The Token System – Chapter 624
“हाँ। और नींव के बारे में हमें पहले भी कुछ मिला था। पापा के काग़ज़ में।”
मैंने कील उठाई। पीतल की छोटी कील, ऊपर कोना-चिह्न जैसा निशान खुदा।
टोकन जेब में हल्का गरम हुआ।
मैंने हाथ डाला। कोई शब्द नहीं। कोई लकीर नहीं। बस — गरमाहट, जैसे कोई पास आ रहा हो।
“बंसी।”
“हाँ।”
“आज रात हमें हवेली की नींव खोदनी है।”
“पागल हो गया है तू? पूरी हवेली उस पर बैठी है।”
“नींव की पहली ईंट। नींव के अंदर, बाहर की तरफ़। वो ईंट जो ज़मीन के सबसे नीचे है, बाहर से दिखती है। हमें वो चाहिए।”
“और भवानी के आदमी?”
“रात दो बजे। जब सिर्फ़ एक चौकीदार होता है।”
बंसी ने सिर खुजाया। “तेरे पापा भी ऐसे ही थे — जो ठान लेते, करके दिखाते।”
“तो चल।”
“चल। पर पहले चाय पिला। भूखा नहीं लड़ता मैं।”
हम लौट रहे थे, तभी गली के मोड़ पर सफ़ेद कार खड़ी मिली। वो वाली कार जो कल रघुवीर लाया था। खाली थी। दरवाज़ा खुला था।
“रुक,” बंसी ने मेरा हाथ पकड़ा।
कार की पिछली सीट पर कुछ पड़ा था। मैं पास गया। एक लिफ़ाफ़ा। भूरा। बिना नाम।
मैंने खोला। अंदर एक ही लाइन थी, मोटे अक्षरों में —
“आज रात भवानी तीन आदमी भेजेगा। कुएँ के पास मत जाना। — वो जो तेरे पापा का दोस्त था।”
“कौन?” बंसी ने पूछा।
“नहीं पता।” मैंने लिफ़ाफ़ा जेब में रखा। “पर वो जानता है हम क्या कर रहे हैं।”
“तो?”
“तो हम रात दो बजे नहीं जाएँगे।”
“कब?”
“आज दोपहर। जब सब खाने में लगे हों। उस वक़्त कोई नहीं रहता हवेली पर।”
बंसी मुस्कुराया। “तेरे पापा की आत्मा बोल रही है।”
घर पहुँचे तो दरवाज़े पर एक औरत खड़ी थी। लगभग पैंतालीस। सफ़ेद दुपट्टा। हाथ में कपड़े का थैला।
“तुम मनोहर हो?” उसने पूछा।
“हाँ।”
“मैं शांति की बहन हूँ। जमुना की पड़ोसन।” उसने थैला आगे किया। “जमुना ने भेजा है। कहा — मन्नू को दे देना। और हाँ, एक बात कहनी है।”
“क्या?”
“हवेली में तीन दिन से कोई औरत रह रही है। सफ़ेद दुपट्टा, लाठी। भवानी के आदमी उसे ‘बीबी जी’ कहकर बुलाते हैं। वो रात में हवेली की छत पर टहलती है।”
“और कौन है वो?”
“नहीं पता।” उसने सिर हिलाया। “पर जमुना कहती है — वो हवेली की असली चीज़ कुछ और है। तुम्हें उससे मिलना चाहिए।”
मैंने थैला खोला। अंदर एक छोटी पीतल की डिबिया थी।
“इसे खोलना अभी मत,” औरत ने कहा। “जमुना ने कहा — जिस दिन नींव से ईंट निकलेगी, उस दिन खोलना।”
वो मुड़ी और चली गई।
बंसी मेरी तरफ़ देख रहा था।
“तीन दिन से हवेली में एक औरत है,” मैंने कहा।
“और हमें पता नहीं।”
टोकन फिर गरम हुआ। इस बार तेज़। मैंने जेब से निकाला।
उन्नीसवीं लकीर के नीचे, जहाँ कल रघुवीर का नाम उभरा था — वहाँ अब एक और लकीर जुड़ रही थी। धीरे-धीरे। जैसे कोई लिख रहा हो।
“बीसवीं लकीर,” बंसी ने कहा।
“हाँ।”
“इसका मतलब क्या है?”
“मतलब — हिसाब का एक और हिस्सा खुल रहा है।”
मैंने डिबिया जेब में रखी। कल की पर्ची — कुएँ वाली — भी। माँ आँगन में आईं। उन्होंने मेरा चेहरा देखा।
“कुछ मिला?”
“हाँ।” मैंने कहा। “और कुछ ढूँढना है।”
“कहाँ?”
“हवेली की नींव में।”
माँ एक पल चुप रहीं। फिर उन्होंने अपना दुपट्टा ठीक किया।
“तेरे पापा ने एक बार कहा था — हवेली की नींव में जो है, वो हवेली के ऊपर बने हर कमरे से पुराना है।”
“तूने कभी नहीं बताया?”
“नहीं बताया।” उन्होंने मेरी आँखों में देखा। “क्योंकि उस दिन के बाद वो फिर कभी नींव की बात नहीं करने वाले थे। मैंने सोचा — चुप रहूँ।”
वो अंदर चली गईं।
बंसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
“दो बजे? या दोपहर?”
“दोपहर। और जल्दी — बारह बजे। जब हवेली सूनी हो।”
मैंने घड़ी देखी। ग्यारह बज चुके थे।
“बंसी,” मैंने कहा। “एक बात।”
“क्या?”
