The Token System – Chapter 634
“तेरा पापा?”
“ये वो नाम है जो आपने कभी मुझे नहीं बताया।”
भवानी ने काग़ज़ को मोड़ लिया। उसने उसे अपनी जेब में डालने की कोशिश की, फिर रुक गया और वापस मेज़ पर रख दिया।
“तू अदालत जाएगा तो तेरे पास कुछ नहीं बचेगा,” उसने कहा।
“बचेगा। मैं बचूँगा नहीं। मैं जो काग़ज़ लड़ रहा हूँ, वो किसी और का नहीं — उनका है जो आज यहाँ मेरे पीछे खड़े हैं।”
भवानी ने सातों को देखा। उनकी आँखों में डर था। पर वो खड़े थे।
“तुम सब जाओ,” भवानी ने उनसे कहा। “मैं तुम्हारे काग़ज़ सही करवा दूँगा।”
“नहीं,” बूढ़ी औरत ने कहा। “मैंने तेरे होश में रहते हुए तीन साल बर्बाद किए हैं। अब अदालत देखेगी।”
भवानी ने अपने मुँह का ताला खोला, कुछ कहने के लिए। फिर बंद कर दिया।
मैंने सूची उठाई, मोड़ी और जेब में रखी।
“कल सुबह नौ बजे,” मैंने कहा। “तहसील। कोई दरवाज़ा बंद नहीं होगा। कोई काग़ज़ सील नहीं होगा। अगर आप बंद करवाएँगे, तो ये सात लोग वहाँ होंगे। और तब आपकी ज़मीन पर सिर्फ़ आपका नाम नहीं होगा।”
मैं मुड़ा और बाहर चला। सात लोग मेरे पीछे चले। दरवाज़े पर पहुँचकर मैं रुका और पीछे मुड़ा।
“और हाँ, ठाकुर साहब,” मैंने कहा। “आपके भैया का काग़ज़ आज रात के बाद आपका नहीं रहेगा। मुझे उनका पता मिल गया है।”
भवानी ने कुछ नहीं कहा। उसने अपनी कुर्सी खींची और बैठ गया। पहली बार उसने अपनी उँगली से मेज़ पर कोई लकीर नहीं खींची।
बाहर आकर बूढ़ी औरत ने मेरा हाथ पकड़ा। “बेटा, तू क्या कर रहा है?”
“हिसाब, अम्मा।”
“मर जाएगा तो?”
“मरूँगा नहीं।”
“कैसे पता?”
मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था। मैंने उसे उँगलियों में दबाया और मुस्कुरा दिया।
“पता है,” मैंने कहा।
बंसी मुझे गाड़ी तक ले गया। “भैया का पता है तुझे?”
“हरदेव ने पीछे की गली बताई। पीली कोठी। पाँच बजे के बाद।”
“अभी क्या करना है?”
“पहले रामलाल से मिलना है। फिर शेखर बाबू से। सातों के काग़ज़ तहसील में दर्ज होंगे। और फिर —” मैंने घड़ी देखी “— पाँच बजे में सिर्फ़ आधा घंटा है। भैया के घर।”
“तू अकेला जाएगा?”
“नहीं। तू साथ चलेगा। और एक काम है — राजेंद्र को बोल, भैया के घर के बाहर दो सिपाही भेज दे।”
“सिपाही?” बंसी ने आँखें बड़ी कीं। “वो भी भवानी के घर से —”
“भवानी के होम से नहीं। भैया के घर से। भैया भवानी का नहीं रहेगा।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। फिर हँसा। “तू जानता है, मन्नू — तूने आज एक काम किया है जो मैं बीस साल से नहीं कर पाया। मैंने भवानी को सिर्फ़ राह देखकर छोड़ दिया था। तूने उसके सामने खड़े होकर बात की।”
“करनी थी,” मैंने कहा। “कल भी करनी है।”
मैंने गाड़ी स्टार्ट की और पीछे की तरफ़ देखा। भवानी का होम पीछे छूट रहा था। उसकी खिड़कियों में रोशनी थी — दफ़्तार में अब भी। मुझे नहीं पता था कि वो अंदर क्या कर रहा था। रजिस्टर जला रहा था, फ़ाइलें फाड़ रहा था, या भैया को फ़ोन कर रहा था।
पर एक बात मुझे पता थी — उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था जब उसने उन्नीसवीं लकीर देखी थी।
उसका चेहरा सफ़ेद पड़ते हुए मैंने पहली बार देखा था। और मुझे उस पल का इंतज़ार था।
गाड़ी मोड़ पर मुड़ी और मैंने एक बार पीछे मुड़कर अपने शहर की तरफ़ देखा — वो शहर जिसके हर कोने में कोई काग़ज़ दबा हुआ था, कोई नाम मिटा हुआ था। आज मैं एक-एक करके उन्हें खोल रहा था।
टोकन मेरी जेब में ठंडा था। मगर मेरी उँगलियाँ गरम थीं।
॥
भवानी ने कुर्सी पीछे सरकाई और उठकर खिड़की तक चला गया। मुझे लगा कुछ कहेगा। पर वो चुप खड़ा रहा, मुँह बाहर की तरफ़। शीशे पर उसकी साँस के धब्बे बन रहे थे और मिट रहे थे।
