The Token System – Chapter 636
“जब तक भवानी का नाम उस उन्नीसवीं लकीर पर नहीं आता, मैं तेरे साथ रहूँगा। और जिस दिन वो नाम आएगा, उस दिन मैं उस काग़ज़ को अदालत में पेश करूँगा — अपने हाथ से। मैं उन्नीस साल का हिसाब ख़ुद चुकाऊँगा।”
“मंज़ूर,” मैंने कहा।
हम बाहर निकले। बंसी गाड़ी के पास खड़ा था। उसने ढेबर को देखा और पहचान लिया।
“तू यहाँ क्या कर रहा है?”
“अब ये मेरे साथ है,” मैंने कहा। “और इसके पास वो कॉपी है, जिससे भवानी के उन्नीस झूठे काग़ज़ साबित होंगे।”
बंसी ने ढेबर का हाथ पकड़ा। “तूने भवानी के लिए काम किया?”
“किया।” ढेबर ने उसकी आँखों में देखा। “और अब उसी काम का हिसाब चुकाने आया हूँ।”
गाड़ी में बैठकर मैंने कॉपी को अपनी गोद में रखा। ढेबर पीछे बैठा। बंसी गाड़ी चला रहा था। मैंने जेब से टोकन निकाला — ठंडा था, आठ हज़ार का अंक वैसा ही। पर उँगलियों में एक झुरझुरी थी।
फिर मुझे कुछ याद आया। “ढेबर?”
“हाँ बेटा।”
“आपने कहा कि आख़िरी लकीर पर जो नाम उभरेगा, वो भवानी का नहीं होगा। क्या आपको पता है, वो किसका हो सकता है?”
ढेबर ने खिड़की से बाहर देखा। पुरानी बस्ती के मकान पीछे छूट रहे थे।
“मुझे एक बात याद है,” उसने कहा। “तेरे पापा ने उस रात मुझसे कहा था — ‘ढेबर, अगर मैं न लौटूँ, तो मन्नू को बतियो — हिसाब सिर्फ़ काग़ज़ का नहीं होता। कुछ हिसाब खून का भी होता है।’”
मैंने गाड़ी रोक दी। “क्या मतलब?”
“मतलब ये कि तेरे पापा के पास कोई ऐसा काग़ज़ था, जिस पर किसी का खून जुड़ा था। और वो खून तेरे पापा के हाथ पर भी लगा था।”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। फिर दोनों ने पीछे बैठे ढेबर की तरफ़ देखा।
“किसका खून?” मैंने पूछा।
ढेबर ने अपनी कॉपी की तरफ़ इशारा किया। “पन्ना बारह। नाम पढ़ — उन्नीस में से बारहवाँ नाम।”
मैंने कॉपी खोली। बारहवें पन्ने पर एक नाम लिखा था, जो मैंने पहले कभी नहीं सुना था। पर उसके नीचे जो तारीख़ थी, वो वही थी जिस दिन मेरे पापा की गाड़ी दुर्घटना में गई थी।
“ये कौन है?” मैंने पूछा।
“ये वो आदमी है जो उस रात तेरे पापा के साथ गाड़ी में था।” ढेबर ने कॉपी बंद कर दी। “और ये वो आदमी है जिसकी लाश उस गाड़ी में मिली थी। पर उसका नाम उस हादसे के काग़ज़ में नहीं लिखा गया। तेरे पापा ने उसका नाम छिपाया। और — मन्नू — तेरे पापा ने उसका नाम छिपाकर मुझसे कहा था — ‘ये नाम मत छेड़ना। ये नाम उस औरत का है जो मेरे बेटे को पालने वाली है।’”
मेरे हाथ से कॉपी फिसल गई। बंसी ने गाड़ी को किनारे लगाया।
“कौन?” मैंने पूछा। “कौन सी औरत?”
ढेबर ने मेरी तरफ़ देखा। चश्मे के पीछे उसकी आँखें छोटी हो गईं।
“तेरे पापा ने उस औरत का नाम कभी नहीं लिया। बस इतना कहा — ये नाम मेरे बेटे को उस रास्ते से दूर रखेगा, जिस पर मैं चल पड़ा हूँ।”
मैंने गाड़ी का दरवाज़ा खोला और बाहर उतर गया। रात सर्द थी। सड़क के किनारे पुराना पीपल था, जिसकी पत्तियाँ हवा में खड़खड़ कर रही थीं। मैंने टोकन निकाला और उसे अपनी हथेली पर रखा। ठंडा था। मगर जैसे ही मैंने कॉपी के बारहवें पन्ने को छुआ, टोकन में हल्की गरमी आई। बहुत हल्की। फिर ठंडा हो गया।
“बंसी,” मैंने कहा। “कल सुबह तहसील में मुझे दो चीज़ें चाहिए। एक — ढेबर की कॉपी। दो — मेरे पापा की मौत की फ़ाइल।”
“फ़ाइल शेखर बाबू के पास है,” बंसी ने कहा। “पर वो डरता है।”
“आज नहीं डरेगा।” मैंने टोकन जेब में रखा। “आज रात मुझे शेखर बाबू के घर जाना है।”
“अभी? रात के नौ बजे?”
“अभी।” मैंने गाड़ी का दरवाज़ा बंद किया।
ढेबर पीछे से बोला — “मन्नू, एक बात पूछूँ?”
“पूछिए।”
“तू अब तक क्यों नहीं डरा?”
