The Token System – Chapter 625
“आप कौन हैं?” मैंने पूछा।
“मैं रामदीन की बीवी हूँ। कमला।” उसने मेरी जेब की तरफ़ देखा जहाँ अँगूठी थी। “और वो अँगूठी मेरी है। मेरे पति ने कभी नहीं पहनी। उन्हें ये पसंद नहीं थी। पर उनकी माँ ने ज़बरदस्ती पहनाई थी।”
रुकी। फिर बोली, “ये सब मैंने तीन हफ़्ते पहले कुएँ में डाला था।”
हम दोनों चौंके।
“आपने डाला?” मैंने कहा।
“हाँ।” उसने लाठी आगे की। “भवानी को डराने के लिए। मैं चाहती थी वो ये खोजे, परेशान हो, पर कभी न पाए। वो रात-रात भर बैठा रहता था। मैंने सोचा — थोड़ा और डराऊँ।”
“तो आप भवानी के ख़िलाफ़ हैं?” बंसी ने पूछा।
“मैं इस हवेली की पहली बहू हूँ।” उसकी आवाज़ कड़ी हुई। “और पिछले बीस साल से मुझे इस घर में कोई नहीं पूछता। भवानी ने मेरे पति को ऐसा बना दिया कि उन्होंने मुझसे बात करना भी छोड़ दिया। बाद में वो गुज़र गए। अकेले। अस्पताल में। मेरा नाम तक नहीं बोला।”
उसने कुएँ की तरफ़ देखा। “जिस रात उन्हें ले गए, मैं इसी कुएँ के पास खड़ी रो रही थी। भवानी ने आकर कहा — ढक दो इसे। यहाँ से बदकिस्मती आती है।” वह मुड़ी। “और मेरा ससुर — ज़िंदगी भर भवानी के सामने सिर झुकाए रहता था — उसने वही रात कुएँ को ढक दिया। अपने हाथों से। मुझे बाहर खड़ा कर दिया।”
मेरे हाथ में पकड़ी पोटली भारी लगने लगी।
“तो कुएँ को भवानी ने नहीं ढका था?” मैंने पूछा।
“भवानी ने कहा था। पर हाथ ससुर के थे। लोग भवानी को डरते थे, इसलिए सब उसी को कहते हैं।” वह रुकी। “सच ये है — मेरे ससुर ने उस रात कुएँ को ढकते वक़्त रो-रो कर कहा था, ‘माफ़ कर देना, बेटा।’ और वो ‘बेटा’ किसे कह रहे थे, ये मैं आज तक नहीं जानी।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। मुझे लगा मेरा चेहरा बदल रहा है।
“ये पोटली आपने डाली थी,” मैंने कहा। “तो अंदर का काग़ज़ भी आपने लिखा?”
“नहीं।” कमला ने झट कहा। “काग़ज़ जो मिले, वो असली हैं। मैंने उन्हें कभी नहीं देखा। मैंने सिर्फ़ ऊपर से पोटली डाली थी। जो अंदर है, वो हवेली का अपना है।” उसने लाठी ज़मीन पर टिकाई। “और अब मैं जा रही हूँ। तुम जो कर रहे हो करो। पर भवानी से बचकर।”
वह मुड़ी। फिर रुकी। “एक बात और। भवानी की फ़ाइल में जो नींव का काग़ज़ है — वो मेरे ससुर के हाथ का नहीं है। किसी और ने लिखा है। जिसके अंगूठे का निशान काग़ज़ पर है। और वो निशान मेरे ससुर के अंगूठे से नहीं मिलता।”
“किसका है?”
“पता नहीं। पर मैंने एक बार झाँका था — भवानी की तिजोरी में। निशान के नीचे एक तारीख़ थी। बहुत पुरानी। उस साल हवेली में आग लगी थी।”
वह चली गई। लाठी की आवाज़ दूर होती गई।
बंसी ने धीरे से कहा, “मन्नू।”
“हूँ।”
“अगर भवानी ने नहीं ढका, तो वो कुएँ की ईंटें गिनने को क्यों कह रहा था? वो तो डरना चाहिए उसे।”
“इसलिए कह रहा है,” मैंने कहा, “क्योंकि उसे भी नहीं पता कि अंदर क्या है। वो सिर्फ़ जानता है कि कुछ है।” मैंने पोटली बाँधी। “और वो इससे डरता है।”
हम पीछे के फाटक से निकले। बाहर गली में सूरज सिर पर था। मैंने घड़ी देखी। बारह बज चुके थे।
घर पहुँचा तो माँ आँगन में बैठी थीं, हाथ में चाकू और सब्ज़ी। उन्होंने मेरा चेहरा देखा, चाकू रख दिया।
“निकाला?”
“निकाला।” मैंने पोटली मेज़ पर रखी।
माँ ने कपड़ा खोला। अँगूठी देखी। फिर काग़ज़। उनके हाथ काँपे।
“ये अँगूठी…”
“पहचानती हो?”
वो उठीं और अंदर गईं। मैं और बंसी वहीं खड़े रहे। वो एक पुराना बक्सा लेकर आईं। उसमें से उन्होंने एक फोटो निकाली — धुँधली, पुरानी। शादी की तस्वीर।
“ये तेरे पापा की शादी का फोटो नहीं है,” माँ ने कहा। “ये उनके मामा की है। रामदीन की।”
फोटो में दूल्हे के हाथ में वही अँगूठी थी।
“पर कमला कहती है रामदीन ने कभी ये नहीं पहनी।”
माँ ने फोटो गौर से देखा। “तो कमला ग़लत कहती है।” उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। “या जान-बूझकर कह रही है।”
मैं चुप हो गया।
“मन्नू,” माँ ने काग़ज़ को सीधा किया। “ये लिखाई… मैंने ये लिखाई कहीं देखी है।”
“कहाँ?”
