The Token System627 / 1154

The Token System – Chapter 627

7 min read November 6, 2026

"मैं तुम्हें रास्ता बताता हूँ," वह बोला। "होम के पीछे एक सर्विस गली है। वहाँ से तीसरी मंज़िल पर एक खिड़की है जो बंद नहीं होती — उसके पल्ले टूटे हैं। पहरेदार दोपहर में खाना खाने जाता है, बारह से एक तक।"

"आज?"

"आज नहीं। अभी। घड़ी देखो।"

मैंने मोबाइल निकाला। ग्यारह बजकर पाँच मिनट।

बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "पचास मिनट।"

"पचास मिनट बहुत हैं," मैंने कहा।

"पचास मिनट में तुम भवानी के होम में घुसोगे?" रामलाल ने कहा। "तुम पागल हो। वहाँ चार पहरेदार हैं, औ' ऊपर हर मंज़िल पर एक आदमी बैठा रहता है।"

"तूने ख़ुद कहा — खिड़की बंद नहीं होती।"

"खिड़की तो सच है, पर उस तक पहुँचने के लिए पीछे की दीवार चढ़नी पड़ेगी। वो ईंट की है, बारिश से चिकनी।"

बंसी ने कमर पर हाथ रखा और ज़ोर से हँसा। "ईंट की चिकनी दीवार? भाई साहब, हम काली माता के पीछे वाली पहाड़ी पर रोज़ चढ़ते हैं। ईंट की दीवार तो सीढ़ी है हमारे लिए।"

रामलाल ने उसे घूरा। "तुम दोनों को देखकर लगता है कि तुम कुछ नहीं जानते।"

"इसीलिए तो हमें कुछ होने की उम्मीद कम है," मैंने कहा। "कोई हम पर शक भी नहीं करेगा।"

रामलाल ने एक पल सोचा। फिर उसने अपनी जेब से एक पुरानी चाबी निकाली, जिसमें लोहे का छल्ला लगा था।

"ये तीसरी मंज़िल के कोने वाले कमरे की है। सरोज वहीं है। जब मैं उसे देखने जाता था, तब ये मेरे पास रहती थी। तीन हफ़्ते पहले उन्होंने सारी चाबियाँ बदल दीं, पर ये वाला ताला पुराना है। मैंने इसे कभी लौटाया नहीं।"

मैंने चाबी ली। वह ठंडी थी, पर टोकन जितनी ठंडी नहीं।

"एक बात और," रामलाल ने कहा। "अगर तुम सरोज को निकाल लाओ, तो उसे सीधे सुमन के पास ले जाना। भवानी के आदमी अस्पताल तक भी पहुँच सकते हैं।"

"सुमन कहाँ है?"

"सरकारी अस्पताल के पीछे वाली बस्ती में रहती है। पीली इमारत, दूसरी मंज़िल। पर तुम उससे मिलने से पहले मुझसे मिलना — मैं वहीं पास में रहता हूँ।"

"तू हमारे साथ नहीं आ रहा?"

रामलाल ने अपनी लाठी उठाई और उसे ज़मीन पर टिका दिया।

"मैं अगर तुम्हारे साथ गया, तो भवानी के आदमी मुझे देखते ही पहचान लेंगे। मैं बाहर रहूँगा। होम के पीछे वाले नुक्कड़ पर खड़ा मिलूँगा — एक पुरानी चाय की दुकान है, वहीं। तुम सरोज को निकालो, मैं तुम्हें गाड़ी से उठा लूँगा।"

"गाड़ी?"

"टेंपो। मेरे चचेरे भाई का है। मैं उसे अभी बुला लेता हूँ।"

मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने अपनी जेब से टोकन निकाला — मेरा टोकन, जो उसने सुबह लिया था, या शायद नहीं लिया था, मुझे याद नहीं। उसने उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"ये तेरा है। मैंने सुबह उठाया था, तेरे पास रखने के लिए।"

मैंने टोकन लिया। वह गरम था। बहुत गरम।

रामलाल ने इसे देखा और उसकी भौंहें चढ़ गईं। "ये क्या है?"

"पता नहीं," मैंने कहा, और जेब में रख लिया। "चल। देर हो रही है।"

हम तीनों हवेली के पिछले हिस्से से बाहर निकले। रामलाल बाएँ मुड़ गया — चाय की दुकान की तरफ़। हम दाएँ मुड़े। बंसी चलते-चलते बोला, "उस आदमी पर भरोसा करना ठीक है?"

"नहीं," मैंने कहा। "पर अभी कोई दूसरा रास्ता नहीं है।"

"तो भरोसा मत कर। बस इस्तेमाल कर।"

"तूने ये कब सीखा?"

"तेरे साथ रहकर," बंसी ने कहा, और आगे बढ़ गया।

सड़क पार करते वक़्त मेरी नज़र एक ऊँची इमारत पर पड़ी — भवानी का होम। तीन मंज़िला, पीले रंग की, छत पर लोहे की रेलिंग। खिड़कियाँ छोटी, ऊपर की तरफ़ एक पुरानी घड़ी लगी थी, जो ग्यारह बजकर दस मिनट दिखा रही थी। सामने के दरवाज़े पर एक आदमी बैठा था, पान खा रहा था। सफ़ेद कुर्ता, मुँह में लाल पान की पीक।

"बाईं तरफ़ से जाना है," मैंने बंसी से कहा। "पीछे की गली में।"