मैंने पलटकर उसकी तरफ़ देखा। “डरा हूँ। बस डर को जेब में रखता हूँ।”
ढेबर हँसा। पहली बार उस शाम में हँसा। “तेरे दादा भी यही कहते थे।”
गाड़ी चली। शेखर बाबू का घर अस्पताल के पीछे वाली गली में था। रास्ते में मैंने कॉपी के बारहवें पन्ने को बार-बार खोला। नाम अजीब था — ‘बीरा देवी’। मुझे याद आया — बीरा देवी वही औरत है, जिससे मैं कल मिला था, अमर की माँ। पर उस आदमी का नाम? जो गाड़ी में मरे थे?
मैंने ढेबर से पूछा।
“वो आदमी कोई नहीं था,” ढेबर ने कहा। “वो औरत थी।”
मैं स्तब्ध रह गया।
“औरत?” मैंने कहा। “पापा के साथ गाड़ी में एक औरत थी?”
“हाँ। और उस औरत का नाम बीरा देवी था।”
मैंने गाड़ी रोक दी। “पर बीरा देवी तो ज़िंदा है। मैं उससे कल मिला था।”
ढेबर ने सिर हिलाया। “तो फिर उस गाड़ी में कौन मरा था? क्योंकि मैंने वो लाश अपनी आँखों से देखी थी — सफ़ेद कपड़े में लिपटी हुई, और उसके चेहरे पर पीली मिट्टी का लेप लगा था।”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी का मुँह खुला रह गया।
“काग़ज़ में बीरा देवी का नाम क्यों लिखा है?” मैंने पूछा।
“क्योंकि उस रात गाड़ी में बैठी औरत का नाम बीरा देवी था। पर लाश किसी और की थी। और वो लाश —” ढेबर रुका, फिर बोला “— वो लाश उस औरत की थी, जिसे भवानी ने उस रात भेजा था। पापा के पास एक काग़ज़ लेकर।”
मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
“तो पापा की गाड़ी में दो औरतें थीं?”
“नहीं। एक औरत थी — बीरा देवी। और एक आदमी — तेरे पापा। और तीसरा — ड्राइवर। पर लाश दो थीं। एक तेरे पापा की। दूसरी — उस औरत की, जिसे भवानी ने बाद में गाड़ी में डलवाया।”
“क्यों?”
ढेबर ने मेरी तरफ़ देखा। “क्योंकि उस औरत को मरा हुआ दिखाकर भवानी ने बीरा देवी को ब्लैकमेल किया। कहा — अगर तूने किसी को बताया, तो अगली लाश तेरे बेटे अमर की होगी।”
मेरे हाथ काँपने लगे। टोकन ने जेब में एक झटका दिया — गरम, तेज़। मैंने उसे निकाला। उस पर अंक नहीं थे, बस एक शब्द उभरा था।
तीन बार। वही शब्द। “बहन।”
मैंने टोकन जेब में रखा।
“अब क्या?” बंसी ने पूछा।
“अब शेखर बाबू के घर,” मैंने कहा। “उससे वो फ़ाइल लेनी है, जिसमें उस रात की पूरी कहानी है। और फिर —” मैंने कॉपी की तरफ़ देखा “— फिर हमें उस औरत को ढूँढना है, जो उस रात मरी और आज ज़िंदा है।”
“कौन?” बंसी ने पूछा।
मैंने गाड़ी स्टार्ट की। “जिसका नाम उन्नीसवीं लकीर पर आएगा।”
गाड़ी शेखर बाबू के घर की तरफ़ बढ़ी। रास्ते में मैंने एक बार पीछे मुड़कर देखा — दूर, हवेली की तरफ़, जहाँ उसकी उत्तर वाली दीवार अब भी खड़ी थी, और उसके नीचे वो काग़ज़, जो मेरे दादा ने छिपाया था। कल सुबह वहाँ से सच निकलेगा। और शायद वो सच उतना ही कड़वा होगा, जितना ढेबर की कॉपी के बारहवें पन्ने पर लिखा नाम।
शेखर बाबू के घर की गली के मोड़ पर पहुँचकर मैंने गाड़ी रोकी। घर के बाहर एक बूढ़ी औरत खड़ी थी — साठ-पैंसठ साल, सिर पर सफ़ेद दुपट्टा, हाथ में लाठी। वो बीरा देवी नहीं थी। ये कोई और थी।
वो मेरी गाड़ी की तरफ़ आई और खिड़की पर हाथ रखकर झुकी।
“तू मनोहर है?” उसने पूछा।
“हाँ।”
“मैं तेरी माँ की बहन हूँ,” उसने कहा। “मैं बसवा से आई हूँ। तेरे पापा ने मुझे दस साल पहले एक लिफ़ाफ़ा दिया था। कहा था — जिस दिन मन्नू उन्नीसवीं लकीर तक पहुँचे, उस दिन ये लिफ़ाफ़ा उसे देना।”
मैं गाड़ी से उतर गया। “आप मेरी माँ की बहन हैं?”
“हाँ। और उस लिफ़ाफ़े में जो है, वो तेरे पापा की मौत से जुड़ा है।”
उसने अपनी साड़ी के पल्लू से एक पीला लिफ़ाफ़ा निकाला। उस पर मेरा नाम लिखा था — ‘मनोहर को।’
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक छोटा काग़ज़ था, जिस पर पापा की लिखाई में सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी — “मन्नू, उस रात गाड़ी में जो मरी, वो तेरी माँ की बहन थी। मैं उसे बचा नहीं पाया। माफ़ करना।”
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