The Token System – Chapter 61
“अस्पताल,” मैंने कहा।
“पर रास्ता—”
“रास्ता मेरा काम है। चलो।”
हम बच्चे को लेकर निकले। बुढ़िया भी साथ आई — अपनी लाठी लेकर।
गाड़ी बसवा के बाहर निकली, पक्के रास्ते पर आई, तो सामने हेडलाइट दिखी। बंसी ने गाड़ी धीमी की।
“आगे कुछ है।”
एक जीप रास्ता रोके खड़ी थी। दो आदमी बाहर। उनमें से एक ने हाथ उठाया।
बंसी रुका नहीं। उसने गाड़ी को दाईं तरफ़ घास में उतारा और जीप के पीछे से निकल गया। पीछे से आवाज़ आई — “रुक!” — पर गाड़ी रुकी नहीं। बच्चा रीना की गोद में सोया रहा, और रीना ने कसकर उसे बाँहों में लिया।
अस्पताल पहुँचे तो रात के ग्यारह बज चुके थे। सुमन ड्यूटी पर थी। उसने बच्चे को देखते ही टीम को बुलाया।
“बुख़ार तेज़ है,” उसने कहा। “पर देर नहीं हुई।”
“सुनीता को बताओ,” मैंने कहा। “उसका बच्चा अस्पताल में है।”
सुमन कुछ पल मेरी तरफ़ देखती रही। फिर वो वार्ड की तरफ़ चली।
सुबह छह बजे कमलेश और रीना वार्ड में गए। सुनीता का बेड खिड़की के पास था। बच्चा उसकी बाँहों में था — सुमन ने खुद दिया था। सुनीता की आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। वो बोल नहीं पा रही थी, पर उसने कमलेश का हाथ पकड़ा और अपने सीने पर रखा।
वार्ड के बाहर बंसी ने मेरा कंधा पकड़ा।
“वो देख।”
कोने में शेखर बाबू खड़े थे। हाथ में फ़ाइल थी, आँखें झुकी हुईं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से इशारा किया — बाहर चलो।
अस्पताल के पीछे, कर्मचारियों वाले कमरे के पास उन्होंने मुझे एक लिफ़ाफ़ा दिया।
“ये क्या है?”
“रजिस्टर की कॉपी,” शेखर ने कहा। “मेनेजर कल रात भाग गया। मैंने लिफ़ाफ़ा उसकी मेज़ के नीचे से उठाया। इसमें वो तारीख़ें हैं जब भवानी के होम में मरीज़ ‘बाहर भेजे गए।’”
“तुमने ये क्यों निकाला?”
शेखर ने सीधे आँखों में देखा।
“क्योंकि मेरी बेटी की शादी तोड़कर भवानी ने मुझे उसका किराया दिया था। अब वो किराया मुझे भारी लगता है।”
वो चले गए। मैंने लिफ़ाफ़ा जेब में रखा — टोकन के ऊपर नहीं, उसके नीचे। और टोकन की गर्मी मेरी जेब में फैल गई, धीरे-धीरे, जैसे किसी ने कान में कहा हो — हिसाब बढ़ रहा है।
मैं सीढ़ियों से नीचे उतरा, गेट की तरफ़। बाहर बंसी खड़ा था, सामने सड़क पर भवानी की सफ़ेद गाड़ी।
“फिर आ गया,” बंसी ने कहा।
“मुझे बुला रहा है।”
“मन्नू, आज हवेली है। सुबह दस बजे। वो टाल नहीं रहा।”
“पता है।”
गाड़ी के पास गया। भवानी इस बार नीचे उतरा था। सफ़ेद कुर्ता, हाथ में कोई काग़ज़।
“ये मेरे वकील की नकल है,” उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। “देख। ये काग़ज़ कहता है कि हवेली का आधा हिस्सा मेरा है। पूरा तहसील में दर्ज।”
मैंने काग़ज़ नहीं पकड़ा। “अच्छा है। फिर तुझे डर किस बात का?”
भवानी का हाथ नीचे झुका।
“मैं डरा हुआ नहीं हूँ।”
“तो तू सुबह छह बजे मेरे अस्पताल के बाहर क्यों खड़ा है?”
भवानी कुछ पल चुप रहा। सुबह की हवा में उसके कुर्ते का सफ़ेद और भी सफ़ेद लग रहा था।
“मैं तुझसे एक आख़िरी बात कहने आया हूँ,” उसने कहा। “तू जो काग़ज़ कल हवेली में निकालेगा — उससे मेरा कुछ नहीं जाता। मेरा पूरा कारोबार, मेरी ज़मीनें, मेरा होम — सब काग़ज़ के बाहर है। तहसील में जो दर्ज है, वो मेरा है। और जो दर्ज नहीं, वो किसी का नहीं।”
“अच्छा। तो फिर तू बेकार में मेरे पीछे क्यों पड़ा है?”
“क्योंकि मैं चाहता हूँ कि तू कल हवेली में आए।”
“क्यों?”
“क्योंकि मुझे देखना है,” भवानी ने काग़ज़ मोड़कर अपनी जेब में रखा, “कि उस कमरे में जब दोनों के नाम निकलेंगे, तो तू किसका नाम उठाएगा।”
“ये क्या मतलब हुआ?”
