The Token System – Chapter 631
"काग़ज़ ये है," मैंने कहा और जेब से उन्नीस नामों वाला जला-किनारा काग़ज़ निकालकर उनकी मेज़ पर रख दिया। "और ये सरोज का असली रिकॉर्ड है। तीन साल पहले इस ज़मीन की रजिस्ट्री भवानी के नाम पर कैसे हुई, ये मुझे अभी देखना है।"
शेखर बाबू ने काग़ज़ देखा। उनका हाथ उस पर नहीं गया। उन्होंने उँगली एक बार मेज़ पर मारी, फिर दो बार, फिर अलमारी की तरफ़ बढ़े। चाबी निकाली। ताला खोला। उनके हाथ काँप रहे थे, पर चाबी फँसी नहीं।
"इसमें मेरा नाम आएगा," वो बोले, "तो मैं अंदर जाऊँगा।"
"आपका नाम इस काग़ज़ में नहीं आएगा," रामलाल ने कहा। "आपका नाम उस काग़ज़ में आएगा जिसमें आपके साथ भवानी का नाम है। पर आपकी बेटी का नाम किसी ऐसे काग़ज़ पर नहीं आएगा जिससे वो फिर से शादी न कर पाए। फ़र्क़ समझते हो?"
शेखर बाबू ने रामलाल की तरफ़ देखा। उनकी आँखों के पीछे कुछ बदला।
उन्होंने अलमारी से मोटी भूरी फ़ाइल निकाली और सामने रख दी। उसका धागा कटा हुआ था, और पन्ने पुराने, पीले।
"यहाँ है," उन्होंने कहा। "तीन साल पहले की एंट्री। ज़मीन का नाम: सरोज। ट्रांसफर: भवानी सिंह। दस्तख़त वाला आदमी: हरदेव।"
"हरदेव?" मैंने कहा। "वो हरदेव? जो भवानी के होम का पुराना आदमी है?"
"एक ही है," शेखर बाबू ने कहा और फ़ाइल का पन्ना पलट दिया। "उसके दस्तख़त के नीचे एक और काग़ज़ है। काग़ज़ जो अलग काग़ज़ पर है। मन्नू, ये सरोज के पति के दस्तख़त हैं, पर वो उस वक़्त इन दोनों पेजों के बीच दब गए थे। बाद में काग़ज़ बदला गया और अंतिम पेज पर भवानी का हाथ चल गया।"
"फोटोकॉपी?" रामलाल ने कहा।
"लोगों को काग़ज़ देने का शौक़ नहीं है शेखर बाबू को," मैंने कहा।
शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा और पहली बार हल्का मुस्कुराए। "एक फोटोकॉपी मेरे पास भी है," वो बोले। "पिछले साल बेटी के लिए नौकरी के काग़ज़ करवा रहा था, तो इसी दुकान पर मिल गई थी। मैंने सोचा — क्या पता किसी दिन काम आए।"
उन्होंने अलमारी से एक और काग़ज़ निकाला। असली फ़ाइल का पन्ना, बिल्कुल वैसा ही, कमरे की रोशनी में साफ़ दिख रहा था, और नीचे भवानी के हस्ताक्षर।
"अब हरदेव के पास चलना होगा," मैंने कहा।
रामलाल ने बोरा उठाया। "मैं चलता हूँ।"
"तू नहीं," मैंने कहा। "तू सुमन के पास जा। सरोज के इलाज का काग़ज़ करवा। मैं और बंसी हरदेव के पास जा रहे हैं। और शेखर बाबू — ये फ़ाइल मेरे पास रहेगी।"
"फ़ाइल तेरे पास रहे, पर मेरा नाम किसी काग़ज़ पर ऐसा लिखा जो भवानी तक न पहुँचे," शेखर बाबू ने कहा। "अब जा। और हरदेव को ये मत बताना कि ये फ़ाइल तेरे पास है। वो डर के मारे भाग जाएगा।"
हरदेव का घर रामगंज की उसी पुरानी गली में था जहाँ काकी का मकान था, पर दूसरे मोड़ पर। छोटा सा पीला मकान, दरवाज़े पर टूटी साइकिल खड़ी थी। सुबह के नौ बजे भी घर की खिड़की बंद थी।
बंसी ने दरवाज़ा खटखटाया। कोई नहीं आया। मैंने खिड़की से झाँका — अंदर अंधेरा था, पर मेज़ पर एक बोतल पड़ी थी जिसका मुँह खुला था।
"पीछे से।"
हम पीछे गए। दरवाज़ा खुला था। हरदेव चारपाई पर बैठा था, सामने मेज़ पर आधी खत्म बोतल और एक गिलास। वो हमें देखते ही उछला और दीवार से टकराया, फिर दरवाज़े की तरफ़ भागा।
मैंने उसका हाथ पकड़ा। वो छिटका और गली की तरफ़ भागा। मुझे पता था, नशे में आदमी दौड़ कम और गिर ज़्यादा पड़ता है। उसने तीन कदम भागे और साइकिल से टकराकर गिर पड़ा।
मैंने उसे कमर से पकड़कर उठाया। बंसी सामने आ गया। गली के दोनों तरफ़ से लोग निकलने लगे, कोई दूध लेकर आ रहा था, कोई करछुल हाथ में लिए।
"हरदेव," मैंने कहा और उसे गली के बीच में खींच लाया। "ये काग़ज़ पहचानता है?"