गली में घुसे तो हवा बदल गई। सड़क की गर्मी यहाँ नहीं थी। दोनों तरफ़ ऊँची दीवारें, और बीच में इतनी जगह कि एक आदमी आराम से चल सके। दीवारों पर काई जमी थी और नीचे कुछ कूड़ा पड़ा था।

बंसी ने पीछे की दीवार देखी। "ईंटें ढीली हैं," उसने कहा। "देख, तीसरी और चौथी पंक्ति के बीच जगह है। इसमें पैर फँस जाएगा।"

"तो चढ़।"

"रुक। पहले मैं ऊपर जाऊँगा। अगर सब ठीक हो, तो तुझे हाथ से खींच लूँगा।"

वह दीवार पर चढ़ने लगा। मैं नीचे खड़ा रहा और आसपास देखता रहा। गली के आख़िर में एक कुत्ता सो रहा था। ऊपर कहीं एक खिड़की खुली, फिर बंद हो गई।

बंसी दूसरी मंज़िल के पास पहुँचा और रुका।

"मन्नू," उसने फुसफुसाया। "यहाँ समस्या है।"

"क्या?"

"तीसरी मंज़िल की खिड़की है, पर उसके नीचे एक और खिड़की है जो खुली है। अंदर कोई है।"

"कौन?"

"नहीं पता। पर एक टेबल पर लैंप जल रहा है। और… मन्नू, वहाँ कोई बैठा है। सिर झुकाए।"

मैंने दीवार पकड़ी और ऊपर देखने की कोशिश की। कुछ नहीं दिखा।

"वो सरोज हो सकती है?"

"पता नहीं। पर अगर वहाँ कोई और है, तो हमें शोर नहीं करना होगा। तेरा टोकन कैसा है?"

मैंने जेब में हाथ डाला। "ठंडा हो रहा है।"

"तो मतलब…?"

"मतलब कुछ नहीं। चढ़।"

बंसी ऊपर बढ़ा। मैं उसके पीछे-पीछे। दीवार की ईंटें उम्मीद से कमज़ोर निकलीं — जगह-जगह गारा टूटा था, और बंसी सही कह रहा था, तीसरी पंक्ति में फँसाने की जगह थी। मैंने पैर फँसाया और ऊपर खिंचा।

दूसरी मंज़िल की खिड़की के पास पहुँचते ही मैंने अंदर झाँका। एक कमरा था — सफ़ेद दीवारें, लोहे का पलंग, टेबल पर लैंप। पलंग पर एक औरत लेटी थी। नीली साड़ी, बाल खुले। उसके हाथ सीने पर रखे थे।

"सरोज?" मैंने बंसी की तरफ़ देखा।

"पता नहीं। पर देख — उसकी कलाई पर पट्टी है। और उसकी साँस…" बंसी ने ध्यान से देखा। "बहुत धीमी है।"

मैंने खिड़की का काँटा उठाया। वह आसानी से हिल गया।

"अंदर जा रहा हूँ।"

"मन्नू —"

पर मैं पहले ही खिड़की के भीतर घुस चुका था। कमरे में बंद हवा थी, और दवा की गंध। औरत ने करवट बदली। उसकी आँखें खुलीं — बहुत धीरे, जैसे सपने से लौट रही हो।

"कौन?" उसकी आवाज़ रूखी थी।

"सरोज?"

उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर नहीं था — सिर्फ़ थकान।

"तुम रामलाल के…?"

"हाँ। वो बाहर है। हम तुम्हें यहाँ से ले जाने आए हैं।"

सरोज ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर अंदर से कोई ज़ोर था।

"नहीं।"

"क्या?"

"मैं नहीं जा सकती," उसने कहा। "वो जानता है। भवानी जानता है कि तुम आओगे। उसने मुझे बताया था।"

मेरे भीतर कुछ ठंडा हुआ। "कब?"

"आज सुबह। वो मेरे पास आया। यहाँ आया, इसी पलंग पर बैठा। बोला — आज कोई तुम्हें लेने आएगा। मैंने पूछा कौन? तो वो हँसा और बोला, वही जो तुम्हारे भाई को भेज रहा है।"

बंसी खिड़की पर था। "मन्नू, ये जाल है। निकलो।"

"रुक।"

"मन्नू —"

"रुक," मैंने दोहराया। फिर सरोज की तरफ़ देखा। "उसने और क्या कहा?"

सरोज ने आँखें बंद कीं। "उसने कहा कि तुम्हें उस काग़ज़ की सच्चाई पता चल जाएगी। और फिर तुम अपने आप उसके पास आओगे। और बोला — उन्नीसवीं लकीर वही काटेगा जिसने सब शुरू किया था।"

"उन्नीसवीं लकीर?" मैंने काग़ज़ निकाला। "इस पर तो तुम्हारा नाम है।"

सरोज ने काग़ज़ देखा और उसकी आँखें फैल गईं।

"ये… ये मेरा नाम नहीं है।"

"क्या?"

"मेरा नाम सरोज है, पर पूरा नाम सरोज देवी। इस पर सिर्फ़ 'सरोज' लिखा है।"

बंसी ने खिड़की से अंदर आकर काग़ज़ देखा। "तो क्या कोई और सरोज है?"

सरोज ने धीरे से कहा, "मेरी माँ का नाम भी सरोज था। वो चालीस साल पहले मर गई थीं। और उसी रात…" वह रुकी, "उसी रात हवेली का कुआँ बंद किया गया। सीमेंट से।"

कमरे में सन्नाटा छा गया। फिर नीचे से आवाज़ आई — दरवाज़ा खुलने की, और फिर कदमों की। सीढ़ियों पर चढ़ते कदम।

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