“ये काग़ज़ मैंने दस साल पहले जलाया था,” उसने खिड़की की तरफ़ देखते हुए कहा। आवाज़ धीमी थी, जैसे कोई अपने आप से बोल रहा हो। “अपने हाथ से। उस कमरे में, जहाँ अब तुम्हारी बहन का इलाज हो रहा है। मैंने माचिस ख़ुद जलाई थी।”
“जलती नहीं,” मैंने कहा।
वो पलटा नहीं।
“जो चीज़ जलती नहीं, वो लोगों के हाथ से निकलकर दीवारों में छिप जाती है,” मैंने कहा। “आपने आग लगाई, और काग़ज़ दीवार के अंदर चला गया। आपने राख देखी, और समझे कि सब ख़त्म।”
भवानी पलटा। उसके चेहरे पर अब वो सफ़ेदी नहीं थी। कुछ और था। थकान जैसा।
“तू क्या चाहता है?” उसने पूछा। “पैसा? ज़मीन? हवेली? बोल। जो माँगेगा, मिलेगा। पर एक बार में बोल।”
“मुझे उन्नीसवीं लकीर पर आपका नाम चाहिए।”
भवानी हँसा। पहली बार उस दिन में हँसा। खोखली हँसी, जैसे कोई पुरानी बोतल में हवा भर रहा हो।
“मेरा नाम?” उसने सिर हिलाया। “वो लकीर मेरी नहीं है। वो मेरे दादा की है। मेरा नाम उस पर कभी नहीं लिखा गया। मैं तो उस काग़ज़ में हूँ ही नहीं। जो मेरे दादा ने लिखा, वो मेरे नाम पर आया नहीं। मैं तो उस काग़ज़ के बाहर खड़ा हूँ, मनोहर। तेरे दादा ने मेरा नाम कभी उस पर चढ़ने ही नहीं दिया।”
मैंने जेब से सूची निकाली और उसे खोलकर उसकी मेज़ पर रख दी। उन्नीस लकीरें। अठारह नाम। आख़िरी खाली।
“देखिए,” मैंने कहा। “आपकी आवाज़ आज भी काँपी, जब मैंने इसे आपके सामने खोला। अगर आपका नाम इसमें नहीं है, तो काँपने की क्या ज़रूरत थी?”
भवानी ने काग़ज़ की तरफ़ नहीं देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा। “क्योंकि मुझे पता है, जो नाम आख़िरी लकीर पर उभरेगा, वो मेरा नहीं होगा। और जो नाम उभरेगा, वो मेरे बेटे को ले जाएगा। मैं उस लकीर से डरता हूँ, मनोहर। अपने नाम से नहीं। उस नाम से जो मेरे बाद आएगा।”
कमरे में सन्नाटा नहीं था। बाहर किसी की गाड़ी का हॉर्न बजा, फिर बंद हो गया। भवानी ने कुर्सी खींची और बैठ गया। इस बार वो टेबल के उस पार नहीं, इस पार बैठा — मेरी तरफ़ वाली कुर्सी पर। मैंने पहली बार देखा कि उसके हाथ काँप रहे हैं।
“तू जा,” उसने कहा। “आज रात मुझे कुछ तय करना है। कल सुबह तहसील में मिल।”
“क्या तय करना है?”
“अगर तू सच में हिसाब चुकाना चाहता है, तो तेरे सामने एक रास्ता है जो कोई नहीं जानता। उस रास्ते पर चलने वाला अकेला होता है। तू अकेला चल पाएगा?”
“मेरे साथ सात लोग हैं।”
भवानी ने सिर हिलाया, जैसे मैंने कुछ ग़लत कहा हो। “सात लोग काग़ज़ के लिए साथ चलते हैं। हिसाब के लिए कोई नहीं चलता।”
मैं उठा। दरवाज़े तक गया, फिर रुका।
“आपने मेरे पापा को क्यों मारा?”
भवानी ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस अपनी उँगली मेज़ पर रखी — और उस उँगली से कोई लकीर नहीं खींची।
मैं बाहर निकला। सीढ़ियों से उतरते वक़्त मेरे पैर भारी थे। होम की लॉबी में बंसी खड़ा था, हाथ में चाय का गिलास, जो अब ठंडी हो चुकी थी।
“क्या हुआ?” उसने गिलास रख दिया।
“कुछ नहीं। चल।”
“कुछ तो हुआ।”
“भवानी ने कहा, उसका नाम उस लकीर पर नहीं है।”
बंसी ने माथा सिकोड़ा। “झूठ?”
“शायद नहीं।” मैंने बाहर की तरफ़ चलते हुए कहा। “उसने उल्टी बात कही — जो नाम आख़िरी लकीर पर उभरेगा, वो उसका नहीं होगा। उसे अपने बेटे का डर है।”
“भवानी को बेटे का डर?” बंसी हँसा। “वो तो अपने बेटे को भी ज़मीन समझता है।”
“आज नहीं। आज उसने अपनी कुर्सी बदली।”
बाहर आकर मैंने फ़ोन निकाला। ढेबर की दुकान का नंबर मेरे पास था। घंटी दो बार बजी, फिर आवाज़ आई।
“ढेबर?”
“कौन?”
“मनोहर। सुखिया का पोता।”
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