उसने काग़ज़ नहीं देखा। वो सीधा मेरी आँखों में देख रहा था, और उसकी आँखों में डर के साथ शराब भी थी।
"मैंने कुछ नहीं किया," वो बोला। "मैंने तो बस हाथ लगाया था।"
"किस काग़ज़ पर?"
"जो भाई ने दिया था।"
"कौन भाई?"
"भैया। भवानी जी का भैया।"
गली में खड़ी औरतों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।
"क्या दिया था उसने?" मैंने कहा।
"पाँच हज़ार," हरदेव बोला और फूट-फूटकर रोने लगा। "पाँच हज़ार दिए थे, बोले — बस एक काग़ज़ पर दस्तख़त कर दे। मुझे क्या पता था उस काग़ज़ पर किसकी ज़मीन थी। मैं तो बस हाथ लगाता हूँ, काग़ज़ पढ़ना मुझे आता नहीं।"
"तू हरदेव है," बंसी ने कहा, धीमी आवाज़ में, "और तू काग़ज़ पढ़ना नहीं जानता, ये कोई और मुझे बताता तो मैं मान भी लेता। पर तू अस्पताल का काग़ज़ संभालता है। तू मरीज़ों के नाम बदलता है। तू उन्नीस साल से भवानी के होम में काम कर रहा है।"
हरदेव की आँखें फैल गईं। उसने अपना मुँह खोला, पर आवाज़ नहीं निकली।
भीड़ से एक बूढ़ा आदमी आगे आया। उसका कुर्ता फटा था और आँखों पर मोटा चश्मा। उसने हरदेव की तरफ़ उँगली उठाई।
"यही है," बूढ़े ने कहा और भीड़ की तरफ़ मुड़ गया। "यही हरदेव है। बीस साल पहले इसने मेरी ज़मीन भी इसी तरह हड़पी थी। मैंने इस पर केस किया था, पर इसके भाई ने मेरे काग़ज़ असली नहीं बताए। मैं तब जवान था, अब बूढ़ा हूँ, पर ये चेहरा मैंने नहीं भूला।"
हरदेव ने बूढ़े की तरफ़ देखा और उसका चेहरा पहले सफ़ेद हुआ, फिर लाल। वो धीरे-धीरे घुटनों पर आ गिरा, और उसकी आँखों से आँसू निकलने लगे।
"मैं गवाही दूँगा," वो बोला, "पर मुझे भवानी से बचाओ। वो मुझे नहीं छोड़ेगा। मैंने उसके बहुत काम किए हैं। मैं जानता हूँ कि वो कैसे काम करता है।"
मैंने उसे उठाया। उसके हाथ-पैर काँप रहे थे।
"अब सुन," मैंने कहा। "तेरे पास दो रास्ते हैं। एक — तू भवानी के साथ जा, और मैं तेरी गवाही के बिना भी काम कर लूँगा, पर तेरा नाम काग़ज़ पर आ जाएगा। दूसरा — तू मेरे साथ चल, सब कुछ बता, और मैं तुझे थाने तक ख़ुद ले जाऊँगा। वहाँ तेरी गवाही दर्ज होगी। और हाँ — तू पहले उस बूढ़े की ज़मीन का काग़ज़ भी बता।"
हरदेव ने बूढ़े की तरफ़ देखा। बूढ़ा वहीं खड़ा था, हाथ जोड़े, बिना कुछ बोले।
"मैं बताऊँगा," हरदेव ने कहा। "सब बताऊँगा। पर पहले मुझे पानी पिलाओ।"
बंसी दौड़कर पास की दुकान से पानी लाया। हरदेव ने पूरा गिलास एक साँस में पीया और फिर हमारी तरफ़ देखा।
"वो काग़ज़," वो बोला, "जो भैया ने मुझे दिया था, उस पर सरोज का नाम नहीं था। उस पर खाली ज़मीन का नंबर लिखा था। सरोज का नाम काग़ज़ पर किसी और ने चढ़ाया।"
"कौन?"
"वही जो हर काग़ज़ पर चढ़ता है," हरदेव ने कहा। "भवानी जी का भैया। और मन्नू — वो काग़ज़ जिस पर भैया ने दस्तख़त करवाए थे, वो सिर्फ़ एक काग़ज़ नहीं था। उसके नीचे एक और काग़ज़ था। दोनों एक साथ भरे गए थे।"
"मतलब?"
"मतलब, एक ही दस्तख़त से दो ज़मीनें भवानी के नाम हो गईं। एक सरोज की, और दूसरी —" वो रुका, गला सूख रहा था, "दूसरी उस बूढ़े की, जिसकी तरफ़ तुमने अभी इशारा किया।"
बूढ़ा आगे आया और हरदेव के सामने बैठ गया। उसने अपना चश्मा उतार दिया। उसकी आँखें सूखी थीं, पर उसका चेहरा किसी पुराने ज़ख्म से पीला पड़ा था।
"मेरा नाम रामकिशन है," उसने कहा। "मेरी ज़मीन मुझे लौटा दे। मैं बाकी माफ़ कर दूँगा।"
हरदेव ने हाथ जोड़ लिए। "मैं लौटा दूँगा," वो बोला। "पर मेरे पास काग़ज़ नहीं है। काग़ज़ भैया के पास है।"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने मेरी तरफ़ देखा और मुँह में ज़ुबान दबाकर एक आवाज़ निकाली।
"हरदेव," मैंने कहा। "तेरे पास भैया का कुछ है? कोई काग़ज़, कोई पर्ची, कोई चीज़?"
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