वो नहीं बोलीं। चाकू उठाया। सब्ज़ी काटने लगीं। फिर अचानक रुकीं।
“वो कुआँ,” उन्होंने कहा, “मेरे ससुर ने ढका था।”
मैं ठिठक गया।
“क्या कहा?”
“तेरे दादा ने।” उन्होंने सब्ज़ी काट दी — एक ज़ोरदार कट। “भवानी ने नहीं।”
मेरा हाथ जेब में पड़ी उस पर्ची पर जम गया जो सुबह मिली थी। काग़ज़ की धार महसूस हुई — सूखी, ठंडी।
“पर… कमला भी यही कह रही थी।” मेरी आवाज़ धीमी थी।
“तो?” माँ ने चाकू रख दिया। “सच एक ही होता है। चाहे दो बोलें, चाहे बीस।”
“फिर भवानी ने ऐसा क्यों कहा सबको कि उसने ढका है?”
माँ ने मेरी तरफ़ सीधा देखा।
“क्योंकि जो ढकता है, वो कहता है — मैंने ढका।” उन्होंने काग़ज़ अपनी तरफ़ खींचा। “और जो सच में ढकता है, वो चुप रहता है।”
॥
रामलाल की बात सुनकर मैं रुका नहीं। जेब में काग़ज़ ठूँसा और उसी के सामने जाकर खड़ा हो गया।
"हाँ, मैं घुसा हूँ। तो?"
रामलाल पीछे हटा। उसकी आँखें मेरी जेब पर टिकी थीं, जहाँ से काग़ज़ का कोना बाहर झाँक रहा था। उसने गला साफ़ किया।
"भवानी साहब ने कहा है — जो हवेली के पिछवाड़े मिले, उसे सीधा उनके सामने लाओ। बात करने की नहीं, लाने की।"
"तो ले चल।" मैंने कदम बढ़ाया।
रामलाल ठिठका। उसे उम्मीद नहीं थी कि मैं ख़ुद चलूँगा।
"पर…" उसने बंसी की तरफ़ देखा, "ये साथ नहीं आएगा।"
"ये मेरा साया है," मैंने कहा। "साया छोड़कर कोई जाता है क्या?"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा, फिर रामलाल की तरफ़, और होंठ दबाकर हँसा।
रामलाल ने कुछ सोचा। फिर बोला, "साहब ने सिर्फ़ तुम्हारा नाम लिया है। फिर भी…" उसने जेब से मोबाइल निकाला, "मैं बता देता हूँ। वो जो कहे, वही।"
वह फ़ोन लगाने लगा, पर हवेली के पिछवाड़े नेटवर्क नहीं था। वह इधर-उधर घूमा, हाथ हिलाया, फिर झुँझलाकर बोला, "यहीं रुको। मैं गेट तक जाकर बात करता हूँ। भागना मत।"
"भागूँगा नहीं," मैंने कहा। "मैं तो तेरे साथ चलने को तैयार था।"
वह गया। मैंने पीछे मुड़कर देखा। सीमेंट की मोटी परत पर मेरी नज़र गई — कुएँ के मुँह पर डली, धूल से ढकी, किनारों से थोड़ी टूटी।
"बंसी," मैंने धीरे से कहा, "ये परत कब की है?"
बंसी ने पास जाकर पैर से ठोका। सीमेंट की आवाज़ सूनी आई — नीचे खोखला।
"दस साल से कम नहीं," उसने कहा। "देख, किनारे-किनारे काई लगी है, पर बीच का हिस्सा साफ़ है। किसी ने बाद में ऊपर से डाला है।"
"माँ कह रही थी दादा ने ढका।"
"दादा ने ढका होगा," बंसी ने कहा, "तो सीमेंट परत बाद में किसी ने डाली। ढकने और सील करने में फ़र्क़ है, मन्नू। ढकने वाला पत्थर रखता है। सील करने वाला सीमेंट डालता है — ताकि कोई फिर खोल ही न सके।"
मैंने पास की दीवार देखी। ईंटों की पुरानी दीवार, जगह-जगह टूटी। मेरी नज़र एक ईंट पर रुकी — बाकी से अलग रंग की, थोड़ी नई, थोड़ी चौड़ी।
"ये ईंट," मैंने उँगली रखी।
बंसी ने झुककर देखा। उसने जेब से चाकू निकाला — वही पुराना, जो हमेशा साथ रखता है। ईंट के किनारे खुरचने लगा। गारा भुरभुराकर गिरा। ईंट हिली।
"निकाल," मैंने कहा।
उसने दोनों हाथों से ईंट खींची। वह बाहर आई। पीछे एक गड्ढा — और उसमें, धूल में लिपटी, एक छोटी पीतल की डिबिया।
मेरे हाथ काँपे नहीं, यह अजीब बात थी। उलटे, ठंडे थे। मैंने डिबिया उठाई। हल्की। ऊपर ढक्कन पर — वही उल्टा कोना-चिह्न, दो लकीरें, बिंदु नीचे।
बंसी ने कदम पीछे किया।
"मन्नू।"
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