The Token System – Chapter 621
“ये उन्नीस काग़ज़ हैं,” उसने कहा। “सब भवानी के बनवाए। मेरे हाथ से लिखे। मेरी पहचान है इन पर।”
“तू उन्नीसवीं लकीर है,” मैंने कहा।
उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने धीरे से कहा, “नहीं। मैं उन्नीसवीं लकीर नहीं हूँ। उन्नीसवीं लकीर वो है जिसने मुझसे ये लिखवाए। और वो भवानी ख़ुद है।”
बंसी ने एक लंबी साँस ली।
“पर तू उन्नीसवीं लकीर का गवाह है,” मैंने कहा।
“हाँ।”
“तो अदालत में आएगा?”
वो चुप रहा। फिर उसने सिर हिलाया — ना में नहीं, हाँ में — बहुत धीरे।
“अपनी मर्ज़ी से,” मैंने कहा। “डर से नहीं।”
“अपनी मर्ज़ी से,” उसने दोहराया। और उसने टिन का डिब्बा मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
मैंने डिब्बा खोला। उन्नीस पीले काग़ज़, हर एक पर मुहर, हर एक पर भवानी के हस्ताक्षर। नीचे एक पर्ची थी — “ढेबर — मिलिशिया। भवानी ने बनवाए।” पापा की लिखाई में।
मैंने डिब्बा बंसी को थमाया और उसके बाद उस बूढ़े आदमी की तरफ़ देखा। “आप घर चलिए। माँ से मिलिए। वो आपके बारे में जानती हैं।”
वो उठा। उसने दुकान का शटर गिराया। चाबी जेब में रखी। हम चले।
घर पहुँचे तो आकाश आँगन में बैठा था, सोनल उसके पास चुपचाप। रीना चाय लेकर आई। माँ ने ढेबर को देखा, और मैंने पहली बार देखा कि उनकी आँखों में डर की जगह कुछ और था — पहचान।
“तू आ गया,” माँ ने कहा।
ढेबर ने सिर झुकाया। “कौशल्या।”
“बैठ।”
वो बैठ गया। बंसी ने टिन का डिब्बा मेज़ पर रख दिया। सब देख रहे थे।
मैंने उसकी पर्ची उठाई और सामने रखी।
“कल सुबह,” मैंने कहा, “अदालत में। इस डिब्बे के साथ। और ढेबर के बयान के साथ।”
आकाश ने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गया।
ढेबर ने उसकी तरफ़ देखा। “तू भवानी का भांजा है?”
“हाँ।”
“तेरे मामा जी ने मेरे हाथ से उन्नीस झूठे काग़ज़ बनवाए। और मैंने बनाए, क्योंकि मेरे बच्चे थे।” उसने मेज़ पर हाथ रखा। “मेरे बच्चे अब बड़े हैं। उनके बच्चे भी हैं। अब मैं उन्हें ये नहीं बता सकता कि उनका बाप डर के आगे झुक गया था। तो कल मैं अदालत जाऊँगा। और जो सच है, बोलूँगा।”
आकाश ने उसकी तरफ़ देखा। “और मेरे मामा जी?”
“तेरे मामा जी ने ये चुना होता,” बंसी ने कहा, “तो आज ये दिन न आता।”
मैंने ढेबर की पर्ची उठाई और डायरी की तरफ़ देखा। तीसरी डायरी के आख़िरी पन्ने पर पापा की लिखाई थी — “अगर मैं लौटूँ न, तो जो ढूँढे, उसे बताना — बीरा के पास रास्ता है।”
मैंने डायरी बंद कर दी। माँ की तरफ़ देखा। वो चूल्हे के पास बैठी थीं, आँच कम कर दी थी। उनका चेहरा थका था, पर आँखें साफ़।
“कल सुबह सब जाएँगे,” मैंने कहा। “और आकाश,” मैंने उसकी तरफ़ देखा, “तू भी चलेगा। अपने मामा जी के बारे में जो जानता है, वो बोलेगा।”
वो कुछ देर चुप रहा। फिर उसने सिर हिलाया।
रात को मैंने डायरी का आख़िरी पन्ना फिर खोला। पीछे की तरफ़, जो पर्ची मिली थी, वो पापा की मौत के बाद की तारीख़ वाली थी। मैंने उसे उँगली से पलटा।
उस पर पापा की लिखाई में सिर्फ़ दो शब्द थे जो मैंने पहली बार नहीं देखे थे। नीचे। बहुत नीचे, हाशिये पर।
“माफ़ करना।”
मैंने वो पर्ची डायरी में वापस रख दी। फिर उसके ऊपर अपना हाथ रखा। कुछ नहीं सोचा। बस हाथ रखा।
बाहर आँगन में ढेबर और बंसी की आवाज़ आ रही थी। रीना हँस रही थी, कुछ कह रही थी सोनल से। माँ की चूड़ियाँ बजीं।
टोकन मेरी जेब में ठंडा था। बिलकुल ठंडा।
आज रात कोई लकीर नहीं उभरी।
॥
चाय का प्याला मैंने मेज़ पर रखा और सीधा आकाश की आँखों में देखा।
“रजिस्टर की बात तुझे किसने बताई?”
आकाश ने प्याला उठाया, घूँट लिया, रख दिया। “मामा जी ने।”
“कब से?”
“कब से क्या?”
“कब से तू उनके लिए काम करता है?”
