The Token System – Chapter 637
मैंने उस बूढ़ी औरत की तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रही थी। उसकी आँखों में पानी था।
“तो आप —” मैंने कहा।
“मैं उसकी बहन हूँ, जो उस रात गाड़ी में मरी थी,” उसने कहा। “मैं तेरी माँ की बहन हूँ। और मैं तेरे पापा की मौत के उस रात की आख़िरी गवाह हूँ।”
बंसी ने गाड़ी का दरवाज़ा बंद किया। ढेबर पीछे से उतरा। उसने उस औरत को देखा और उसका मुँह खुला रह गया।
“कमलेश?” ढेबर ने कहा। “तू ज़िंदा है?”
औरत ने ढेबर की तरफ़ देखा। “तू भी, ढेबर? तूने भी उस रात कुछ देखा था?”
ढेबर ने अपनी लाठी पर हाथ रखा। “देखा था। पर मैंने किसी को बताया नहीं।”
कमलेश ने मेरी तरफ़ देखा। “तो अब बताओ। दोनों। क्योंकि मैं दस साल से इस लिफ़ाफ़े को लिए घूम रही हूँ, और अब मुझे उस रात का सच सुनना है — पूरा सच।”
मैंने लिफ़ाफ़ा जेब में रखा और उस बूढ़ी औरत की तरफ़ देखा।
“अंदर चलिए,” मैंने कहा। “शेखर बाबू के घर।”
हम चारों — मैं, बंसी, ढेबर और कमलेश — शेखर बाबू के घर की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।
सीढ़ियों के आख़िरी मोड़ पर कमलेश ने मेरा हाथ पकड़ा।
“मन्नू,” उसने धीरे से कहा। “उस रात गाड़ी में जो औरत मरी, वो बस गवाह नहीं थी। वो भवानी की पहली बीवी थी।”
मैं रुक गया।
“भवानी की पहली बीवी?”
“हाँ। और वो —” कमलेश ने मेरी आँखों में देखा “— वो तेरे पापा की तरफ़ भाग रही थी। भवानी से छिपकर।”
॥
सीढ़ियों के आख़िरी मोड़ पर कमलेश की बात सुनकर मैं वहीं खड़ा रह गया। भवानी की पहली बीवी। पापा की तरफ़ भाग रही थी। पीछे से बंसी ने मेरी कुहनी पकड़ी।
“चल,” उसने कहा। “सीढ़ियों पर खड़े रहकर सच नहीं खुलेगा।”
शेखर बाबू का दरवाज़ा खुला था। अंदर लालटेन जल रही थी। कमरे के बीच में एक पुरानी खाट रखी थी, उस पर ढेबर बैठा था — नहीं, ढेबर तो मेरे पीछे था। खाट पर कोई और बैठा था। दुबला, सफ़ेद दाढ़ी, दोनों टाँगें सीधी पसरी हुईं, जैसे उनमें जान ही न हो। उसके पास की दीवार पर एक तस्वीर टँगी थी — बंसी के ससुर रामदीन की, हाथ में औज़ार, आँखों में वही हँसी जो बंसी की आँखों में है।
“ये कौन है?” मैंने धीरे से पूछा।
ढेबर आगे आया और खाट के पास खड़ा हो गया।
“यही तो है वो आदमी,” ढेबर ने कहा, “जिसने नौ साल पहले मेरी टाँगें तुड़वाई थीं। और यही है वो, जिसने मुझे तेरे दादा की कहानी सुनाई थी।”
खाट पर बैठे आदमी ने अपना सिर उठाया। उसकी आँखें धुँधली थीं, पर जब उसने मुझे देखा तो उनमें कुछ जगा।
“तू सुखिया का पोता है?” उसने पूछा। आवाज़ सूखी थी, जैसे सालों से किसी ने उससे बात न की हो।
“मेरे दादा का नाम सुखदेव था,” मैंने कहा। “लोग उन्हें सुखिया काका कहते थे।”
आदमी ने अपना सिर हिलाया, बहुत धीरे। “नौ साल पहले भवानी ने मुझे बुलाया था। कहा था — सुखिया को उठाकर ले आ। उसके पास एक काग़ज़ है, जो मेरे दादा के ज़माने का है। उसे ले आ, बदले में जो माँगेगा मिलेगा।” उसने एक गहरी साँस ली। “मैं गया। सुखिया काका उस वक़्त भी बूढ़े थे, पर बैठे हुए भी पहाड़ लगते थे।”
“फिर क्या हुआ?” बंसी आगे आ गया था। उसकी आवाज़ में कुछ था जो पहले नहीं था।
आदमी ने बंसी की तरफ़ देखा। “तू रामदीन का बेटा है?”
