The Token System – Chapter 623
“नहीं। मैंने उन्हें बोला — जो करना है कर लो। और अब मैं तेरे पास आया हूँ।”
माँ बाहर आईं। उन्होंने आकाश को देखा। “तू भवानी का भांजा है?”
“हाँ।”
“तो अन्दर आ। चाय पी।”
आकाश अंदर गया। मैंने आसमान की तरफ़ देखा। बादल छाए हुए थे।
मेरी जेब में टोकन ठंडा था। बिलकुल ठंडा। पर जब आकाश आँगन पार कर रहा था, एक पल के लिए वो हल्का गरम हुआ। मैंने जेब में हाथ डाला — कोई नई लकीर नहीं, कोई नया शब्द नहीं।
बस — उन्नीसवीं लकीर के नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में, एक नाम उभरा था।
“रघुवीर।”
॥
रीना किचन से बाहर आई और उसके हाथ में अभी भी थाली थी। उसने थाली चौके पर रखी और सीधा आकाश के सामने खड़ी हो गई।
“तुम जाओ।”
आकाश ने सिर उठाया।
“रीना…”
“मैंने कहा, जाओ।” उसकी आवाज़ काँपी नहीं, साफ़ थी। “और अपने मामा से कहना — रीना अब डरने वाली नहीं रही।”
आकाश एक पल बैठा रहा। फिर खड़ा हुआ। सोनल भी उठी, पर रीना ने हाथ उठाया।
“तू रुक, सोनल। तेरा काग़ज़ जलाने की धमकी तुझे मिली है, मुझे नहीं। तेरे पापा का घर भी तेरे नाम है। तू यहीं रह।”
सोनल की आँखें भर आईं। वो वापस बैठ गई।
आकाश दरवाज़े तक गया। वहाँ रुका। पलटा।
“रीना, मैंने ग़लती की। पर मैं उनके लिए नहीं लड़ रहा, अब समझ लो।”
“समझ लूँगी, जब तुम अदालत में खड़े होकर बोलोगे।”
वो चला गया। गाड़ी का दरवाज़ा पटका। इंजन की आवाज़ गली से निकलकर दूर हुई।
रीना मेरे सामने आकर बैठी। चारपाई पर। उसने घुटनों में सिर रख दिया।
“मन्नू भैया…”
“हाँ।”
“रात को सपना देखा था।”
“क्या?”
“शादी का।” उसने सिर उठाया। आँखों से पानी बह रहा था, पर आवाज़ साफ़ थी। “मंडप में मैं बैठी थी। सामने कोई नहीं था। बस तू खड़ा था। मेरा हाथ पकड़े हुए। और मैं सोच रही थी — भैया का हाथ ऐसा ही गरम होगा।”
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
“शादी टलने से कुछ नहीं बिगड़ता, रीना। सच छिपाने से सब बिगड़ जाता है।”
“मुझे पता है।” उसने मेरा हाथ पकड़ा। “पर एक बात बता — तू जो कर रहा है, उसमें तेरा नुक़सान नहीं होगा ना?”
“नुक़सान तो बहुत हो गया है। अब बाकी रह गया है हिसाब।”
“तो हिसाब कर।” उसने आँसू पोंछे। “और सुन — शादी जिस दिन होगी, उस दिन तेरे हाथ में मेरा हाथ होगा। चाहे भवानी आए या न आए।”
सोनल दरवाज़े पर खड़ी सब सुन रही थी। उसने धीरे से कहा, “मेरे पापा का काग़ज़… भवानी के पास है। मैं नहीं जानती उसमें क्या लिखा है।”
“जब तक वो काग़ज़ हमारे पास नहीं आता, तू स्कूल मत जा,” मैंने कहा। “घर पर रह।”
“और मेरी नौकरी?”
“नौकरी चली जाएगी तो दूसरी मिलेगी। जान चली जाए तो कुछ नहीं मिलेगा।”
रात ग्यारह बजे के आसपास माँ मेरे कमरे में आईं। हाथ में पीली पर्ची थी। काग़ज़ पुराना था, मुड़ा हुआ, कोनों से फटा।
“ये सुबह बाज़ार से लौटते वक़्त सीढ़ी पर मिली थी,” उन्होंने कहा। “किसी ने डाल दी।”
मैंने खोला। स्याही फीकी थी, पर पढ़ी जा सकती थी।
“कुएँ की ईंट गिनो, नाम नीचे है।”
“ये किसकी लिखाई है?”
“मुझे नहीं पता। पर काग़ज़ देखकर लगता है — बीस-पच्चीस साल पुराना नहीं है, इससे भी ज़्यादा।”
“कौन सा कुआँ, माँ?”
माँ चारपाई के किनारे बैठीं। उन्होंने हथेली सीधी की, जैसे कुछ याद कर रही हों।
“हवेली के पिछले हिस्से में एक कुआँ है। जब मैं तेरे पापा के साथ पहली बार हवेली गई थी, वो खुला था। बाद में ढक गया। मैंने सोचा था, भवानी ने ढकवाया होगा।”
वो रुकीं। उनकी आँखें दीवार पर टिकी थीं।
“पर आज तुझे बताती हूँ। वो कुआँ मेरे ससुर ने ढका था — भवानी ने नहीं।”
मेरा हाथ पर्ची पर जम गया।
“तेरे दादा ने?”
“हाँ।” माँ ने मेरी तरफ़ देखा। “और उस दिन के बाद वो कुएँ की तरफ़ कभी नहीं गए। किसी को जाने भी नहीं दिया।”
मैंने पर्ची दोबारा पढ़ी। ईंट गिनो। कितनी ईंटें? किस तरफ़ से गिनना है? कुएँ के अंदर से या बाहर से?
