तभी छोटू खोखे की तरफ़ आया। वो सुबह से मेरे पीछे-पीछे घूम रहा था। काकी ने भेजा था शायद, चाय के लिए।

"मन्नू भैया," उसने कहा। "वो जो काग़ज़ तुम लाए थे हवेली से — काकी कह रही थीं कि उनमें कुछ फोटो जैसा भी है।"

"फोटो?"

"हाँ। मैंने देखी थी। जब तुम सो रहे थे, मैंने बंडल खोला था। काकी ने डाँटा, पर देख ली।"

मैंने गिलास रखा। "कहाँ है वो बंडल?"

छोटू दौड़कर घर से बंडल ले आया। मैंने उसे खोखे की मेज़ पर खोला। काग़ज़ों के बीच से एक पुरानी तस्वीर निकली — मुड़ी हुई, कोने से फटी, पर साफ़।

उसमें दो आदमी खड़े थे। बीच में एक मेज़ थी और उस पर वही टोकन रखा था। एक आदमी की मूँछें घनी थीं, सिर पर साफ़ा, हाथ में लाठी — वो भवानी का दादा हरि सिंह था, मैंने विक्रम की बताई बातों से पहचान लिया। दूसरा आदमी दुबला, सादा कुर्ता, हाथ में फावड़ा — वो मेरा दादा था। अपने दादा को मैंने सिर्फ़ एक बार देखा था, बचपन में, तस्वीर में। पर ये वही चेहरा था।

और तस्वीर के पीछे लिखा था — "हिसाब बाँटने का दिन। हरि सिंह और कन्हैया माली। ग्यारह जेठ।"

मैंने तस्वीर बंसी को दी। वो देखता रह गया। फिर बोला, "ये वो दिन है जब हिसाब बाँटा गया था। दो टोकन, दो आदमी।"

"कितने साल पहले?"

"तू माँ से पूछ। वो जानती है।"

मैं तस्वीर लेकर घर पहुँचा। माँ चूल्हे पर थीं। मैंने तस्वीर उनके सामने रख दी।

माँ ने हाथ पोंछा। तस्वीर उठाई। देखी। बैठ गईं। कुछ देर तस्वीर को देखती रहीं, फिर बोलीं, "ये वो दिन था जब हिसाब बाँटा गया। मैं तब सोलह की थी। तेरे दादा ने रात को ये तस्वीर दिखाई थी और कहा था — बेटी, आज सबको हिस्सा मिला। सेठ गोवर्धनदास ने खाता खोला था। हरि सिंह ने और तेरे दादा ने हाथ बँटाया। दो टोकन बने। एक हरि सिंह के हाथ, एक तेरे दादा के हाथ। सेठ ने कहा था — जो हिस्सा बाँटेगा, वही चलाएगा।"

"तो दोनों के पास टोकन था?"

"हाँ। पर हरि सिंह ने अपना हिस्सा बाँटना बंद कर दिया। उसने दूसरों से काम करवाना शुरू किया। और तेरे दादा ने अपना टोकन छुपा दिया — दीवार में।"

"क्यों?"

"क्योंकि वो डर गया था। उसने देखा कि हिसाब बढ़ रहा है और बढ़ता ही जा रहा है। उसने सोचा — अगर मैं थोड़ा रुक जाऊँ, तो हिसाब शांत हो जाएगा। पर हिसाब रुकता नहीं।"

मैंने तस्वीर हाथ में ली। "माँ, तूने ये तस्वीर पहले क्यों नहीं दिखाई?"

"क्योंकि तू डर जाता। और डरकर तू उस टोकन को कहीं फेंक आता।" माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "मैं चाहती थी कि तू ख़ुद समझे।"

"मैं समझ गया हूँ, माँ। बस हिसाब कटने की बात समझ नहीं आ रही।"

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