रीना बीच में बोल पड़ी, “मन्नू, अभी-अभी तो…”
मैंने हाथ उठा दिया। वो रुक गई। माँ उठकर अंदर चली गईं, पर दरवाज़े के पीछे रुक गईं — उनकी चूड़ी की आवाज़ आ रही थी।
आकाश ने मेज़ पर हाथ रखे। उसकी उँगलियाँ घुटनों पर थीं, अब मेज़ पर आ गईं। “चार साल पहले।”
“चार साल पहले क्या हुआ?”
“मैं बेरोज़गार था। मामा जी ने एक काग़ज़ दिया, कहा — अँगूठा लगा दे। बदले में गाड़ी और दुकान।”
“और तूने लगा दिया?”
“लगा दिया।”
सोनल ने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा उतर गया था। रीना ने चाय की केतली उठाई, हाथ काँप रहा था। वो रसोई में चली गई — तेज़ कदमों से।
“तू जा,” मैंने आकाश से कहा। “मेरी बहन को तेरे मामा के हिसाब से कोई मतलब नहीं।”
वो उठा। धीरे-धीरे उठा, जैसे उठने में ही ताक़त लग रही हो। दरवाज़े तक गया। फिर रुका। पलटा नहीं, बस रुका।
“मन्नू।”
“क्या?”
“मामा जी ने मुझे सिर्फ़ रजिस्टर के लिए नहीं भेजा था।”
मैंने पीछे देखा। बंसी खटिये पर बैठा था, हाथ में टिन का डिब्बा। ढेबर कोने में चुप। सोनल ने आँचल से आँखें पोंछीं।
“तो और किसलिए भेजा था?” मैंने पूछा।
आकाश ने दरवाज़े की चौखट पकड़ी। “कहा था — अगर रजिस्टर न मिले तो रीना को बोल देना कि उसका भाई अस्पताल से निकाल दिया गया है। पहली तारीख़ से।”
रसोई से केतली की आवाज़ आई। फिर सन्नाटा।
मैंने दरवाज़े के पीछे देखा। माँ खड़ी थीं, हाथ में तौलिया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और सिर हिलाया — मतलब, ये पहले से जानती थीं? नहीं। उनका चेहरा सफ़ेद था।
“क्यों?” मैंने आकाश से पूछा। “क्यों बोलना था?”
“ताकि रीना डर जाए। और अगर वो जाए मामा जी के पास फ़ोन पर, तो वो कहे — देख, तेरे भाई का बस चल रहा है, और शादी का अगला दिन तय करवा देता है, तो नौकरी वाली बात भी रुक जाएगी।”
“और तू ये करता?”
“मैंने मना किया था।” आकाश की आवाज़ फटी। “मैंने कहा था — मैं ऐसी बात नहीं बोलूँगा।”
“तो क्या बोलने आया था?”
“वो मुझे यही कहने भेज रहा था। इसीलिए मैं घर के अंदर आ गया। और चाय पी रहा था। और सोच रहा था — बोलूँ या न बोलूँ।”
बंसी ने डिब्बा मेज़ पर रखते हुए कहा, “और अब?”
“अब मैंने बोल दिया,” आकाश ने कहा। “सो मैं गया।”
वो निकला। गली में उसकी गाड़ी शुरू हुई। मैं दरवाज़े तक गया। सफ़ेद गाड़ी के पीछे धूल उड़ रही थी। ढेबर मेरे पास आया।
“मैं जानता हूँ ये लड़का,” उसने कहा। “भवानी का भांजा। हर साल एक काग़ज़ पर अँगूठा लगाता आया है।”
“अब नहीं लगाएगा,” मैंने कहा। बोलते ही मुझे ख़ुद पर हँसी आई।
बंसी उठा। “तेरी बहन?”
मैं रसोई में गया। रीना चूल्हे के पास बैठी थी। केतली चढ़ी थी, पर आँच धीमी थी। रीना रो नहीं रही थी। बस बैठी थी, हाथ में तौलिया लिए।
“रीना।”
“मैं ठीक हूँ।”
“नहीं लग रही।”
“मन्नू, मैं ठीक हूँ।” उसने तौलिया ताक पर रखा। “बस अच्छा लगा कि उसने ख़ुद बता दिया। अगर वो चुप रहता, और बाद में पता चलता, तो…”
“तो?”
“तो मैं ये मान लेती कि सारे आदमी एक जैसे हैं।”
माँ पास आकर खड़ी हो गईं। “बेटी।”
“माँ, तू रो क्यों रही है?” रीना उठी। “मैं ठीक हूँ। सच।”
माँ ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया। “मैंने सोचा था ये बात ख़त्म हो गई थी। जब तेरे पापा गए थे, तब भी एक आदमी ने मुझे यही कहा था — अगर तू काग़ज़ पर अँगूठा नहीं लगाएगी, तो तेरे बच्चे अस्पताल से निकल जाएँगे।”
मैं रुक गया।
“क्या बोली तू?” मैंने पूछा।
“यही। तब मन्नू छोटा था। रीना दूध पीती थी। तेरे पापा जीवित थे, पर बिस्तर पर थे। एक आदमी आया था, जिसने यही डर दिखाया था।”
“कौन आया था?”
“मैंने उसका चेहरा नहीं देखा। सिर्फ़ आवाज़ सुनी।”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। वो दरवाज़े पर खड़ा सुन रहा था।
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