“माँ, दादा ने कभी कुछ बताया? कुएँ के बारे में?”
“एक बार।” उन्होंने आवाज़ धीमी की। “जब तेरे पापा बीमार थे, आख़िरी हफ़्ते में। दादा आए थे मिलने। और उन्होंने तेरे पापा से कहा था — ‘अगर मैं न रहूँ, तो तू कुएँ की ईंट गिन लेना। नाम नीचे है।’ मैंने सुना था, पर समझी नहीं। पापा ने भी कुछ नहीं कहा। बस सिर हिलाया था।”
“और दादा उसके बाद?”
“उसके तीन महीने बाद ही चले गए।”
मैंने पर्ची मोड़कर जेब में रखी। टोकन अभी भी ठंडा था। कोई शब्द नहीं, कोई लकीर नहीं।
“माँ, वो कुआँ कहाँ है ठीक से? हवेली के पिछले हिस्से में — किस कोने में?”
“पीपल के पेड़ के दक्षिण में। जब तू हवेली के पिछवाड़े से जाएगा, दीवार के साथ-साथ, तो बाईं तरफ़ एक ऊँची जगह मिलेगी। वहीं कुआँ था। अब वहाँ ईंटें बिछी हैं।”
“तू कभी गई थी वहाँ?”
“एक बार।” माँ ने कंधे सिकोड़े। “तेरे पापा ने दिखाया था। बस एक बार। फिर कभी नहीं।”
सुबह होते ही मैंने बंसी को बुलाया। वो चाय का गिलास लेकर आया, पर मैंने उसे हाथ नहीं लगाने दिया।
“पहले ये पढ़।”
बंसी ने पर्ची पढ़ी। फिर मेरी तरफ़ देखा।
“हवेली का कुआँ?”
“तू जानता है?”
“मैंने सुना है।” उसने चाय रख दी। “तेरे दादा ने ढका था, ये मुझे भी पता है। पर ये नहीं पता था कि ईंटें गिननी हैं।”
“कितनी ईंटें होंगी?”
“कुआँ चार-पाँच फुट चौड़ा रहा होगा। गोल। ऊपर से ढका है तो ईंटें ज़्यादा नहीं होंगी। तीस-चालीस।”
“और नाम नीचे है — मतलब?”
“मतलब, हवेली के हिसाब में एक और नाम है जो अभी तक किसी काग़ज़ पर नहीं आया।”
मैंने शर्ट पहनी। “चल।”
“अभी? दिन में?”
“नहीं। अभी। भवानी को पता चलेगा तो वहाँ अपने आदमी बैठा देगा। हम अभी जाएँगे — सुबह के वक़्त, जब उसके आदमी हवेली पर कम होते हैं।”
हम आधे घंटे में हवेली के पिछवाड़े पहुँचे। बंसी ने रास्ता पहचाना। दीवार के साथ-साथ चले। पीपल का पेड़ दूर खड़ा था, उसकी जड़ें ज़मीन से बाहर आ गई थीं।
बाईं तरफ़ ऊँची जगह मिली। वहाँ ईंटें बिछी थीं, ऊपर से सीमेंट का पतला लेप। ज़मीन से थोड़ा उभरा हुआ।
“ये है,” बंसी ने कहा। “ये कुआँ ही है।”
“गिन।”
हम दोनों ईंटें गिनने लगे। एक-एक करके। पहली पंक्ति — ग्यारह। दूसरी — नौ। तीसरी — बारह।
“कुल बत्तीस,” बंसी ने कहा। “अब?”
“पर्ची कहती है — नाम नीचे है। मतलब बत्तीसवीं ईंट के नीचे।”
“पर ये तो गोल है। कहाँ से गिना जाए?”
“जहाँ से सूरज निकलता है। पूरब से।”
हमने पूरब की तरफ़ से गिनना शुरू किया। बत्तीसवीं ईंट ठीक पश्चिम की तरफ़ निकली, बीच में। बंसी ने खुरपी से उसे खोदा। ईंट हिली। उसके नीचे मिट्टी थी, और मिट्टी के नीचे एक पतली सिल्ली।
“लोहा है?” बंसी ने कहा।
“नहीं। पत्थर। उठा।”
सिल्ली उठाई। उसके नीचे एक छोटा गड्ढा था। गड्ढे में — एक मिट्टी की पुड़िया। पुड़िया में काग़ज़ का मुड़ा टुकड़ा और एक पीतल की कील।
मैंने काग़ज़ खोला। बहुत फीकी स्याही, बहुत पुरानी।
“ये नाम,” बंसी ने पास आकर पढ़ा। “पढ़ा जा रहा है क्या?”
“रुक।” मैंने काग़ज़ आँखों के पास किया। “ये… ‘गोवर्धनदास का बेटा — रामदीन।’”
बंसी एक कदम पीछे हटा। “क्या?”
“रामदीन। तेरे ससुर का भाई। जिसे मरा हुआ माना जाता है।”
“पर ये नाम कुएँ में क्यों?”
“क्योंकि वो मरा नहीं था।” मैंने काग़ज़ ध्यान से देखा। नीचे एक लाइन और थी, बहुत छोटी। “‘इसे कुएँ में मत ढूँढो। इसे हवेली की पहली ईंट में ढूँढो।’”
बंसी चुप हो गया।
“पहली ईंट?” उसने धीरे से कहा। “मतलब हवेली की नींव की पहली ईंट?”
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