“मतलब ये कि उस कमरे में सिर्फ़ मेरे पापा का नाम नहीं है।” भवानी ने गाड़ी का दरवाज़ा खोला। “तेरे दादा का नाम भी है। कन्हैया माली के साथ। गवाही में। नीचे, तहखाने की बही में।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
“तो कल सुबह,” भवानी ने कहा, “जब तू वो बही उठाएगा, तो एक बार सोच लेना कि किसका नाम किसके सामने रखना है।”
वो बैठा। गाड़ी चली गई।
मैं वहीं खड़ा रहा। जेब में टोकन फिर गरम हुआ — इस बार पूरे हाथ तक, और कुछ आवाज़ आई, इतनी धीमी कि बंसी सुन न सके — “हिसाब किसी का भी हो, चुकाना पड़ेगा।”
मैंने टोकन निकाला। पुरानी लकीर के नीचे नई लकीर उभर रही थी — तीसरा काम: वो औरत, जो अभी बची — उसका नाम उसके बच्चों तक पहुँचा।
और मैंने देखा — नाम ‘सुनीता’ अब मिट रहा था और उसकी जगह ‘पूरा’ लिखा जा रहा था। धीरे-धीरे।
॥
अस्पताल की तीसरी मंज़िल पर जो वार्ड था, वहाँ अब भी एक बिस्तर पर बबलू सो रहा था और उसके बगल वाली कुर्सी पर कमलेश झपकी ले रही थी। मैं दबे पाँव अंदर गया। सुनीता की आँखें खुली थीं। वो मुझे देखकर हिली।
"बैठ जा," उसने धीमी आवाज़ में कहा। आवाज़ में दम नहीं था, पर शब्द साफ़ थे।
मैं कुर्सी खींचकर बैठा।
"तेरा नाम क्या है?" मैंने पूछा।
"गंगा।"
मैं ठिठक गया। "रजिस्टर में सुनीता लिखा था।"
"सुनीता मेरी बहन है। मैं गंगा हूँ। भवानी के होम में मेरा नाम सुनीता लिख दिया था, ताकि मेरी बहन के काग़ज़ पर…" उसकी आवाज़ अटकी। "मेरी बहन के नाम पर होम में ज़मीन का काग़ज़ बना दिया। वो अस्पताल में मरी नहीं है, वो बसवा में है। मैं उससे मिलने जा रही थी, तभी…"
"तभी क्या?"
"तभी मुझे पकड़ लिया।" गंगा ने आँखें बंद कीं। "कमलेश को बोला था कि सुनीता मर गई। मुझे बंद कर दिया उन्होंने। तीन महीने। कोई मुझे नहीं ढूँढता रहा, क्योंकि सबको लगा मैं मर चुकी हूँ।"
"तेरे बच्चे?"
गंगा की आँखें फिर खुलीं। इस बार उनमें पानी था, पर आवाज़ में नहीं।
"मेरे दो बच्चे हैं। ये बबलू तीसरे साल का है। और एक है रमेश — सात साल का। वो दोनों भवानी के होम में हैं।"
"बबलू तो बसवा में था। बुढ़िया के पास।"
"बसवा में बुढ़िया ने बबलू को छुपा लिया था, वरना भवानी उसे भी…" गंगा ने बबलू की तरफ़ देखा। "भवानी ने बच्चों को काम के बहाने रखा है। रसोई में बर्तन माँजते हैं, कपड़े धोते हैं। रमेश सात साल का है, वो भी। उन्हें कहा गया है कि माँ मर गई।"
मेरी जेब में टोकन ठंडा हो गया। एकदम ठंडा, पूरी जेब भर। मैंने हाथ बाहर निकाला जैसे कुछ जल गया हो।
"भवानी ने तुझे बच्चों के बारे में कुछ बताया?"
"उसने कहा था — तू ज़िंदा रहेगी, तो बच्चे ज़िंदा रहेंगे।"
मैं उठ खड़ा हुआ। "मैं उन्हें लेकर आता हूँ।"
गंगा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। पकड़ में ज़ोर नहीं था, पर उसने छोड़ा नहीं।
"तू कौन है?"
"मैं…" मैं रुक गया। "मैं इसी अस्पताल में काम करता हूँ। एक्स-रे का। छोटू ने मुझे बताया था कि तू ज़िंदा है।"
"छोटू?"
"काकी का पोता। वो भी भवानी के चंगुल में था।"
गंगा ने धीरे से हाथ छोड़ दिया। "जा। लेकिन जल्दी कर। भवानी को पता चल जाएगा कि मैं बोलने लगी हूँ, तो वो बच्चों को कहीं और भेज देगा। उसके पास ऐसे तीन होम हैं।"
मैं सीढ़ियों से नीचे उतरा, डॉक्टर सुमन के केबिन में। वो स्टूल पर बैठी कॉपी भर रही थीं। बिना सिर उठाए बोलीं, "गंगा से मिल आया?"
"आपको पता था?"
सुमन ने पेन रख दिया। "इतनी बड़ी अस्पताल है, मन्नू। मरीज़ आते हैं, नाम घूमते हैं। मुझे शक था कि इस होम का हिसाब ठीक नहीं है। पर सबूत नहीं था।"
"अब है।" मैंने शेखर की दी लिफ़ाफ़ा खोलकर उनकी मेज़ पर रख दिया। "ये वो तारीख़ें हैं जब मरीज़ बाहर भेजे गए। और गंगा कहती है कि भवानी के होम में दो बच्चे बंद हैं — रमेश और बबलू।"
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