“हाँ।”
“तेरे बाप ने मेरे लिए चारपाई पर बैठने की जगह छोड़ी थी, उस दिन।” आदमी ने कहा। “सुखिया काका ने मुझे बैठाया, चाय दी, और फिर अपने दादा की कहानी सुनाई। कहा — हवेली में चार हिस्से थे, और भवानी के दादा ने तीन हिस्सों को अपने नाम कर लिया, चौथे को किसी और के नाम पर छोड़ दिया ताकि हिसाब बराबर दिखे। मैं वो सब सुनता रहा और मेरे हाथ के पसीने सूख गए। जब मैं बाहर निकला, तो मुझे पता था कि मैं भवानी का आदमी नहीं रह सकता।”
“तो भवानी ने ऐसा क्यों किया?” मैंने पूछा।
“क्योंकि मैंने उसे सीधा कह दिया,” उसने जवाब दिया, “कि तेरे दादा ने जो किया, वो ग़लत था। और मैं उसमें शामिल नहीं रहूँगा। उसने मुझे यहीं इसी मकान में बंद कर दिया और तीन आदमियों से मेरी टाँगें तोड़वा दीं। कहा — अब तू चल नहीं सकेगा, तो गवाही देने भी कैसे जाएगा?”
“नौ साल से तू यहाँ है?” कमलेश ने कहा। वो भी अंदर आ चुकी थी और दरवाज़े के पास खड़ी थी। “और कोई तुझे ढूँढ नहीं पाया?”
“भवानी ने मेरा नाम ही मिटा दिया,” उसने कहा। “मेरी बीवी को कह दिया गया कि मैं किसी औरत के साथ भाग गया। मेरे बेटे को कह दिया गया कि मैं मर गया। शेखर बाबू यहाँ आते थे, खाना छोड़ जाते थे, पर बात नहीं करते थे। डरते थे।”
मैंने खाट के पास रखा लोहे का बक्सा देखा। जंग लगा था, पर ताला खुला था।
“ये बक्सा?” मैंने कहा।
“यही मेरी जान है,” आदमी ने कहा। “सुखिया काका ने उस रात मुझे ये दिया था। कहा था — अगर तू भवानी से हट गया, तो इसे किसी ऐसे को देना जो हिसाब समझता हो। मैंने नौ साल इसे अपने पास रखा। आज तेरे लिए निकाला है।”
ढेबर आगे आया और उसने बक्सा खोला। अंदर से पीले काग़ज़ों का बंडल निकला, ऊपर से धागा बँधा हुआ, नीचे से सील लगी हुई। ढेबर ने धागा खोला और काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ा दिए।
मैंने पहला काग़ज़ उठाया। मोटा, पीला, किनारों से फटा हुआ। ऊपर मोटे अक्षरों में लिखा था — “हवेली का बँटवारा — असली हिसाब।” नीचे तारीख़ थी, उन्नीस सौ अठहत्तर की। और फिर नाम — सुखदेव, रामदीन, हरदयाल, भैरों ताऊ का बाप, और एक और नाम, जो पढ़ते ही मेरे हाथ काँपने लगे।
“क्या है?” बंसी ने पूछा। वो मेरे कंधे के ऊपर से देख रहा था।
“उन्नीसवीं लकीर,” मैंने कहा। “इस पर नाम है — हरि सिंह।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। पर ये सन्नाटा वो नहीं था जो डर से आता है। ये वो था जो किसी बात के सच हो जाने पर आता है।
“हरि सिंह,” ढेबर ने धीरे से दोहराया। “भवानी के दादा।” उसने मेरे हाथ से काग़ज़ लिया और उसे लालटेन के सामने किया। “देख, नीचे क्या लिखा है।”
मैंने पढ़ा — “इस हिसाब का बोझ उसी पर जाएगा जो इस हवेली में सबसे आख़िर में साँस लेगा। और वो हरि सिंह का ख़ून नहीं, हरि सिंह का ही हिसाब होगा।”
“यानी —” बंसी ने कहा।
“यानी ये हिसाब भवानी के बेटे पर आएगा,” ढेबर ने कहा। “हरि सिंह के पोते पर नहीं, पर उसके बेटे पर। भवानी का बेटा — वही जो आजकल गायब है। और यही वजह है कि भवानी डरा हुआ है। वो जानता है कि उसका बेटा इस हिसाब का बोझ उठाएगा।”
“तो वो इसीलिए मुझे अपनी तरफ़ करना चाहता था?” मैंने कहा। “ताकि हिसाब उसके बेटे पर न आए?”
“हाँ,” ढेबर ने कहा। “और इसीलिए वो चाहता था कि ये काग़ज़ कभी अदालत तक न पहुँचे। ये काग़ज़ अगर अदालत में गया, तो भवानी सिर्फ़ अपनी ज़मीन नहीं खोएगा — वो अपने बेटे को भी खोएगा।”
कमलेश ने खाट पर बैठे आदमी की तरफ़ देखा। “और तूने ये काग़ज़ नौ साल छिपाकर रखा?”
“मैंने किसी को नहीं दिया,” उसने कहा। “क्योंकि मैं जानता था कि जो भी इसे लेगा, भवानी उसे भी वही करेगा जो मेरे साथ किया।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “पर तू अलग है। तू सुखिया का पोता है। तेरे पास वो टोकन है, जो मेरे पास नहीं था।”
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था। मैंने उसे नहीं निकाला।
“ये काग़ज़ अदालत में जाना चाहिए,” ढेबर ने कहा। “कल सुबह। तहसील के आँगन में। वहीं सब तय होगा।”
“पर भवानी कल सुबह तहसील में मिलने को कह रहा है,” मैंने कहा। “उसने कहा — आज रात उसे कुछ तय करना है।”
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