The Token System62 / 1154

The Token System – Chapter 62

7 min read November 6, 2026

सुमन ने काग़ज़ उठाए, तारीख़ों पर उँगली चलाई, फिर नीचे रखे।

"रात में जाना है," मैंने कहा।

"पुलिस?"

"राजेंड्र को बोलूँगा। पर पहले मुझे अंदर जाना होगा।"

सुमन ने मेरी तरफ़ सीधा देखा। "तू अंदर कैसे जाएगा? भवानी के होम में सब तेरा चेहरा जानते हैं।"

बंसी से मैंने चार बजे शाम को दुकान पर बात की। उसने चाय फिर से भरकर मेरे आगे रखी और खुद भी बैठ गया।

"शेखर से बात करनी है," मैंने कहा।

"वो अब डरा हुआ है।"

"डरा हुआ आदमी ही काम करता है।"

बंसी हँसा। "तेरी सोच के तरीके बदल गए हैं, मन्नू।"

शेखर बाबू उसी शाम अस्पताल के पीछे वाले कमरे में मिले। हाथ में फिर कोई फ़ाइल थी और चश्मा बार-बार सरक रहा था।

"रसोई के पीछे एक कमरा है," उसने धीरे से कहा। "जिसमें बच्चे रखे जाते हैं। दरवाज़ा लोहे का है। चौकीदार रात दो बजे बदलता है। उस वक़्त चार मिनट का अंधेरा रहता है, जब लालटेन जाती है और दूसरी आती है।"

"चाबी?"

"चाबी मेनेजर के पास थी। वो भाग गया, पर मैंने…" शेखर ने अपनी बाईं जेब से एक छोटी चाबी निकाली। "ये मेरी मेज़ के नीचे की दराज़ में पड़ी थी। मुझे नहीं पता ये किस कमरे की है। पर दो महीने से वो वहीं थी।"

"तू साथ चलेगा?"

शेखर ने लंबी साँस ली। "मैं गाड़ी के पास खड़ा रहूँगा। अंदर तुम लोग जाओ।"

राजेंड्र से बात रात नौ बजे हुई, थाने के पीछे। उसने पूरी बात सुनी, कुछ नहीं बोला, फिर बोला, "अगर सबूत नहीं मिला, तो हम ग़ैरक़ानूनी घुसपैठ कर रहे होंगे।"

"सबूत वहीं मिलेगा," मैंने कहा। "बच्चे मिलेंगे, तारीख़ों वाला रजिस्टर मिलेगा। मैं टोकन के बारे में नहीं बोल रहा, राजेंड्र। मैं सिर्फ़ बच्चों की बात कर रहा हूँ।"

"कितने बजे?"

"रात आधी रात के बाद। दो बजे से पहले।"

"मैं दो सिपाही लाऊँगा। और मैं बाहर रहूँगा — क्योंकि अंदर भवानी का आदमी होगा, और मुझे अंदर जाने का हक़ नहीं है बिना वारंट के।"

"तू बाहर ही रह। मैं अन्दर जाऊँगा।"

रात सवा बजे तीन गाड़ियाँ भवानी के होम से आधा किलोमीटर पहले रुकीं। राजेंड्र की सिपाही वाली गाड़ी पीछे थी। बंसी मेरे साथ था। शेखर तीसरी गाड़ी में अकेला।

मैंने शेखर की दी चाबी को अपनी जेब में रखा — टोकन के बगल में। टोकन फिर भी गरम था। पूरे दिन से ठंडा नहीं हुआ था।

हम पिछले फाटक से अंदर गए। घास बहुत ऊँची थी, पैर दबते ही आवाज़ निकलती थी। बंसी मेरे पीछे-पीछे आ रहा था। मैंने देखा उसके हाथ में एक लोहे की छड़ थी।

रसोई के पीछे वाला कमरा दिख गया। बाहर एक लालटेन जल रही थी। चौकीदार कुर्सी पर बैठा था, सिर टेके।

राजेंड्र ने कहा था — दो बजे चौकीदार बदलता है।

घड़ी देखी। रात एक बजकर पचास मिनट। दस मिनट बाकी।

मैं दीवार से सटकर खड़ा हो गया। बंसी दूसरी तरफ़ चला गया।

दो बजे। पहला चौकीदार उठा, लालटेन उठाई, और धीरे-धीरे सीढ़ी की तरफ़ चला गया।

जैसे ही वो गया, मैं कमरे के दरवाज़े तक पहुँचा। चाबी घुमाई — पहली बार में नहीं खुला। दूसरी बार में घूमी। दरवाज़ा खुला, एक चरमराहट के साथ।

अंदर अंधेरा था। मैंने मोबाइल की रोशनी जलाई।

फ़र्श पर तीन-चार बच्चे सो रहे थे, एक चटाई पर। कोई कंबल नहीं था। एक कोने में बर्तन रखे थे। मैंने रोशनी घुमाई — छह बच्चे थे। सबसे छोटा एक किनारे पर सिकुड़ा बैठा था।

"रमेश?" मैंने धीरे से पुकारा।

एक सात साल का लड़का उठ बैठा। उसकी आँखें चौड़ी हो गईं।

"मेरी माँ…" उसने कहा। "मेरी माँ मर गई।"

"नहीं," मैंने कहा। "तेरी माँ ज़िंदा है। अस्पताल में है।"

रमेश रोने लगा। नींद में था, आधा, इसलिए आवाज़ बाहर नहीं निकली, सिर्फ़ साँस फूल गई।

"तेरा भाई बबलू भी वहीं है। मैं तुम्हें माँ के पास ले चलता हूँ।"

मैंने बाकी बच्चों को भी उठाया। सबके चेहरे आधी नींद में थे, कोई नहीं समझ रहा था।

"शोर मत करना। बाहर चलो।"

पहले दो बच्चे निकले। फिर तीसरा। जब चौथा निकला, तभी बाहर से आवाज़ आई।

"अरे, तू कौन?"