“अगर वहाँ कोई औरत रह रही है, तो उसका रास्ता अलग होगा। हम उससे टकराएँगे नहीं। हम नींव की तरफ़ जाएँगे — बाहर से, पिछवाड़े से।”
“ठीक है।”
“और अगर टकराना पड़े — तो मैं उससे बात करूँगा। पहले बात।”
“तेरा कोई बात करने का ढंग भी है,” बंसी हँसा। “देखते हैं।”
मैंने चलते-चलते टोकन फिर जेब में रखा। गरमाहट अब भी थी। बीसवीं लकीर पूरी हो रही थी।
पर नाम अभी नहीं उभरा था।
और मुझे लगा — जो नाम उभरेगा, वो हिसाब का सबसे पुराना हिस्सा होगा।
मैं हवेली की नींव की तरफ़ चला। पीछे माँ की आवाज़ आई —
“मन्नू!”
मैं रुका।
“जो भी मिले… मुझे भी दिखाना। मैं भी हिस्सेदार हूँ।”
मैंने सिर हिलाया। और चल दिया।
हवेली का पिछवाड़ा उस तरफ़ था जिधर से कोई आता-जाता नहीं था। बंसी पहली बार वहाँ आया था। उसने ऊपर देखा — तीन मंज़िला दीवार, काई पकड़े हुए।
“इतनी बड़ी हवेली और पीछे सन्नाटा,” बंसी ने धीरे से कहा।
“शुरू से ऐसा ही है।” मैंने पीछे का फाटक धकेला। ज़ंग लगी थी, पर खुल गया।
अंदर घास कमर तक। और बीच में — पत्थर का गोल। लगभग इतना बड़ा कि एक आदमी खड़ा हो जाए। ढक्कन पर मोटी परत जमी थी।
“यही कुआँ है,” मैंने कहा।
बंसी ने चारों तरफ़ नज़र घुमाई। “कोई नहीं।”
“तभी तो इस वक़्त आए।”
हम ढक्कन के पास गए। मैंने हाथ लगाया — ठंडा नहीं, बस पत्थर जैसा। कुछ ख़ास नहीं।
“ईंटें गिननी हैं,” मैंने कहा। “पर्ची पर लिखा था — कुएँ की ईंट गिनो।”
“कितनी?”
“पता नहीं। गिनते हैं।”
हम बैठ गए। बंसी एक तरफ़ से गिनने लगा, मैं दूसरी तरफ़ से। ईंटें पुरानी थीं, कुछ जगह टूटी हुई।
“इक्कीस,” बंसी बोला।
“मेरी तरफ़ से उन्नीस।”
“कुल?”
“चालीस।” मैंने ढक्कन को फिर देखा। “पर पर्ची कहती है ईंट गिनो। मतलब सिर्फ़ गिनना नहीं।”
“तो और क्या?”
मैं उठा और ढक्कन के किनारे पर हाथ फिराया। जहाँ ईंट चालीसवीं थी, वहाँ एक ईंट हिल रही थी। हल्की सी।
“ये देख।”
बंसी झुका। “हिलती है।”
“निकाल।”
उसने ईंट पकड़ी और खींची। आसानी से निकल आई। उसके पीछे एक खोखला गड्ढा था, जितना हाथ घुस सके। मैंने हाथ डाला। उँगलियों को कुछ लगा — कपड़े जैसा। मैंने खींचा।
एक छोटी पोटली। लाल कपड़े में बँधी। गीली नहीं, बस धूल भरी।
“खोल,” बंसी ने कहा।
मैंने गाँठ खोली। अंदर — एक चाँदी की अँगूठी, एक टूटा हुआ कंगन, और मुड़ा हुआ काग़ज़।
मैंने काग़ज़ खोला। पुरानी लिखाई। स्याही फैली हुई, पर पढ़ी जा सकती थी।
“क्या लिखा है?” बंसी ने पूछा।
मैंने पढ़ा — “जो इसे ढकेगा, उसका घर नहीं रहेगा। ये तीन चीज़ें उसकी हैं जो सबसे पहले आया था। कुएँ में मत फेंको। नींव में रखो। जो नींव उठाएगा, वो सब उठाएगा।”
“कौन लिखता है ऐसा?” बंसी ने कहा।
“जो डरता था।” मैंने अँगूठी उठाई। अंदर की तरफ़ नाम खुदा था — “रामदीन”।
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
“रामदीन कौन है?”
“नहीं पता।” मैंने अँगूठी जेब में रखी। “पर ये नाम मैंने कहीं सुना है।”
तभी पीछे से आवाज़ आई — “वो मेरे पति का नाम है।”
हम दोनों घूमे। दरवाज़े की तरफ़ एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। सफ़ेद साड़ी, हाथ में लाठी। वही औरत जिसका ज़िक्र जमुना की पड़ोसन ने किया था। बीबी जी।
“तुम दोनों यहाँ क्या कर रहे हो?” उसने पूछा। आवाज़ सूखी, पर डरावनी नहीं।
“हम…” मैंने कहा।
“चोरी नहीं कर रहे,” बंसी ने झट से कहा। “हम ढूँढ रहे थे।”
औरत हँसी। बहुत हल्का। “ढूँढ रहे थे।” वह हमारी तरफ़ चली। लाठी ज़मीन पर टक-टक कर रही थी। “मैं तीन हफ़्ते से यहाँ हूँ। तुम पहले आदमी हो जो कुएँ के पास आए हो। बाक़ी सब सिर्फ़ ऊपर तक आते हैं।”
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