मैंने मुड़कर देखा — काली शर्ट वाला आदमी खड़ा था, हाथ में बेंत। भवानी का वो ही आदमी जो अस्पताल के बाहर मिलता था।

"भागो," मैंने रमेश को धक्का दिया। "बंसी के पास जाओ।"

बंसी आगे आया, छड़ उठाई।

काली शर्ट वाला चिल्लाया। दो और आदमी दौड़े आए। एक ने मुझे कंधे से पकड़ा। मैं गिरा। मेरा घुटना फ़र्श से टकराया, दर्द फैल गया।

बंसी ने छड़ चलाई — एक आदमी के हाथ से बेंत गिरा। फिर एक और आदमी ने बंसी की कमर पकड़ ली।

तभी पीछे से एक आवाज़ आई।

"रुको।"

राजेंड्र था। दो सिपाही साथ। वो उन सबके बीच में आ गया।

"ये बच्चे किस काग़ज़ पर हैं?" उसने काली शर्ट वाले से पूछा।

"साहब, ये…" आदमी हकलाया। "ये बच्चे भवानी साहब के होम के हैं, उनके काग़ज़…"

"काग़ज़ दिखाओ।"

"वो मेनेजर साहब के पास…"

"मेनेजर तो भाग गया।" राजेंड्र ने अपना हाथ अपनी जेब पर रखा, फिर ऊपर किया। "जो काग़ज़ इस वक़्त इस होम में नहीं हैं, वो इस होम के नहीं हैं। बच्चे मेरे साथ जा रहे हैं।"

काली शर्ट वाला कुछ कहना चाहता था, पर राजेंड्र ने आगे कदम बढ़ाया।

"अगर तुम्हारे पास उनके काग़ज़ हैं, तो कल थाने आ जाओ। साथ में भवानी साहब को ले आना।"

उन तीन आदमियों को कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई। बंसी ने छड़ नीचे रखी। सब बच्चे बाहर आ गए। छह बच्चे, दो गाड़ियों में बैठाए गए।

अस्पताल पहुँचे तो सुबह के साढ़े तीन बजे थे। सुमन वहीं वार्ड के बाहर खड़ी थीं।

रमेश ने जैसे ही अपनी माँ को देखा — बिस्तर पर लेटी, आँखें खुली — वो दौड़कर बिस्तर से टकरा गया। गंगा ने उसे पकड़ा और बाँहों में भर लिया। उसका शरीर काँप रहा था। कमलेश दूसरी तरफ़ खड़ी थी, हाथ मुँह पर रखे।

बबलू उठ गया था और रो रहा था, ये देखकर कि कोई और भी उसकी माँ के गले लगा है। सुमन ने उसे उठाया और उसके भाई के पास बिठा दिया।

मैं वार्ड के बाहर आकर दीवार से टिक गया। घुटने में दर्द था, शर्ट फटी थी, और जेब में…

जेब में हाथ डाला। जो काग़ज़ शेखर ने दिया था, वो अलग था। जो पैसा था — कल का तीन हज़ार — वो अब पाँच सौ था। दो नोट दो हज़ार के, एक नोट पाँच सौ का, पहले था। अब गिना — पूरे पाँच सौ।

और टोकन। मैंने निकाला। स्ट्रीट लाइट की रोशनी में देखा। पुरानी लकीर के नीचे नई लकीर उभरी थी।

"बच्चों की रसीद: दो हज़ार पाँच सौ बाकी।"

मैंने टोकन को वापस जेब में रखा। दीवार से टिका खड़ा रहा। वार्ड के अंदर से गंगा की आवाज़ आ रही थी — वो कुछ बोल रही थी बच्चों से। मुझे शब्द समझ नहीं आ रहे थे, बस आवाज़ का लहजा। कोई भी माँ जब अपने बच्चे को तीन महीने बाद देखे, वैसा ही लहजा होता है।

सुमन बाहर आईं। दो कप चाय लेकर। एक मुझे दिया।

"तूने आज रात छह बच्चों की ज़िंदगी पलट दी।"

"और भवानी के होम से जो बच्चे बाकी हैं? आज छह छुड़ाए। वहाँ बारह थे।"

सुमन ने चाय की चुस्की ली। "मैंने सुबह राजेंड्र से बात की। वो कह रहा था कि आज हवेली की तलाशी में सब कुछ निकल आएगा।"

"हवेली में तहखाने की बही है। उसमें दादा का नाम है।" मैंने चाय गर्म-गर्म पी।

"डर लग रहा है?"

"लग रहा है। पर उस डर से ज़्यादा डर ये है कि अगर वो बही में दादा का नाम किसी ऐसी जगह लिखा मिला जहाँ नहीं होना चाहिए — तो मेरे पास कोई जवाब नहीं होगा।"

सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, तेरे दादा माली थे। गवाह थे। बही में नाम होगा तो तीन बातों से — या तो उन्हें भी उसी हिसाब में लिखा गया जिससे वो बेख़बर थे, या उन्होंने उसे छुपाया, या उन्हें गवाही के बदले कुछ मिला था।"

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